अचकचाया हुआ सम्मान

प्रकाश पुरोहित Updated Fri, 28 Dec 2012 12:31 AM IST
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अब जिले के अफसर हैं, तो कार्ड भेजना ही पड़ता है। हर शादी में गणेशजी को न्योता जाता है, तो क्या वह पहुंच ही जाते हैं? क्या मालूम, किस प्रोटोकॉल के चलते वह समारोह में आ गए। वैसे, उनकी यह साख है कि सम्मान समारोह में अगर चीफ गेस्ट बनाकर बुलाया जाए, तभी आते हैं, या फिर उनका सम्मान होना हो, तो आ जाते हैं।
यह अनहोनी थी कि सम्मान किसी और का था, और वह भी आकर अगली कुर्सी पर बैठ गए थे। बड़ी ही ऑकवर्ड पोजीशन हो जाती है ऐसे में। अपन यहां मंच पर बैठे-बैठे कसमसा रहे हैं, और वह वहां नीचे कुर्सी पर अनइजी हो रहे हैं। अपना तो कुछ नहीं, जहां छह का किया, सात का कर दिया। मगर उनका पक्का नहीं है कि कहें और मंच पर आकर शॉल-श्रीफल पकड़ लें। न पकड़ें, तो फिर भी कोई बात नहीं है, मगर ले भी लें और मन में खुन्नस भी पाल लें कि मुंह देखकर तिलक निकाल रहे हो, तो खामखा रिलेशन बिगड़ जाए।

ऐसे में आप पूछ भी नहीं सकते कि आपका सम्मान कर दें? कौन अफसर कहेगा कि हां, कर दो! नहीं, कार्यक्रम से एकाध दिन पहले की बात अलग है। तब तो पूछने की भी कोई बात नहीं। सूचना ही देना काफी होता है, मगर ऐसे हालात तो कभी-कभार ही आते हैं। ऐसा भी नहीं है कि आप अनदेखी कर लें-अफसर के अगाड़ी भले ही हो जाओ, अनदेखी नहीं कर सकते। ऐसे में अफसर खूंखार भी हो सकता है। वह अपनी नाक से ज्यादा मान अपनी आईएएस को देता है। आम आदमी की तरह जी सकता है वह भी मजे से, पर उसका ध्यान अपनी अफसरी में लगा रहता है।

जरा कल्पना कीजिए उस दृश्य की कि नीचे वह बेकरार हैं और यहां हम लाचार हैं। दोनों ही एक-दूसरे को हसरत भरी निगाह से देख रहे हैं, मगर कनखियों से। एक के बाद एक सम्मानित हुए चले जा रहे हैं और माहौल में तनाव घुलता जा रहा है। न सम्मान करने वाले को मजा आ रहा है, न करवाने वाले को। कर्मकांड की तरह हरकतें हो रही हैं। किए जा रहे हैं बगैर सोचे-समझे!

अभी कुछ ही बचे थे सम्मान पाने को कि अफसर को झटके से मंच पर चढ़ा लिया गया। और जब तक होश में आए, सम्मान उसके गले में हार बनकर डल गया था। वजह तो अलग से कुछ नहीं थी सम्मान करने की, फिर भी यह कहा गया कि आप जिले के अफसर हैं, यह इनके लिए नहीं, हमारे लिए सम्मान की बात है। सारे सम्मानित खुश होने लगे और तनाव खत्म हो गया।


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