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बार-बार विदेश यात्रा, अतीत से बाहर निकलें

Mon, 04 Nov 2019 08:48 AM IST
Tavleen Singh तवलीन सिंह
Updated Mon, 04 Nov 2019 08:48 AM IST
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Again and again travel abroad
राहुल गांधी (फाइल फोटो) - फोटो : Facebook

पिछले सप्ताह राहुल गांधी फिर से छुट्टी मनाने के लिए किसी अनजान देश के लिए रवाना हो गए। कांग्रेस प्रवक्ताओं ने बाद में यह जानकारी दी कि कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष विपश्यना करने गए हैं। विदेश जाने से पहले उनका एक ट्वीट मुझे दिखा, और जिसको देखकर एक बार फिर यह याद आया कि राजनीतिक रणभूमि में अक्सर नेहरू-गांधी परिवार के यह वारिस हारते क्यों रहते हैं। उन्हें ट्वीट किया था, 'आज मेरी दादी इंदिरा गांधी का बलिदान दिवस है। आपके फौलादी इरादे और निडर फैसलों की सीख हर कदम पर मेरा मार्गदर्शन करती रहेगी। आपको मेरा 'शत-शत नमन।'


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यह ट्वीट पढ़कर मुझे चुनावों में उनकी लगातार पराजय की बात क्यों याद आई? बताती हूं। मुख्य कारण मेरी नजर में यह है कि नौजवान भारतीयों को राजनीतिक वारिस पसंद नहीं हैं। उन्होंने बहुत बार वोटिंग के जरिये यह साबित करने की कोशिश की है। पिछला लोकसभा चुनाव अभियान शुरू होने के बाद मैं जनता की राय जानने जहां कहीं भी गई थी, मुझे युवा मतदाता मिले, जिन्होंने देश के भविष्य की बातें कीं और स्पष्ट किया कि उन्हें अतीत के राजनेताओं से कोई मतलब नहीं है। उन्होंने कहा था कि गांधी जी का सम्मान वे जरूर करते हैं, लेकिन उनके विचारों से उनको अपने भविष्य से कोई वास्ता नहीं दिखता है।

बीस साल पहले देश का माहौल बिल्कुल अलग था। तब जब चुनाव आते थे और मैं ग्रामीण भारत के दौरों पर निकलती थी, तो अक्सर ऐसे लोग मिलते थे, जो इंदिरा जी की बातें प्यार-सम्मान से करते थे। उनके दौर की प्रशंसा करते थे। अब उनके दौर को जैसे लोग भूल से गए हैं,  लेकिन इंदिरा जी के पोता-पोती अपनी दादी के दौर में अटके से रह गए हैं, सो तकरीबन अपने हर भाषण में उनका जिक्र ले आते हैं। प्रियंका गांधी ने तो अपने एक चुनावी भाषण में यहां तक कहा था कि उनकी दादी को फुटबॉल मैच देखना बहुत पसंद था और वैश्विक स्पर्धाओं में जब भारत नहीं होता था, तब वह इटली का समर्थन किया करती थीं। यह ऐसी बात है, जो प्रियंका अपने बच्चों को बतातीं, तो मुनासिब होता, लेकिन इस 'नए भारत' में मतदाताओं को बताने से कुछ हासिल नहीं होने वाला है।

नेहरू-गांधी परिवार के वारिस अतीत को भूलकर अगर वर्तमान और भविष्य की बातें ज़्यादा करने लगें, तो शायद उनकी लोकप्रियता और अहमियत बढ़ जाएगी। महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव परिणाम दिखाते हैं कि नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता के बावजूद लोग भारतीय जनता पार्टी का विकल्प ढूंढने को तैयार हैं। भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती सिर्फ कांग्रेस दे सकती है, लेकिन ऐसा तभी हो सकेगा, जब यादों की बारात त्यागकर भविष्य की बातें करने लगेंगे ये भाई-बहन, जिनको हमारी सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी विरासत में मिली है।

यह तय हो गया है कि इनके बिना कांग्रेस के पास जनता के सामने पेश करने को कुछ नहीं है। सो इस दल को बचाने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर ही है। अभी तक न राहुल गांधी ने और न ही प्रियंका ने जनता के सामने भारत के भविष्य का कोई चमकदार चित्र पेश किया है। हो सकता है कि उनकी माताजी उनको अतीत में अटकाए रखना चाहती हैं, लेकिन इस चंगुल से उन्हें निकलना होगा। विनम्रता से मैं एक सुझाव और पेश करना चाहूंगी। इस तरह बार-बार विदेश जाना अच्छा नहीं है। भारत में विपश्यना के हजारों केंद्र हैं, सो इसका लाभ लेने के लिए विदेश जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

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