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पड़ोस: अफगानिस्तान में महिलाओं की दुर्दशा... विश्व समुदाय को ठोस कदम उठाने की जरूरत
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अफगानिस्तान की महिलाएं (फाइल)
- फोटो :
एएनआई
विस्तार
अफगानिस्तान में तालिबान को तीसरा साल हो गया है। 15 अगस्त, 2021 को उन्होंने दूसरी बार सत्ता पर कब्जा किया था। उम्मीद की जा रही थी कि महिलाओं के प्रति उनके रवैये में तब्दीली आएगी। उनको शिक्षा पाने की इजाजत भी मिल जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारत समेत ऐसे बहुत से देश हैं, जो महिलाओं को शक्तिशाली बनाने में लगे हुए हैं। लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी है, जबकि दूसरी तरफ अफगानिस्तान में महिलाओं को कोड़े मारे जाते हैं।
हाल ही में तालिबान द्वारा 14 महिलाओं और 60 से ज्यादा लोगों को दंड के तौर पर सार्वजनिक तौर पर कोड़े मारे गए, जिसकी सारी दुनिया में निंदा हो रही है। उल्लेखनीय है कि तालिबान के 1990 के दशक के शासन में भी यही होता था। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएनएचसीआर ने कहा कि नवंबर, 2022 से अप्रैल, 2023 के बीच अफगानिस्तान में ऐसी शारीरिक सजा के 41 से ज्यादा मामले सामने आए हैं, जिनमें 58 महिलाएं और 274 मर्द और बच्चों को अलग-अलग अपराधों के लिए कोड़े मारे गए। नाबालिग और कमसिन बच्चियों को जबरन शादी करने के लिए मजबूर किया जाता है। लड़कियों में खुदकुशी करने की प्रवृत्ति काफी बढ़ रही है। तालिबान ने सत्ता संभालते वक्त वादा किया था कि उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया जाएगा। लेकिन वे घर से बाहर अकेले नहीं निकल सकतीं और न ही नौकरी कर सकती हैं।
अफगानी महिलाएं घर में भी सुरक्षित नहीं हैं। तालिबान ने अफगानी महिलाओं को उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए विश्वास दिलाया था, लेकिन वहां हो कुछ और ही रहा है। पश्चिमी देशों ने अफगानिस्तान को दी जाने वाली मदद पर रोक लगा दी है।
अमेरिका और दूसरे पश्चिमी देश ऐसे शासन की मदद नहीं करना चाहते, जिसने लड़कियों की शिक्षा पर रोक लगा रखी है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूएन वूमेन ने बताया है कि अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति अत्यधिक चिंताजनक है। उसने वहां महिलाओं का दमन रोकने के लिए वैश्विक कार्रवाई की मांग की है। और कहा है कि अफगानिस्तान में महिलाओं की हालात में सुधार के लिए जरूरी कदम उठाने आवश्यक हैं। तालिबान ने तीन वर्षों के शासन में
सुधार का कोई कदम नहीं उठाया। तालिबान ने सत्ता पर कब्जा करके 70 से ज्यादा ऐसे आधिकारिक फरमान जारी किए हैं। और वे अभी तक कायम हैं, जिसका महिलाओं और लड़कियों के जीवन पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। इस समय 11 लाख लड़कियां स्कूल नहीं जा रहीं और एक लाख से ज्यादा महिलाएं यूनिवर्सिटी में पढ़ाई नहीं कर पा रही हैं।
महिलाएं निर्णय लेने का अधिकार हासिल करना चाहती हैं। वे न केवल अपने घरों में, बल्कि सरकार व अन्य स्थानों पर भी अधिकार चाहती हैं, लेकिन उनकी ये मांगें पूरी नहीं हो रही हैं। इसलिए उनका दर्जा व परिस्थितियां खराब होती जा रही हैं।
विश्व बैंक ने हाल ही में 190 देशों का सर्वे किया है। इसमें अफगानिस्तान में महिलाओं को करीब 90 फीसदी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है, जिसमें शिक्षा, रोजगार, मुक्ति आंदोलन इत्यादि शामिल हैं। आईएसआईएस सैलानियों पर हमले कर रहा है। इसमें महिलाएं ही ज्यादा प्रभावित होती हैं। चंद दिनों पहले ही आईएसआईएस ने ऐसे हमलों की जिम्मेदारी कबूल की है। अफगानिस्तान में बराबर हजारा बिरादरी शिया नागरिकों पर जुल्म ढा रही है। जब भी शिया बिरादरी के लोग मस्जिद में नमाज पढ़ने जाते हैं, उनको गोलियों का निशाना बनाया जाता है।
पिछले बीस साल में भारत ने अफगानिस्तान में सबसे ज्यादा विकास कार्य किया है। वह अब भी उसे मानवीय सहायता देने की कोशिश करता रहा है। भारत चाहता है कि अलग-अलग देशों की ओर से दी जा रही मदद का दुरुपयोग न हो और अफगानिस्तान आतंक का अड्डा न बने। इसलिए जरूरी है कि अफगानिस्तान सबसे पहले अपनी जनता का भरोसा जीते। वह जब अपनी आवाम का भरोसा हासिल कर लेगा, तब उसका बदला हुआ रवैया सामने आ सकेगा। फिलहाल कोई भी देश उसे मान्यता नहीं दे रहा है। वहां महिलाओं को जो कोड़ों की सजा दी जा रही है, उसे तुरंत बंद करना होगा और शिक्षा के दरवाजे खोलने होंगे। अफगानिस्तानी महिलाओं के सुरक्षा के लिए विश्व समुदाय को भी ठोस कदम उठाने की जरूरत है।