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अफगान सीमा है पाक की मुसीबत
अरुण बाजपेयी (सेवानिवृत्त ब्रिगेडियर)
Updated Tue, 22 Jan 2013 11:38 PM IST
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कश्मीर मसले पर पाकिस्तान का रुख किसी से छिपा नहीं कि वह किसी न किसी तरह इस मसले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाना चाहता है। अभी संयुक्त राष्ट्र में उसने जिस तरह से इस मसले को छेड़ने की कोशिश की, वह उसकी इसी मानसिकता की ओर इशारा करती है।
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यदि हम आठ जनवरी से लेकर अभी तक के घटनाक्रम को देखें, तो साफ हो जाता है कि यह पाकिस्तान की सोची-समझी रणनीति है। दो भारतीय जवानों के सिर कलम करने की घटना, जनवरी महीने में ही कम से कम 12 बार सीमा का उल्लंघन तथा पाकिस्तानी विदेश मंत्री हिना रब्बानी खार का शिमला समझौते को दरकिनार कर संयुक्त राष्ट्र में भारत के खिलाफ माहौल बनाना और उसे युद्ध पर उतारू देश बताना-ये सारी घटनाएं आपस में जुड़ी हुई हैं। इससे फर्क नहीं पड़ता कि बाद में उनका रुख नर्म हो गया, क्योंकि इस घटनाक्रम को व्यापक रूप से देखने की जरूरत है।
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काफी लंबे समय की खुफिया खोज और योजनाबद्ध तरीके से जब पाकिस्तानी सेना की 29 बलोच रेजिमेंट और कमांडो एसएसजी ग्रुप ने आठ जनवरी को सुबह सवा दस बजे घने कोहरे का फायदा उठाते हुए, नियंत्रण रेखा से 500 मीटर अंदर भारत की धरती पर 13 राजपूताना राइफल्स के गश्ती दस्ते पर घात लगाकर हमला करके हमारे दो जवानों के सिर काट लिए, तो पाकिस्तान को अच्छी तरह पता था कि भारत इसको हल्के में नहीं लेगा।
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जाहिर है कि यह करतूत स्थानीय पाकिस्तानी सैन्य कमांडर की नहीं है। इसके आदेश पाकिस्तानी सैन्य मुख्यालय रावलपिंडी से आए थे और इसका मूल उद्देश्य कश्मीर की 770 किलोमीटर लंबी नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर तनाव पैदा करना था।
सवाल उठता है कि पाकिस्तान जैसा देश, जिसकी अर्थव्यवस्था दीवालिया होने के कगार पर है, जो अमेरिका द्वारा दी जा रही सहायता पर पल रहा है, जिसका आंतरिक आतंक इतने चरम पर है कि उसके करीब 3,000 नागरिक हर साल आतंकी घटनाओं में मर रहे हैं और जिसे अफगानिस्तान से सटी पश्चिमी सीमा (डूरंड रेखा) पर तालिबानी हमलों से अमेरिकी सैनिकों की हिफाजत के लिए अपने सवा लाख से अधिक सैनिक लगाने पड़े हों, वह भारत से सटी अपनी पूर्वी सीमा को क्यों भड़काना चाहता है?
वास्तव में अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों में आई कड़वाहट पहले से कम हो गई है। डूरंड रेखा पर तैनात पाकिस्तानी सैनिकों के लिए अमेरिका ने तीन अरब डॉलर की बहाली भी कर दी है। यह उल्लेखनीय है कि अमेरिका 2014 के अंत तक अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को हटाने जा रहा है। उनकी वापसी के बाद वहां की सत्ता में भागीदारी को लेकर तालिबान तथा अमेरिका के बीच बातचीत चल रही है और उसमें पाकिस्तान के शामिल होने की स्वीकृति भी अमेरिका ने दे दी है।
दरअसल, पाकिस्तानी सेना अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद परोक्ष रूप से तालिबान की मदद से अफगानिस्तान पर नियंत्रण करना चाहती है, ताकि भारत के खिलाफ दीर्घकालीन इरादों पर अमल किया जा सके।
वापसी की तैयारी कर रही अमेरिकी सेना को अपने भारी हथियार, टैंक, तोपें वगैरह अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा से होकर जमीनी रास्ते से कराची बंदरगाह ले जाने हैं।
अमेरिका जानता है कि तालिबानी लड़ाके तैयार बैठे हैं और वापस जाती उसकी सेना पर घात लगाकर हमले कर सकते हैं। इसीलिए अमेरिका पाकिस्तानी सेना को तीन अरब डॉलर की सहायता दे रहा है, ताकि वह अफगान-पाक सीमा से अपने सैनिक न हटाए।
अब अगर पाकिस्तानी सेना कश्मीर में नियंत्रण रेखा को भड़का देती है, जैसा कि वह कर रही है और संयुक्त राष्ट्र में भारत को उलझाती है, तो उसे अफगानिस्तान-पाकिस्तान सीमा पर लगे अपने सैनिक कम करके उन्हें भारत के खिलाफ पूर्वी सीमा पर लाने का बहाना मिल जाएगा और फिर उसे अपने 'चेले' तालिबान से भी नहीं लड़ना पड़ेगा। यह एक पत्थर से दो चिड़ियों का शिकार करने जैसी योजना है।
इस वर्ष मई में पाकिस्तान में आम चुनाव होने हैं। पाकिस्तानी सेना नहीं चाहती कि सत्तारूढ़ पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी या विपक्षी पीएमएल (नवाज) सत्ता में आएं, क्योंकि दोनों ही भारत से अच्छे संबंध चाहती हैं और पाकिस्तानी सेना को उसकी औकात में रखना चाहती हैं। अतः सेना चाहती है कि पाकिस्तान के अपेक्षाकृत कमजोर नेता इमरान खान एवं उनकी पार्टी ‘तहरीक-ए-इंसाफ’ सत्ता में आ जाए। तब फिर तुतुहरी पाकिस्तानी सेना की ही बजती रहेगी।
पाकिस्तानी मूल के कनाडा निवासी मौलाना ताहिर-उल कादरी के संसद के बाहर हुए धरने के पीछे भी सरकार को कमजोर करने की सेना की मंशा को समझा जा सकता है। पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल कयानी कट्टरपंथी हैं एवं भारत से घृणा करते हैं। वह इस वर्ष सेनानिवृत्त हो रहे हैं। उन्हें तो तीन वर्ष पहले ही सेवानिवृत्त हो जाना था, पर उनकी सेवा अवधि हालिया सरकार ने बढ़ा दी थी। अब कयानी सत्ता नहीं छोड़ना चाहते हैं और अपनी उपयोगिता बनाए रखने के लिए ही तनाव को बढ़ावा दे रहे हैं।
भारत के पास अब और कोई विकल्प नहीं है, सिवाय इसके कि वह सतर्क रहे। साथ ही, सीमा पर भारतीय सेना को इसकी पूरी छूट हो कि वह ईंट का जवाब पत्थर से दे, पर पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध को न भड़कने दे। भारत सरकार के लिए भी लाजमी है कि वह सेना की सलाह से पाकिस्तान से भविष्य में कैसे निपटना है इसकी एक दीर्घकालीन रणनीति बनाए और उस पर अडिग रहे, फिर चाहे जिस भी पार्टी की सरकार केंद्रीय सत्ता में हो।