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चलन: झूठी मेधा का अंधा युग, एआई के दौर में क्या बच पाएगी रचनात्मकता

Sun, 13 Aug 2023 06:52 AM IST
gautam chatterjee गौतम चटर्जी
Updated Sun, 13 Aug 2023 06:52 AM IST
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सार
झूठी मेधा कुछ भी क्यों न कर ले, वह सूर्यास्त के सौंदर्य को हृदयांकित नहीं कर सकती। यह अब तक लिखी गई कविताओं से छांटकर कविताएं तैयार तो कर सकती है, लेकिन कविता नहीं लिख सकती।
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AI vs Creativity will Human creativity survive in era of Artificial intelligence
Artificial Intelligence - फोटो : Istock

विस्तार

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए हिंदी में कृत्रिम मेधा शब्द चलन में है। लेकिन इसे झूठी मेधा ही कहा जाना चाहिए। गूगल की कृत्रिम होशियारी या कृत्रिम मेधा से तो झूठी मेधा ही बेहतर है। वैसे भी अंग्रेजी के इंटेलिजेंस शब्द का ग्रीक मूल अर्थ है सम्यक दृष्टि, और लैटिन मूल में इसका क्रियापद अर्थ है समझने की क्षमता। व्युत्पत्ति के भारतीय मूल में इसे ही मेधा कहा गया है और संस्कृत में इसके लिए ‘धी’ शब्द का प्रयोग किया गया है। यह शब्दरूप है।



बहरहाल, इस झूठी मेधा के सक्रिय हो जाने से अमेरिका के फिल्म जगत में परेशानी आ गई है। परेशानी बड़ी है। कलाकारों के हाथ से काम छिन गए हैं, लेखकों के काम कम हो गए हैं, क्योंकि पटकथा लिखना, दृश्य सोचना जैसे उनके काम अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी झूठी मेधा के हवाले है।


याद आ रहा है कि जब दुनिया में मशीन का युग आ रहा था, तब गांधी जी ने कहा था कि इससे आदमी के हाथों से काम छिन जाएंगे। यहां आदमी पर मशीन को वरीयता न दें। इसी विचार को चार्ली चैप्लिन अपनी फिल्म टाइम मशीन में अपने ढंग से प्रस्तुत करते हैं। पैगाम में भी विषय यही था। लेकिन गांधी जी की बात सुनी नहीं गई। मशीन ने आदमी को एक हद तक विस्थापित किया। यह बात है पिछली शती के 30 और 40 के दशक की।

और अब झूठी मेधा सक्रिय है, जो भारत में भी सक्रिय होने के लिए उत्सुक है। इससे काम और कम होंगे। बेरोजगारी और बढ़ेगी। जनसंख्या और बेरोजगारी का समानुपात सामने आता जाएगा। प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गांधी ने कभी जनसंख्या वृद्धि को रोकने की बात कही थी। तब भी बात अनसुनी की गई थी। यहां थोड़ी देर ठहर कर इसी से जुड़े एक और तथ्य को हम देख सकते हैं। आजादी के बाद देश में कला और साहित्य तथा विज्ञान और दर्शन की मेधा को सम्मानित करने के लिए कई सरकारी और सांस्थानिक पुरस्कारों की व्यवस्था की गई। इसे अवाॅर्ड भी कहते हैं और अलंकरण भी। कई अलंकरण तो किसी मेधा के नाम पर भी शुरू किए गए, जो अभी तक जारी हैं।

प्रायः सभी सम्मानों के लिए तब मुख्य तौर पर यह देखा जाता था कि किसी भी क्षेत्र विशेष में उस मेधा का अवदान या योगदान क्या है। अवदान से आशय वही था, जो अब भी है कि उस मेधा ने उस क्षेत्र में ऐसा क्या किया है, जो इससे पहले तक नहीं हुआ है। शोध या पुनर्नवा भी इसी का अंश है। विज्ञान या गणित के क्षेत्र में अवदान के मुख्यार्थ को आसानी से समझा जा सकता है कि इस क्षेत्र में इस मेधा ने नया क्या जोड़ा या कहा है। जाहिर है, नया कुछ कहने के लिए मेधा या प्रतिभा प्रथम शर्त है। यही सच्ची मेधा है। जब भी मेधा होगी, अवदान सामने आएगा। मौलिकता की मुस्कराहट सर्वव्यापी होगी। मेधा अपने लिए कम जीती है। इन मेधाओं के कारण ही देश के सारे शीर्षस्थ सम्मान पिछली शती के अंतिम दिनों तक गरिमामय होते गए, होते रहे। इन मेधाओं और उनके सम्मानों के कारण ही हम उनके अवदान से परिचित और प्रेरित होते रहे।

पिछले दो दशकों में सम्मान तो वहीं हैं, लेकिन उनकी गरिमा लगातार घटती गई है। कारण है, सम्मान दिए गए, लोग सम्मानित होते गए, लेकिन अवदान कुछ भी सामने नहीं आया। मेधा होती, तो अवदान भी होता। मेधा और अवदान समानुपाती हैं। अवदान का अर्थ यह होता गया है कि हमारी कितनी किताबें प्रकाशित हुईं, हमने कितनी फिल्में बनाईं या उन पर लिखा, हमने कितने नाटक किए, हमने संगीत की कितनी मंच प्रस्तुतियां दीं आदि-इत्यादि। साथ ही, हम कितनी बार विदेश गए, कितने साहित्यिक मंचों से हमने रचनाएं पढ़ीं। हम उस व्यक्ति से कितना जुड़ सके, जो समिति में है और जो मुझे पुरस्कार देगा। फिर मैं समिति में होऊंगा। यह पिछले दो दशकों के हासिल का ताना-बाना है, जो अवदान की जगह पर है, अवदान नहीं है। यह पीढ़ी सम्मान के बारे में पहले सोचती और योजना बनाती है, रचना के बारे में बाद में व्यूह रचती है।

झूठी मेधा कुछ भी क्यों न कर ले, वह सूर्यास्त के सौंदर्य को हृदयांकित नहीं कर सकती। वह कविता नहीं लिख सकती। अब तक लिखी गई कविताओं की सांख्यिकी और सरणियों में से छांटकर उनके आधार पर एक या अनेक कविताएं तैयार तो कर सकती है, लेकिन रच नहीं सकती, क्योंकि यह झूठी मेधा है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है। इसलिए अमेरिकी फिल्म कलाकारों को डरना नहीं चाहिए। झूठी मेधा नई फिल्म के लिए कोई नया दृश्य नहीं सोच सकती। वह जब भी सोचेगी, अब तक रचे गए दृश्यों के स्टॉक में से लेकर ही सोचेगी। वह मौलिक नहीं सोच सकती, नया नहीं रच सकती।

रच सकती, तो हमारे पास आज हिंदी में निर्मल वर्मा, कुंवर नारायण या श्रीकांत वर्मा की मेधा-सा कम से कम एक कथाकार या कवि तो होता। उस कोटि का न सही, अपनी कोटि का। अरविंदन या अदूर या बेनेगल-सा कोई फिल्मकार होता। रविशंकर या किशन महाराज-सा कोई शिल्पी होता या फिर किशोरी अमोनकर, कुमार गंधर्व या फरीदुद्दीन डागर-सा कोई गायक होता। अवदान का झूठी मेधा से कोई संबंध नहीं है। यह तो अवदान के अवसान पर सम्मानित होते रहने का अंधा युग है। यह बात बेहद दिलचस्पी के साथ रेखांकित करने की है कि संस्कृति के प्रत्येक क्षेत्र में रचनात्मक अवदान के सिवा आज कितना कुछ है।

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