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मंजिलें और भी हैं: पेशेवर खिलाड़ी बनेंगे ये आदिवासी बच्चे

Thu, 29 Aug 2019 02:35 AM IST
आदिनाथ नाइक आदिनाथ नाइक
आदिनाथ नाइक Published by: आदिनाथ नाइक Updated Thu, 29 Aug 2019 02:35 AM IST
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Adinath naik Co Founder Indian Sports Revolution says tribal children become professional players
बच्चों के साथ आदिनाथ नाइक - फोटो : अमर उजाला

सबसे पहले मैंने अपने दोस्त के साथ पुणे के चांदनी चौक इलाके में एथलेटिक्स से जुड़ा एक सेंटर शुरू किया। चूंकि हम दोनों एथलीट हैं, ऐसे में हमारा मकसद इस सेंटर पर व्यावसायिक रूप से खेलने वाले बच्चों को एथलेटिक्स का उन्नत प्रशिक्षण देना था।


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सबसे पहले मैंने अपने दोस्त के साथ पुणे के चांदनी चौक इलाके में एथलेटिक्स से जुड़ा एक सेंटर शुरू किया। चूंकि हम दोनों एथलीट हैं, ऐसे में हमारा मकसद इस सेंटर पर व्यावसायिक रूप से खेलने वाले बच्चों को एथलेटिक्स का उन्नत प्रशिक्षण देना था।

इसके साथ मैं पुणे की सोसायटियों में भी खेलों के प्रति जागरुकता से जुड़े कई कार्यक्रम चलाने लगा, इसके लिए हम थोड़ी फीस भी लेते थे। प्राइवेट स्कूलों के साथ काम करते हुए मुझे एहसास हुआ कि ये बच्चे सिर्फ मस्ती के लिए खेलते हैं। इनमें से कोई भी खेल को करियर के रूप में अपनाना नहीं चाहता, जबकि मैं और मेरा दोस्त चाहते थे कि बच्चे प्रोफेशनल एथलीट बनें। हमें पैसा तो मिल रहा था, लेकिन हमारा मकसद पूरा नहीं हो रहा था।

इसके बाद हमने प्राइवेट स्कूलों में चल रहे अपने प्रशिक्षण सेंटर बंद कर दिए। चूंकि मैं, पुणे के निकट शिरूर गांव का रहने वाला हूं, तो मैंने इस खेल को गांव की ओर ले जाने का फैसला किया और ठाणे के पास पालघर जिले में आदिवासी बच्चों के बीच जंपिंग गोरिल्ला के नाम से काम करना शुरू किया। आदिवासी बच्चों को प्रशिक्षण देने के पीछे मेरा मानना है कि, ये बच्चे एथलेटिक्स, जैवलिन थ्रो और तीरंदाजी में बहुत अच्छे होते हैं। इसकी वजह है इन बच्चों की शारीरिक बनावट, जो वैज्ञानिक तौर पर ऐसे खेलों के लिए सही होती है। इसकी एक वजह यह होती है कि ये बच्चे दिन भर दौड़ते रहते हैं और दूसरा उनमें ध्यान लगाने का गुण दूसरे शहरी बच्चों के मुकाबले ज्यादा होता है। जो लंबी और मध्यम दूरी में दौड़ने के लिए फायदेमंद होता है।

इस प्रोजेक्ट के जरिये मैं बच्चों को तीन खेलों, एथलेटिक्स, साइकिलिंग और तीरंदाजी के लिए तैयार कर रहा हूं। मैंने आदिवासी इलाकों में पांच गांवों को मिलाकर एक एक्टिविटी सेंटर बनाया है। यहां हम सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को खेल से जुड़ी बारीकियां बताते हैं। मैं अक्सर ऐसे बच्चों का चयन करता हूं, जो खेलों में रुचि रखते हैं और खेल को करियर के तौर पर अपनाना चाहते हैं।

जिन बच्चों को प्रशिक्षण दिया जाता है, उनकी उम्र आठ से लेकर पंद्रह वर्ष के बीच होती है, इनमें लड़के, लड़कियां दोनों हैं। हम अभी तकरीबन छह सौ आदिवासी बच्चों को एथलीट बनने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। हमने एक मोबाइल स्पोर्ट्स वैन बना रखी है, जिसमें खेल से जुड़ा सारा समान रहता है। यह प्रोग्राम ‘लॉफ्टी ड्रीम स्पोर्ट्स डेवेलपमेंट ट्रस्ट’ के तहत चल रहा है, जिसमें क्राउड फंडिंग व ऑनलाइन कैंपेन के माध्यम से लोग आर्थिक मदद करते हैं। ‘जंपिंग गोरिल्ला’ का प्रोग्राम लांग टर्म के हिसाब से डिजाइन किया गया है। शुरुआत के छह महीने हम इन्हें खेल की बेसिक जानकारी देते हैं।

एक साल बाद इन बच्चों में से जो बेहतर खिलाड़ी होंगे, उनको उनकी काबिलियत के हिसाब से जैवलिन थ्रो, तीरंदाजी और एथलेटिक्स के दूसरे खेलों जैसे मैराथन के हिसाब से तैयार किया जाएगा। जो बच्चे प्रतियोगिताओं के लायक तैयार नहीं हो पाएंगे, उनको इस तरह प्रशिक्षित किया जाएगा, जिससे वे सेना या पुलिस में भर्ती हो सकें या एक बेहतर कोच बन सकें। जिससे कि आने वाले वक्त में उनको रोजगार पाने में कोई परेशानी न हो। मेरी कोशिश है कि करीब एक सौ ऐसे बच्चे तैयार हो सकें, जो देश में होने वाली अलग-अलग प्रतियोगिताओं में भाग लें और इनाम जीत सकें, ताकि दूसरे आदिवासी बच्चे भी इन खेलों की ओर आकर्षित हों।

(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।)
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