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जेट के जमीन पर आने के बाद कर्मचारियों, कर्जदाताओं, यात्रियों में काफी नाराजगी
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प्रतीकात्मक तस्वीर
जेट एयरवेज के अचानक बंद हो जाने से इसके कर्मचारियों, कर्जदाताओं यहां तक कि यात्रियों में भी काफी नाराजगी है। भारत की सबसे पुरानी निजी विमानन कंपनी के बंद होने का व्यापक असर इसके कर्मचारियों पर पड़ा है। अनेक लोगों ने इसकी वजह से बड़ी संख्या में नौकरियां खोने और इसके आर्थिक प्रभाव के बारे में चिंता जताई है। पच्चीस साल पहले जब विमानन उद्योग को निजी क्षेत्र के लिए खोला गया था, तबसे यह क्षेत्र काफी हद तक संगठित रहा है। वास्तव में जेट के साथ ईस्ट-वेस्ट एयरलाइन नामक विमानन कंपनी ने भी सबसे पहले उड़ान भरी थी, मगर इसके प्रबंध निदेशक की हत्या के बाद बंद होने वाली भी यह पहली कंपनी थी।
पिछले पच्चीस वर्षों के दौरान ईस्ट-वेस्ट, दमानिया, मोदीलुफ्त, एमडीएलआर, सहारा, एयर डक्कन, पैरामाउंट, पवन हंस और किंगफिशर जैसी अनेक विमानन कंपनियां शुरू होकर बंद हुईं। इनमें से कुछ या तो बिक गईं या फिर उसका किसी बड़ी विमानन कंपनी में विलय हो गया, लेकिन एक स्वतंत्र विमानन कंपनी के रूप में उनका अस्तित्व खत्म हो गया। मगर पहले कभी किसी विमानन कंपनी के बंद होने पर इतना शोर-शराबा नहीं हुआ या फिर ऐसी सहानुभूति नहीं जताई गई, जैसा जेट एयरवेज के मामले में देखा जा रहा है। वास्तव में जब किंगफिशर अपना कोराबार समेट रही थी, तब अनेक लोग मजे ले रहे थे कि इसका यह हस्र इसके रंगीन मिजाज मालिक विजय माल्या के कारण हुआ। उस समय एयरलाइंस के बंद होने से नौकरियां खत्म होने जैसे मुद्दे पर आम तौर पर कोई खास चर्चा नहीं हुई थी। बंद होने वाली दूसरी विमानन कंपनियों की तुलना में जेट के पास कहीं अधिक विमान और कर्मचारी थे, मगर कंपनी के बंद होने पर इन कर्मचारियों के भविष्य को लेकर उनके प्रति उमड़ी सहानुभूति की सिर्फ यही वजह नहीं होनी चाहिए। विमानन क्षेत्र की वृद्धि और मांग की स्थिति ऐसी है कि पायलटों और प्रशिक्षित कर्मचारियों की हमेशा उच्च मांग रहती है। इसके अलावा नागरिक उड्डयन मंत्रालय के हस्तक्षेप के कारण इसके अनेक कर्मचारियों को स्पाइसजेट और इंडिगो एयरलाइंस जैसी कंपनियों ने अपने साथ रख लिया।
जेट एयरलाइंस में नौकरियों को लेकर उपजी स्थिति से ठीक उलट आईटी (सूचना प्रौद्योगिकी) जैसे क्षेत्र में सबको एक साथ हटाया जाना बहुत सामान्य है। यहां तक कि स्किल इंडिया पहल के तहत पीएमकेवीआई (प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना) का प्रदर्शन भी अच्छा नहीं रहा, जहां या तो प्रशिक्षित लोगों को नौकरियां नहीं मिलीं या फिर ट्रेनिंग एजेंसी द्वारा उपलब्ध कराई गई नौकरियों से उन्हें जल्द ही हाथ धोना पड़ा। यदि कोई मैन्यूफैक्चरिंग हब जाकर देखे, तो वहां प्रशिक्षित फैक्टरी मजदूरों को स्थायी कर्मचारी के बजाय अनुबंध पर रखा जाना बहुत आम है। कर्मचारियों या श्रमिकों को अनुबंध या ठेके पर रखने से कंपनियों के धन की तो बचत होती ही है, पीएफ और ईएसआई जैसी बाध्यताएं भी नहीं रहतीं।
यह दुखद है कि असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों की तकलीफों की ओर शायद ही ध्यान जाता है या फिर उनकी नौकरियां जाने पर सार्वजनिक तौर पर उनके प्रति समर्थन जताया जाता है, जैसा कि जेट जैसी एयरलाइंस के कर्मचारियों के मामले में अभी देखा जा रहा है। जेट एयरवेज के शीर्ष 70 फीसदी कर्मचारी स्थायी नौकरी पर थे और जिन्हें अन्य लोगों की तुलना में अच्छा वेतन और अन्य सुविधाएं मिल रही थीं। अब उनके पास पीएफ, बीमा और मेडिकल बीमा के रूप में कई सुविधाएं उपलब्ध हैं, इसके विपरीत अनेक कम आकर्षक क्षेत्रों के कर्मशील कर्मचारियों को यह सब उपलब्ध नहीं होता और उन्हें बदतर वित्तीय हालात का सामना करना पड़ता है। जेट कर्मचारियों की आवाज इसलिए भी सुनी जा रही है, क्योंकि उनका अपना संगठन है। इसके विपरीत अनेक क्षेत्रों में, खासतौर से सेवा क्षेत्र में, तो व्यावहारिक रूप में कर्मचारी संगठनों का कोई अस्तित्व ही नहीं बचा है। अनेक क्षेत्र प्रबंधन और कर्मचारियों के स्तर पर अनुबंध पर नौकरियों को अनुकूल पाते हैं, क्योंकि इससे उन्हें यूनियन का दबाव नहीं झेलना पड़ता। उदाहरण के लिए, आईटी कंपनियों में या वित्तीय सेवा से जुड़े उद्योग में कोई यूनियन नहीं है। बैंकों के कर्मचारी संगठन सिर्फ सरकारी बैंकों में हैं, निजी क्षेत्र में नहीं।
अनेक संगठन श्रम कानूनों को ताक पर रखकर चल रहे हैं और यूनियन न होने से कर्मचारी अपनी आवाज भी नहीं उठा सकते। उदाहरण के लिए, निजी क्षेत्र की सिक्योरिटी एजेंसी को ही देखें, जो ठेके पर गार्ड्स उपलब्ध कराती हैं, जिन्हें बेहद खराब परिस्थितियों में मासिक छह हजार से आठ हजार के वेतन पर 12 से 14 घंटे की पाली में काम करना पड़ता है। ये गार्ड्स कम वेतन या खराब काम के घंटों को लेकर कुछ बोल नहीं सकते। यही स्थिति अनेक मैन्यूफैक्चरिंग इकाइयों की है, जहां कर्मचारियों को आठ घंटे से भी अधिक समय तक काम करना पड़ता है और इसके एवज में उन्हें शायद ही कुछ अतिरिक्त लाभ मिलता है। ऐसा लगता है कि कर्मचारियों की संगठित आवाज के अभाव में, प्रबंधन 1950 और 1960 के दशक की फिल्मों में चित्रित मालिक-दास संबंधों की याद ताजा करते हुए अपनी कंपनियों को चलाते हैं।
जो लोग अभी जेट एयरवेज के बंद होने पर दुख जता रहे हैं और याद कर रहे हैं कि वे हवाई सफर में इसकी मसाला चाय की कमी महसूस करेंगे, उन्होंने शायद ही कभी कम आकर्षक पेशों की बेहद विकट काम की परिस्थितियों और वहां काम करने वाले कर्मचारियों की पीड़ा के बारे में लिखा हो। सीवर की सफाई करने वाले कर्मचारियों पर ध्यान तभी जाता है, जब उनकी सीवर में मौत हो जाती है। कुशल और अकुशल कर्मचारियों के प्रति नजरिया बदलने का समय आ गया है, भारत को काम की परिस्थितियों के मानक तय करने चाहिए, ताकि कर्मचारियों को चाहे वे किसी भी क्षेत्र में क्यों न हों, कार्यस्थल पर किसी तरह के भेदभाव का सामना न करना पड़े।
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पिछले पच्चीस वर्षों के दौरान ईस्ट-वेस्ट, दमानिया, मोदीलुफ्त, एमडीएलआर, सहारा, एयर डक्कन, पैरामाउंट, पवन हंस और किंगफिशर जैसी अनेक विमानन कंपनियां शुरू होकर बंद हुईं। इनमें से कुछ या तो बिक गईं या फिर उसका किसी बड़ी विमानन कंपनी में विलय हो गया, लेकिन एक स्वतंत्र विमानन कंपनी के रूप में उनका अस्तित्व खत्म हो गया। मगर पहले कभी किसी विमानन कंपनी के बंद होने पर इतना शोर-शराबा नहीं हुआ या फिर ऐसी सहानुभूति नहीं जताई गई, जैसा जेट एयरवेज के मामले में देखा जा रहा है। वास्तव में जब किंगफिशर अपना कोराबार समेट रही थी, तब अनेक लोग मजे ले रहे थे कि इसका यह हस्र इसके रंगीन मिजाज मालिक विजय माल्या के कारण हुआ। उस समय एयरलाइंस के बंद होने से नौकरियां खत्म होने जैसे मुद्दे पर आम तौर पर कोई खास चर्चा नहीं हुई थी। बंद होने वाली दूसरी विमानन कंपनियों की तुलना में जेट के पास कहीं अधिक विमान और कर्मचारी थे, मगर कंपनी के बंद होने पर इन कर्मचारियों के भविष्य को लेकर उनके प्रति उमड़ी सहानुभूति की सिर्फ यही वजह नहीं होनी चाहिए। विमानन क्षेत्र की वृद्धि और मांग की स्थिति ऐसी है कि पायलटों और प्रशिक्षित कर्मचारियों की हमेशा उच्च मांग रहती है। इसके अलावा नागरिक उड्डयन मंत्रालय के हस्तक्षेप के कारण इसके अनेक कर्मचारियों को स्पाइसजेट और इंडिगो एयरलाइंस जैसी कंपनियों ने अपने साथ रख लिया।
जेट एयरलाइंस में नौकरियों को लेकर उपजी स्थिति से ठीक उलट आईटी (सूचना प्रौद्योगिकी) जैसे क्षेत्र में सबको एक साथ हटाया जाना बहुत सामान्य है। यहां तक कि स्किल इंडिया पहल के तहत पीएमकेवीआई (प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना) का प्रदर्शन भी अच्छा नहीं रहा, जहां या तो प्रशिक्षित लोगों को नौकरियां नहीं मिलीं या फिर ट्रेनिंग एजेंसी द्वारा उपलब्ध कराई गई नौकरियों से उन्हें जल्द ही हाथ धोना पड़ा। यदि कोई मैन्यूफैक्चरिंग हब जाकर देखे, तो वहां प्रशिक्षित फैक्टरी मजदूरों को स्थायी कर्मचारी के बजाय अनुबंध पर रखा जाना बहुत आम है। कर्मचारियों या श्रमिकों को अनुबंध या ठेके पर रखने से कंपनियों के धन की तो बचत होती ही है, पीएफ और ईएसआई जैसी बाध्यताएं भी नहीं रहतीं।
यह दुखद है कि असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों की तकलीफों की ओर शायद ही ध्यान जाता है या फिर उनकी नौकरियां जाने पर सार्वजनिक तौर पर उनके प्रति समर्थन जताया जाता है, जैसा कि जेट जैसी एयरलाइंस के कर्मचारियों के मामले में अभी देखा जा रहा है। जेट एयरवेज के शीर्ष 70 फीसदी कर्मचारी स्थायी नौकरी पर थे और जिन्हें अन्य लोगों की तुलना में अच्छा वेतन और अन्य सुविधाएं मिल रही थीं। अब उनके पास पीएफ, बीमा और मेडिकल बीमा के रूप में कई सुविधाएं उपलब्ध हैं, इसके विपरीत अनेक कम आकर्षक क्षेत्रों के कर्मशील कर्मचारियों को यह सब उपलब्ध नहीं होता और उन्हें बदतर वित्तीय हालात का सामना करना पड़ता है। जेट कर्मचारियों की आवाज इसलिए भी सुनी जा रही है, क्योंकि उनका अपना संगठन है। इसके विपरीत अनेक क्षेत्रों में, खासतौर से सेवा क्षेत्र में, तो व्यावहारिक रूप में कर्मचारी संगठनों का कोई अस्तित्व ही नहीं बचा है। अनेक क्षेत्र प्रबंधन और कर्मचारियों के स्तर पर अनुबंध पर नौकरियों को अनुकूल पाते हैं, क्योंकि इससे उन्हें यूनियन का दबाव नहीं झेलना पड़ता। उदाहरण के लिए, आईटी कंपनियों में या वित्तीय सेवा से जुड़े उद्योग में कोई यूनियन नहीं है। बैंकों के कर्मचारी संगठन सिर्फ सरकारी बैंकों में हैं, निजी क्षेत्र में नहीं।
अनेक संगठन श्रम कानूनों को ताक पर रखकर चल रहे हैं और यूनियन न होने से कर्मचारी अपनी आवाज भी नहीं उठा सकते। उदाहरण के लिए, निजी क्षेत्र की सिक्योरिटी एजेंसी को ही देखें, जो ठेके पर गार्ड्स उपलब्ध कराती हैं, जिन्हें बेहद खराब परिस्थितियों में मासिक छह हजार से आठ हजार के वेतन पर 12 से 14 घंटे की पाली में काम करना पड़ता है। ये गार्ड्स कम वेतन या खराब काम के घंटों को लेकर कुछ बोल नहीं सकते। यही स्थिति अनेक मैन्यूफैक्चरिंग इकाइयों की है, जहां कर्मचारियों को आठ घंटे से भी अधिक समय तक काम करना पड़ता है और इसके एवज में उन्हें शायद ही कुछ अतिरिक्त लाभ मिलता है। ऐसा लगता है कि कर्मचारियों की संगठित आवाज के अभाव में, प्रबंधन 1950 और 1960 के दशक की फिल्मों में चित्रित मालिक-दास संबंधों की याद ताजा करते हुए अपनी कंपनियों को चलाते हैं।
जो लोग अभी जेट एयरवेज के बंद होने पर दुख जता रहे हैं और याद कर रहे हैं कि वे हवाई सफर में इसकी मसाला चाय की कमी महसूस करेंगे, उन्होंने शायद ही कभी कम आकर्षक पेशों की बेहद विकट काम की परिस्थितियों और वहां काम करने वाले कर्मचारियों की पीड़ा के बारे में लिखा हो। सीवर की सफाई करने वाले कर्मचारियों पर ध्यान तभी जाता है, जब उनकी सीवर में मौत हो जाती है। कुशल और अकुशल कर्मचारियों के प्रति नजरिया बदलने का समय आ गया है, भारत को काम की परिस्थितियों के मानक तय करने चाहिए, ताकि कर्मचारियों को चाहे वे किसी भी क्षेत्र में क्यों न हों, कार्यस्थल पर किसी तरह के भेदभाव का सामना न करना पड़े।