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कॉप-30: शुष्क चर्चाओं के सम्मेलन, मंथन के बाद भी चिंताएं यथावत
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कॉप30
- फोटो :
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन
विस्तार
जलवायु परिवर्तन पर चिंतन से क्रियान्वयन की दिशा खोजने हेतु आयोजित कॉप-30 सम्मेलन अनेक मायनों में अपने निशान छोड़कर संपन्न हुआ। आयोजन स्थल की तैयारी के दौरान लगभग एक लाख पेड़ों की कटाई के विवाद, शुरुआती दिनों की बारिश, समापन से ठीक पहले पंडाल में लगी आग और दिल्ली की दमघोंटू हवा ने मानो जलवायु परिवर्तन के नतीजों को सामने ला दिया। दुनिया में प्रदूषण फैलाने वाले दूसरे सबसे बड़े देश अमेरिका के इस मुद्दे से पीछे हट जाने के बावजूद 10 नवंबर से दुनिया भर के सरकारी व स्वैच्छिक प्रतिनिधि ब्राजील के बेलेम शहर में जुटे।अमेरिका जलवायु परिवर्तन के लिए वैश्विक अनुदान का लगभग 10 प्रतिशत देता रहा है, इसलिए उसके हटने का प्रभाव स्पष्ट दिखा। इसी कारण इस बार वातावरण अनुकूलन कोष में स्पेन के ढाई करोड़ डॉलर समेत कुल अनुदान छह करोड़ डॉलर से भी कम रहा, जो अब तक का न्यूनतम है। बीते सम्मेलनों के आकलन से स्पष्ट है कि वे सभी किसी बंधनकारी समझौते के बिना ही संपन्न हुए हैं। 2023 के दुबई सम्मेलन में प्रदूषण से हुई हानि की भरपाई के लिए कोष बनाने पर सहमति बनी थी, पर अधिकांश देशों की बेरुखी से अप्रैल 2025 तक केवल 77 करोड़ डॉलर ही जुट पाए, जो लक्ष्य के एक प्रतिशत से काफी दूर है। दुबई में यूएई के 10 करोड़ और यूरोपीय संघ के 25 करोड़ डॉलर के शुरुआती योगदान से देशों के योगदान करने की उम्मीद जगी थी, परंतु यह आगे नहीं बढ़ सका।
विडंबना यह है कि सर्वाधिक प्रदूषण करने वाला चीन भी इस बाबत मौन है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदूषण जनित हानि की भरपाई के लिए 2030 तक प्रतिवर्ष लगभग तीन लाख करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी, जबकि पिछले दो वर्ष की प्रगति से यह लक्ष्य दूर की कौड़ी ही लगते हैं। अमेरिका द्वारा जलवायु परिवर्तन को महत्व न देने से उस पर निर्भर कई राष्ट्र पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। इसका नकारात्मक परिणाम कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने में दिखा है। परिणामस्वरूप कार्बन उत्सर्जन रोकने की दिशा में व्यापक कमी आई है और यदि यह गति जोर पकड़ती गई, तो बीते 30 साल के प्रयास दफन हो विषैले वातावरण को खुली छूट प्रदान करेंगे।
हालांकि, अमेरिका के असंवेदनशील एवं गैर-उत्तरदायी व्यवहार के बीच सर्वाधिक प्रदूषणकारी चीन ने गैर-पारंपरिक ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी कदम उठाते हुए स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में आवश्यक पहल की है। चीन द्वारा विकसित तकनीक एवं संसाधनों की बदौलत ही अनेक विकासशील देशों ने जीवाश्म ईंधन से उत्पन्न ऊर्जा के विकल्प को अपनाने एवं प्रोत्साहन पर जोर दिया है। इस वर्ष चर्चाओं की कार्यसूची में एक अहम विषय जीवाश्म ईंधन से अलग नए विकल्पों की खोज हेतु रोडमैप पर सहमति जुटाने का भी है। इस बाबत दस खरब डॉलर राशि के साथ स्वच्छ ऊर्जा एवं गैर जीवाश्म ईंधन की उपलब्धता को चौगुना करने का संकल्प लिया गया है, पूर्व के अनुभवों को देखते हुए यह कितना धरातल पर आ पाता है, भविष्य ही बता पाएगा।
सबसे बड़ी चुनौती प्रदूषणजन्य उद्यमों एवं साधनों पर नियंत्रण करना तो है ही, लेकिन उनके विकल्प स्वरूप सृजित तकनीकी का आमजन की पहुंच में होना भी बेहद आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र को भी शायद यह समझ आ गया है कि चर्चा का आधार मूलतः धरती पर उतर सकने वाले कदमों की ओर बढ़ना ज्यादा जरूरी है। इसी कारण इस बार कॉप-30 के दौरान इस बाबत चर्चा ही केंद्रित रही। ऑस्ट्रेलिया का कॉप-31 आयोजन से हाथ खींचना भी अमेरिकी प्रभाव के संकेत प्रदान करता है।