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फिर क्रिकेट कूटनीति की राह पर

कुलदीप तलवार

Updated Wed, 28 Nov 2012 01:18 AM IST
again diplomacy in cricket
अजमल कसाब को फांसी देने के बाद भारत-पाकिस्तान के रिश्ते में तल्खी आने की आशंका बताई जा रही थी। आतंकवाद को लेकर भारत का रुख हालांकि सख्त बना हुआ है। इसीलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पाकिस्तान यात्रा पर अभी संशय बना हुआ है। हालंकि विशेषज्ञों का मानना है कि कसाब की फांसी से भारत के बजाय पाकिस्तान को ही ज्यादा फायदा पहुंचा है, क्योंकि 26/11 से जुड़ा वह सुबूत अब भारत के पास रहा नहीं, जिससे पाकिस्तान को घेरा जा सके।
शायद यही वजह है कि इसलामाबाद की ओर से आपसी रिश्तों को सामान्य बनाने पर ही जोर दिया जा रहा है। इससे भी इनकार नहीं कि नई दिल्ली और इसलामाबाद के बजाय दोनों देशों के आम लोगों के बीच मेल-मिलाप रिश्तों की बेहतरी के लिहाज से ज्यादा महत्व रखता है। सुखद यह है कि कसाब की फांसी से दोनों देशों के बीच दोबारा शुरू हो रहे क्रिकेट संबंध पर कोई असर नहीं पड़ा है।

पाकिस्तानी क्रिकेट टीम पांच साल बाद भारत खेलने आ रही है। पाक टीम ने आखिरी बार 2007 में भारत का दौरा किया था, लेकिन नवंबर, 2008 में मुंबई हमले के बाद क्रिकेट रिश्ते भी टूट गए। यह अलग बात है कि इस दौरान दोनों टीमों ने कई अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में हिस्सेदारी की, लेकिन आपसी सीरीज नहीं हुई।

कसाब की फांसी को अगर छोड़ दें, तो सचाई यह है कि पिछले कई महीनों में दोनों देशों ने कश्मीर समस्या को किनारे रखकर, व्यापार और क्रिकेट कूटनीति के जरिये फासले कम करने की कोशिश की है। इसके नतीजे भी अच्छे निकले हैं। पाक ने भारत को सर्वोच्च वरीयता प्राप्त देश का दरजा देने का फैसला किया है। सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए भी दोनों ने एक-दूसरे का साथ दिया। मानवीयता के आधार पर सुरजीत और चिश्ती रिहा हुए। सियाचीन से सैनिकों को हटाने के प्रयास तेज हुए। वीजा सरल हुआ।

पाक के क्रिकेट प्रेमियों को नए वीजा समझौते का लाभ लेने दिया जाएगा। इसके तहत पाकिस्तानी दर्शक अब अलग-अलग शहरों में मैच का आनंद ले सकेंगे, जबकि पहले वे एक ही शहर में आकर मैच देख सकते थे। पिछले दिनों जब पाक राष्ट्रपति जरदारी अपनी निजी यात्रा पर भारत आए, तो हमारी सरकार ने उन्हें सरकारी मान-सम्मान दिया। हाल ही में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल पाकिस्तान की यात्रा पर गए, तो उन्हें जो सम्मान दिया गया, उसे आपसी रिश्तों को और आगे बढ़ाने के रूप में देखा जा रहा है।

दरअसल पिछले छह दशकों से दोनों देशों के रिश्ते धूप-छांव का शिकार रहे हैं। अच्छा है कि अब दोनों एक-दूसरे का महत्व समझने लगे हैं। उनके सामने यूरोपीय संघ की मिसाल है। संघ में शामिल देश एक-दूसरे के साथ न केवल अच्छा-खासा व्यापार कर रहे हैं, बल्कि एक-दूसरे की समस्याओं को हल करने के लिए अपने स्रोतों का इस्तेमाल कर रहे हैं। वस्तुतः भारत-पाक के बीच संबंधों में सुधार के लिए जो तरीके अपनाए जाते हैं, उनमें सबसे महत्वपूर्ण क्रिकेट कूटनीति ही है। जब भी संबंधों में तनाव आया, क्रिकेट ने इससे छुटकारा दिलाया।

वर्ष 1987 में जब दोनों देश कश्मीर के मामले पर लड़ाई के कगार पर खड़े थे, तब जिया-उल-हक क्रिकेट मैच देखने भारत आए, जिससे तनाव कम हुआ। वर्ष 2004 में जब राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा ने कराची जाकर क्रिकेट मैच का लुत्फ उठाया था, तो तसवीर बदली थी। पिछले विश्व कप के दौरान मोहाली में यूसुफ गिलानी और मनमोहन सिंह ने साथ बैठकर क्रिकेट मैच देखा था, तब दोनों देशों की जनता के दिलों में जबर्दस्त गर्मजोशी पाई गई।

यह उम्मीद नहीं है कि पाक सत्ता प्रतिष्ठान आतंकवाद को खाद-पानी देने की नीति से पीछे हटेगा। पर इसका अर्थ यह भी नहीं कि हमें पाकिस्तान से रिश्ता नहीं रखना चाहिए। दोनों देशों की परंपराएं एक हैं, इसलिए आपसी रिश्ते खत्म करने का तुक नहीं है। इस रिश्ते को जोड़े रखने में क्रिकेट बड़ी भूमिका निभाता है। हालांकि दोनों ओर के कट्टरपंथियों ने क्रिकेट सीरीज शुरू करने के फैसले पर धमकियां दी हैं, पर उन्हें गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, क्योंकि उनका काम पुराने जख्मों को कुरेदना और नफरत फैलाना है, भविष्य की तरफ देखना नहीं।
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