फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Against suicide

आत्महत्या के विरुद्ध

Tue, 11 Apr 2017 07:11 PM IST
ऋतु सारस्वत
ऋतु सारस्वत Updated Tue, 11 Apr 2017 07:11 PM IST
विज्ञापन
Against suicide
ऋतु सारस्वत

बीते दिनों 'मेंटल हेल्थ केयर बिल' पास हो गया, जिसमें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 309 के तहत आत्महत्या की कोशिश करने वाला तब तक अपराधी नहीं होगा, जब तक यह साबित न हो जाए कि आत्महत्या की कोशिश के वक्त व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ था। उल्लेखनीय है कि यह विधेयक राज्यसभा में अगस्त, 2016 में पारित हो चुका था। विधेयक में कहा गया है कि जो लोग आत्महत्या करते हैं, वे काफी तनावों में होते हैं, ऐसे में उन्हें सजा नहीं दी जानी चाहिए। यह सरकार की जिम्मेदारी है कि ऐसे लोगों के इलाज और पुनर्वास की व्यवस्था कराए, ताकि वे फिर ऐसा नहीं करें।

विज्ञापन


यह तय है कि विधेयक मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों के इलाज में दूरगामी प्रभाव छोड़ने वाला होगा। व्यक्ति आत्महत्या क्यों करता है? अधिकांशत: इस प्रश्न के बारे में कभी सोचा ही नहीं जाता। आम धारणा तो यह है कि इस कदम को 'कायर' या 'मानसिक विकार' के शिकार लोग उठाते हैं। हम सभी यह जानते हैं 'आत्महत्या' पूर्णत: एक निजी मामला है, परंतु यह गलत है। 1897 में समाजशास्त्री दुर्खीम ने 'आत्महत्या' के संबध में यह स्पष्ट किया था कि समाज ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर देता है कि व्यक्ति अपने जीवन को खत्म करने पर मजबूर हो जाता है। दुर्खीम का यह सिद्धांत किसी भी दृष्टि से गलत नहीं ठहराया जा सकता। आत्महत्या करने वालों में अधिकांशतया वे लोग होते हैं, जो कि 'मानसिक अवसाद' का शिकार होते हैं और हमारे लिए यह जानना जरूरी है कि 'अवसादग्रस्त व्यक्ति' और 'पागल' व्यक्ति में अंतर होता है। हमारे देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि हम अवसाद और पागलपन को एक ही समझ लेते हैं और इससे भी पीड़ादायक पहलू यह है कि एक लंबे समय तक अवसादग्रस्त व्यक्ति की पहचान भी नहीं हो पाती। इसके पीछे परिवार और समाज की असंवेदनशीलता है।
विज्ञापन


विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, भारत की 4.5 प्रतिशत आबादी अवसाद से पीड़ित है। अवसाद की स्थिति अधिक गहरा जाती है, तो व्यक्ति आत्महत्या कर लेता है। पर 'अवसाद' होता क्यों है? इस संबंध में चर्चा करने से पूर्व एनसीआरबी के ताजा आंकड़ों को देखना चाहिए। देश में सबसे ज्यादा आत्महत्याएं दैनिक मजदूरी करने वाले करते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


महिलाओं का स्थान इसके बाद है और आयु के आधार पर देखें, तो 2014 में आत्महत्या करने वालों में से 18 से 30 आयु वर्ग के युवाओं की तादाद सबसे ज्यादा 44,870 थी। एनसीआरबी के आंकड़ों से पता चलता है कि 15-29 वर्ष आयु वर्ग के लोगों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याएं 2004 के 35 प्रतिशत से बढ़कर 2014 में 41 प्रतिशत हो गई। यहां दो तथ्यों का विश्लेषण करना आवश्यक है। पहला महिलाएं क्यों आत्महत्याएं कर रही हैं और दूसरा 15-29 वर्ष का आयु वर्ग क्यों इस घातक रास्ते पर चल रहा है। यह विश्लेषण इसलिए जरूरी हो जाता है कि दैनिक मजदूरों के समान इनके सामने जीविकोपार्जन का संकट नहीं होता। 15 से 29 आयु वर्ग में श्रेष्ठ कॉलेज में एडमिशन, बढ़िया नौकरी, आदि सफल जीवन के पायदान घोषित कर दिए गए हैं। इस आयु वर्ग पर परिवार और समाज का गहरा दबाव होता है।


जीवन सबसे महत्त्वपूर्ण है और उसके संरक्षण और पल्लवन का दायित्व समाज और परिवार का है। अगर हम अब भी इस ओर गंभीरता से विचार नहीं करेंगे, तो, आत्महत्याओं की दर यों ही बढ़ती रहेगी, जिसके जिम्मेदार आत्महत्या करने वाले नहीं, हम होंगे।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed