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अस्थिरता के भंवर में अफगानिस्तान, नौ दौर की वार्ता भी बेनतीजा

कुलदीप तलवार Updated Wed, 11 Sep 2019 04:36 AM IST
प्रतीकात्मक तस्वीर
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने अपने चुनावी अभियान के दौरान सैनिकों की अफगानिस्तान से वापसी का वादा किया था। अमेरिका में अगले साल राष्ट्रपति का चुनाव होना है। ट्रंप इससे पहले हर सूरत में अफगानिस्तान में तैनात 14,000 अमेरिकी सैनिकों को कम कर 8,000 करना चाहते हैं। पिछले एक साल से अमेरिका की तालिबान से बातचीत जारी है। वार्ता के नौ दौर हो चुके हैं। समझौता होने जा रहा था, पर इसमें बाधा आ गई है। अमेरिका, तालिबान और अफगान नेताओं के बीच होने वाली खुफिया बैठक रद्द कर दी गई है। काबुल में पिछले सप्ताह तालिबान द्वारा की गई बमबारी के मद्देनजर यह कदम उठाया गया। शांति वार्ता भी रद्द कर दी गई है।
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बहरहाल, अमेरिकी विदेश मंत्री ने कहा है कि अगर तालिबान अपने बर्ताव में बदलाव लाएं और अपने वादों पर कायम रहने का वचन दोहराएं, तो बातचीत फिर शुरू की जा सकती है। सच तो यह है कि अमेरिका अफगानिस्तान से निकलने के लिए बेताब है और तालिबान अफगानिस्तान में दोबारा सत्ता पर कब्जा के लिए बेचैन हैं। इसलिए शांति समझौता देर-सबेर हो सकता है। जबकि आम ख्याल यह है कि यह समझौता अगर हो भी गया, तो टिकाऊ साबित नहीं होगा।

ट्रंप राजनीतिक लाभ के लिए अफगानिस्तान से अपनी सेना निकालने के लिए प्रयत्नशील हैं और अफगानिस्तान को उसके रहमो-करम पर छोड़ने के लिए तैयार हैं। ट्रंप का कहना है कि अमेरिका 7,000 किलोमीटर की दूरी से काम कर रहा है, जबकि भारत-पाक अफगानिस्तान के निकट होते हुए भी कुछ नहीं कर रहे। अब उनको भी लड़ाई में शामिल होना होगा। जबकि इस सैन्य संघर्ष में भारत के शामिल होने की कोई नीति नहीं है। और यह बात कई बार अमेरिका को स्पष्ट कर दी गई है। पाकिस्तान ने तो अफगानिस्तान के मामले को कश्मीर से जोड़कर अपने हाथ खड़े कर लिए हैं, जबकि भारत ने वहां स्थायी शांति के लिए एक बहुत बड़ा रोल अदा किया है। पिछले कई साल में भारत ने अफगानिस्तान में तीन अरब डॉलर निवेश कर सड़कें-बांध और अन्य कई परियोजनाएं पूरी की हैं। वहां के संसद भवन का निर्माण किया है। हजारों पुलिस व सुरक्षाकर्मियों को प्रशिक्षण दिया है। हेलिकॉप्टर व अन्य सैनिक साजो-सामान की पूर्ति की है। चंद दिन पहले ही अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई भारत आए थे। उन्होंने प्रधानमंत्री के साथ हुई भेंट में अफगानिस्तान को समर्थन के लिए धन्यवाद अदा किया, वहीं मोदी ने भी समावेशी, संगठित, सही अर्थों में स्वतंत्र और लोकतांत्रिक अफगानिस्तान की शांति, सुरक्षा, स्थायित्व के लिए भारत के सतत समर्थन को दोहराया। साफ है कि भारत अफगानिस्तान के विकास व शांति बहाली के लिए हर प्रकार की मदद करता रहेगा।

अफगानिस्तान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता के स्थगित होने के बाद अब देखना यह होगा कि अमेरिकी प्रशासन अफगानिस्तान को लेकर क्या नीति अपनाता है। इधर भारत ने इस बदले हुए घटनाक्रम से राहत की सांस ली है, क्योंकि अफगानिस्तान में भारत का बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। इसलिए भारतीय विदेश मंत्रालय को हर गतिविधियों पर पैनी नजर रखनी होगी। ट्रंप के पल-पल बदलते बयानों पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

भारत को विशेष सतर्कता और सावधानी बरतने की जरूरत है, ताकि तालिबान और आईएस दहशतगर्दों के नापाक मंसूबों को नाकाम किया जा सके। आगामी 28 सितंबर को अफगानिस्तान में राष्ट्रपति का चुनाव भी है। अब देखना यह है कि यह चुनाव शांतिपूर्ण संपन्न होता है या नहीं और अफगानिस्तान के हालात क्या शक्ल अख्तियार करते हैं।

 
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