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कोरोना में सौंदर्य बोध और लाशों पर राजनीति

Sun, 18 Oct 2020 05:06 AM IST
Amit Mandal हेतू भारद्वाज
हेतू भारद्वाज Published by: Amit Mandal Updated Sun, 18 Oct 2020 05:06 AM IST
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Aesthetics in Corona and politics on dead people
भाजपा-कांग्रेस

अमानवीय और बर्बर घटनाओं के बीच लगता ही नहीं कि लोग कोरोना से डरे हुए हैं। ऐसे लोगों को कोरोना क्या नुकसान पहुंचा सकता है? सत्ता में बैठे लोग लाशों की राजनीति कर रहे हैं। सभी राजनीतिक दल राजनीतिक लाभ की दृष्टि से अपनी संवेदनशीलता प्रकट कर रहे हैं। राहुल-प्रियंका को किस हादसे पर पीड़ित लोगों को धीरज बंधाने जाना है, इसका निर्णय कांग्रेस करेगी। किस हादसे पर भाजपा का कलेजा फटने लगेगा, यह उसके नेता तय करेंगे। अभी राजस्थान के करौली जिले में एक पुजारी को जलाकर मार डाला या वह स्वयं जलकर मरा (इस पर टिप्पणी करना बेमानी है), पर यह तो सच है कि एक आदमी अग्नि की ज्वाला में झुलस कर मर गया। पुजारी की पीड़ा से आहत दिल्ली के कपिल मिश्रा पीड़ित परिवार की सहायता के लिए लाखों रुपया इकट्ठा कर करौली जा रहे हैं। सारा ब्राह्मण समुदाय पुजारी के पक्ष में उबल रहा है। एक सांसद जल्दी-जल्दी पुजारी की अंत्येष्टि कराने की पहल करते हैं, वह शांति बहाली का श्रेय लेते हैं।


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उधर मुख्यमंत्री इस घटना का नोटिस तक नहीं लेते। वह जानते हैं कि बयान देने का अर्थ होगा उस जाति को नाराज करना, जिस जाति के लोगों का नाम हत्यारों के रूप में लिया जा रहा है। इसीलिए तो भाजपा सांसद ने जाति का कार्ड खेलकर पूरी घटना को अपने पक्ष में भुना लिया है। ऐसे अवसरों पर हमारा बुद्धिजीवी वर्ग गंभीर विमर्श कर रहा है। हमारा मीडिया ऐसे मुद्दों की चीड़-फाड़ कर अपनी टीआरपी बढ़ा रहा है, जिनका हमारे समाज से कोई लेना-देना नहीं। तनिष्क के एक विज्ञापन ने जैसे कहर बरपा दिया। घनघोर सांप्रदायिक विज्ञापन पर दो वर्ग बन गए-एक विज्ञापन की कला के पक्ष में, दूसरा उसकी सांप्रदायिक घृणा फैलाने की शक्ति के विरोध में। तनिष्क ने वह विज्ञापन वापस ले लिया। इसके बाद यह मुद्दा समाप्त हो जाना चाहिए था।

पर संवेदनशील तथा बुद्धिजीवी वर्ग तो जागता ही तब है, जब किसी घटना को विवादास्पद बना दिया जाता है। भारत में सबसे जिम्मेदार माने जाने हिंदी चैनल पर संजीदा माने जाने वाले एंकर ने इस प्रसंग को पूरी शिद्दत से उठाया। पहले उन्होंने विज्ञापन के चित्र तथा उसके संवाद वहां कई बार दिखाए। इस बीच वह अपने प्रस्तुतीकरण में बड़ी शालीनता के साथ यह संदेश भी देते दिखे कि विज्ञापन की पृष्ठभूमि में कोई शरारत जरूर हुई है। फिर उन्होंने बुद्धिजीवियों को इस विज्ञापन पर बहस के लिए आमंत्रित किया। सबसे पहले एक महिला बुद्धिजीवी ने, जो प्रसिद्ध स्तंभकार तथा मीडिया विशेषज्ञ हैं, इस विज्ञापन की ऐतिहासिक और दार्शनिक व्याख्या की। कुछ पिछली घटनाओं के हवाले से उनका कहना था कि दर्शक इस विज्ञापन की सांप्रदायिक व्याख्या क्यों न करें? उन्होंने विज्ञापन पर चर्चा के बहाने कुछ घटनाओं की ठंडी राख कुरेदी और अपना निर्णय सुनाया कि तनिष्क को विज्ञापन वापस नहीं लेना चाहिए था। दूसरे बुद्धिजीवी ने विज्ञापन की राजनीतिक तथा दार्शनिक व्याख्या की तथा उन्होंने देश में सांप्रदायिक शक्तियों की कारगुजारियों को कोसा। वह विज्ञापन के पक्ष में रहे या विपक्ष में, उनके वक्तव्य से पता ही नहीं चला। वह बुद्धिजीवी हैं, उनका काम तो वक्तव्य तथा सैद्धांतिकी प्रतिपादित करना है। उसका अर्थ आप निकालते रहें।

अंतरराष्ट्रीय स्तर की बुद्धिजीवी का बयान उनके सौंदर्य बोध की गवाही देता है कि तनिष्क ने विज्ञापन वापस लेकर जनता को एक सुंदर और सांस्कृतिक विज्ञापन देखने से महरूम कर दिया। अनेक लोगों ने इस विज्ञापन की समाजशास्त्रीय, ऐतिहासिक, दार्शनिक तथा नृतत्व विज्ञानी व्याख्याएं प्रस्तुत कीं, जिन्हें समझना मुश्किल था। एक भी बुद्धिजीवी ऐसा नहीं था, जो एंकर को डांटकर कहता कि जब तनिष्क ने विज्ञापन वापस ले लिया है, तो मामला समाप्त हो गया है, फिर इसे जीवित रखने और अपनी टीआरपी बढ़ाने का प्रयास क्यों कर रहे हैं? पर ऐसा कोई क्यों कहे? हम कोई जोखिम क्यों उठाएं?

देश में एक और संवेदनशील वर्ग है लेखक वर्ग, जिसके मेनिफेस्टो में आदिकाल से ही अंकित है 'लेखक की जगह सत्ता के विपक्ष में ही होती है। वह हर अन्याय के विरोध में खड़ा है, उसे कोई लालच अपने लक्ष्य से डिगा नहीं सकता।' यह सबसे संवेदनशील वर्ग है। ये लोग फेसबुक पर परस्पर जन्मदिन की बधाइयां शेयर कर रहे हैं, जैसे रचनाकार का जन्म दिवस देश के लिए एक महत्वपूर्ण परिघटना है। किसी कवि की कोई कविता छपती है, तो जैसे क्रांति हो जाती है-उसके साहस और साफगोई पर पूरा लेखक समुदाय न्योछावर। यही लेखक फेसबुक पर अपने मतभेदों का हिसाब चुकता कर रहे हैं। दूसरे लेखक उसे टुच्चा और स्टैंड लेने का साहस न दिखाने वाला कायर बता रहे हैं। यह अलग बात है कि आरोप लगाने वाले ने भी कभी कोई साहस नहीं दिखाया। इस वर्ग के लोगों को एक ही रोग स्थायी रूप में सताता रहता है-आत्मक्षति का। कई महान लेखकों का इतिवृत्त जानने पर निष्कर्ष यह निकलता है कि वे जीवन भर क्वारंटीन में रहे। फिर कोरोना उनका क्या बिगाड़ लेगा? धन्य है इस वर्ग के रत्न, जिन्हें अपने अलावा कोई दिखाई नहीं देता। किसी पद, लाभ, सम्मान या पुरस्कार पर उनकी नजर जमी रहती है और जब उनकी तिकड़मों से कोई सम्मान या पुरस्कार उनके पक्ष में घोषित होता है, तो वह पूरी गंभीरता से कहते हैं, मेरी तो इन चीजों में कोई रुचि नहीं है। पता नहीं, मुझे कैसे मिल गया? वे सभ्यता-संस्कृति के रक्षक हैं, इसलिए हमेशा गरिमा में बने रहते हैं। यही उनका सौंदर्य बोध है-क्वारंटीन में बने रहेंगे, तो सुरक्षित रहेंगे।

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