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जिंदगी के बही-खाते का भर लें रिटर्न

Sat, 04 Apr 2020 09:19 AM IST
संजीव कुमार झा सौरभ शुक्ला, प्रसिद्ध अभिनेता
सौरभ शुक्ला, प्रसिद्ध अभिनेता Published by: संजीव कुमार झा Updated Sat, 04 Apr 2020 09:19 AM IST
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Actor saurabh shukla opinion on india lockdown
सौरभ शुक्ला

खाली कोई समय नहीं होता है। आप अपनी जिंदगी को देख सकते हैं, पढ़ सकते हैं, फिल्में देख सकते हैं, संगीत सुन सकते हैं। कार्य-व्यवसाय से अलग जो भी आपके शौक हैं, उन्हें पूरा कर सकते हैं, क्योंकि ऐसे समय में आप जिंदगी का दूसरा पहलू देख पाते हैं। मैं फिल्म व्यवसाय में हूं। अपना काम तो रिलीज शो वगैरह के दौरान देख लेता हूं, लेकिन व्यस्तताओं के कारण दोस्तों की बहुत सारी फिल्में नहीं देख पाता हूं। यह एक अवसर मिला है, जिसमें मैं दोस्तों के काम को देख रहा हूं।


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इसके अलावा पढ़ भी रहा हूं। पढ़ना एक ऐसी चीज है, जिसका स्वाद बहुत किस्मत वालों को ही मिलता है। पढ़ने और देखने में अंतर होता है। पढ़ने में आपकी कल्पना काफी सजग रहती है और देखने में आप कल्पना तो कर सकते हैं, लेकिन ज्यादातर जो देखते हैं, उसे ही स्वीकार करना होता है। अगर आप लिखते हैं, जैसे कि मैं लिखता हूं, तो इससे अच्छा समय फिर नहीं मिलेगा।

दुनिया में कोई आदमी ऐसा नहीं है, जिसको खुशी, दुख, मायूसी या भूख का अहसास न होता हो। जीवन को आप जिन आंखों से देखते हैं, दुनिया आपको वैसी ही दिखती है। इस अकेलेपन को आप मन की आंखों से देखें। बरसात के दिनों में जब लोग खिड़की के बाहर देखते हैं, तो किसी को लगता है कि संसार कितना सुंदर है, मन मोर की तरह नाच रहा है। वहीं दूसरे आदमी को डिप्रेशन होता है कि अंधकार है। ये हमारी मानसिक परिस्थितियां होती हैं, जिनसे हम गुजर रहे होते हैं।

मौजूदा दौर में डिप्रेशन होना स्वाभाविक है, क्योंकि इस महामारी के बारे में आप कुछ जानते नहीं हैं। भ्रम आपको उद्वेलित करता है, जबकि ऐसे समय से सीखना चाहिए। मानव ने समाज में बहुत सारी चीजों की उपेक्षा की है, जैसे- पर्यावरण का ख्याल नहीं रखा। लेकिन हताश होने की जरूरत नहीं है, यह सब कुछ प्रकृति में शुमार है। यह कोई पहली महामारी नहीं है। यह मानव समाज की परीक्षा का समय है कि हम एक-दूसरे के प्रति कितने संवेदनशील हैं। संकट के समय यह स्वाभाविक है कि हम घबराए हुए हों, लेकिन उसी दौर में हमें सकारात्मक बने रहना है।

आप अपने डॉक्टर मित्रों के बारे में सोचिए कि वे भी तो घर से निकलकर जाते हैं। क्या उनको डर नहीं है? हताशा को अगर आप चुनौती के रूप में लेकर आगे बढ़ेंगे, तो आपमें कुछ करने की इच्छा जागेगी। दुनिया में हर इंसान बात करता है, बस सबका तरीका अलग-अलग होता है। कुछ लोगों की बातें सुनने में आपको बहुत मजा आता है। फिल्मों का भी यही किस्सा है। विषय को प्रस्तुत करने का ढंग ही आपको फिल्म देखने को विवश करता है।

इसलिए हर तरह की फिल्में देखें। हरिवंशराय बच्चन ने कहा था, जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला/कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूं,/जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला। जीवन की आपाधापी अब कुछ रुकी है, तो यह वक्त है कि आप स्वयं से बात करें। हम अक्सर इच्छाओं की बात करते हैं और उन्हें पूरा करने के पीछे भागते रहते हैं। हर किसी को महंगी कारें, महंगे कपड़े, बड़ा घर चाहिए। बड़ा घर चाहिए, भले ही जरूरत छोटे घर की हो।

महंगी कार चाहिए, क्योंकि लोगों को पसंद आती हैं, रौब जमता है। लोग क्या चाहते हैं, उनके पास क्या है, इसे छोड़कर खाली समय में हम यह सोचें कि वास्तव में आप और हम क्या चाहते हैं? हमारी जिंदगी हमारी अपनी दुकान है, जहां दुकानदार भी हम हैं और खरीदार भी हम हैं। तो हिसाब-किताब करने का वक्त मिला है, कर लें। सच कहूं तो यह अपनी जिंदगी के बही-खाते का रिटर्न भरने का समय है।  

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