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घोषणापत्र पर हो जवाबदेही

वरुण गांधी, भाजपा सांसद Updated Mon, 28 May 2018 06:32 PM IST
लोकतंत्र में जवाबदेही
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हमारे देश में, चुनावी घोषणापत्रों को सचमुच कोई नहीं पढ़ता। घोषणापत्र मतदाताओं को बमुश्किल ही प्रभावित करता है या राजनीतिक दलों के लिए वोट जुटाने में मदद करता है-इसके बजाय ज्यादा से ज्यादा इसे एक बौद्धिक या वैचारिक कसरत भर कहा जा सकता है।


आदर्श स्थिति में तो घोषणापत्र राजनीतिक प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए, जो जमीनी स्तर पर लोकतंत्र का परचम बुलंद करता है, लेकिन आजाद भारत के राजनीतिक इतिहास में इसकी शायद ही कोई भूमिका रही हो। 'गरीबी हटाओ' नारे को छोड़ दें, तो किसी को बमुश्किल कांग्रेस के 1971 के घोषणापत्र की कोई और बात याद होगी।


भारत जैसे आधुनिक दौर के लोकतंत्र में चुनावी घोषणापत्र कई मकसद हल कर सकते हैं। यह अनिश्चय की स्थिति वाले मतदाताओं को किसी पार्टी के सत्ता में आने पर उसके कार्यकाल की झलक दिखाने का जरिया हो सकते हैं; यह वैचारिक और क्षेत्रीय विविधताओं वाले समूहों के लिए पार्टी का समावेशी एजेंडा हो सकता है; कुछ राजनीतिक मौकापरस्ती से प्रेरित हो सकते हैं, जबकि कुछ उच्च नैतिक आदर्शों से प्रेरित हो सकते हैं। भारत में फैलते शहरी दायरे के साथ बढ़ते मध्य वर्ग को आकर्षित करने के लिए चुनावी घोषणापत्र की खोज हुई।

चुनौती सिर्फ तब है, जब चुनावी वायदे पूरे न किए जाएं; झूठ का पर्दा हट जाता है। इसकी एक वजह घोषणापत्रों की प्रकृति में ही निहित है- हाउस ऑफ लार्ड के जाने-माने विद्वान सदस्य लार्ड डेनिंग ने कहा था कि किसी राजनीतिक पार्टी का चुनावी घोषणापत्र ईश्वरीय वाणी नहीं है, न ही कोई हस्ताक्षरित बांड। ऐसी ही बात पूर्व में भारत के एक मुख्य न्यायाधीश ने भी कही थी, 'चुनावी घोषणापत्र कागज का एक टुकड़ा भर बनकर रह गए हैं' और राजनीतिक दलों को इसके लिए उत्तरदायी बनाया जाना चाहिए।

समय के साथ राजनीतिक दल घोषणापत्र के वायदों को पूरा नहीं करने के लिए अजीबोगरीब बहाने (जैसे कि पार्टी सदस्यों में एक राय नहीं है) बनाने लगे। साल 2004 में कई दलों ने महिला आरक्षण विधेयक का वायदा किया था, फिर 2009 और फिर 2014 में यही वायदा दोहराया गया, लेकिन इसके बावजूद कि अभी हाल तक चार प्रमुख राजनीतिक दलों की अध्यक्ष महिलाएं थीं, सत्ता और विपक्ष में रहते हुए भी कोई उल्लेखनीय कदम नहीं उठाए गए। 

वायदों को पूरा कराने के लिए न्यायिक उपाय सीमित हैं- एडवोकेट मिथिलेश कुमार पांडेय द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई जनहित याचिका से यह बात साफ हो गई कि अदालत का काम पूरा न किए गए वायदे को पूरा कराना नहीं है। खंडपीठ ने इस याचिका को 'अयोग्य' पाते हुए खारिज कर दिया। 2014 के आम चुनाव के लिए चुनाव आयोग द्वारा तैयार आदर्श आचार संहिता के दिशा-निर्देशों में राजनीतिक दलों द्वारा अपने घोषणापत्रों में ऐसे वायदे करने से मना किया गया था, जो मतदाताओं पर अवांछित असर डालते हों।  

हालांकि आदर्श आचार संहिता को भी उसी तर्क से कानून द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता और यह एक व्यर्थ की कवायद रह जाती है। चुनाव आयोग ने इसका पालन कराने की कोशिश की- इसमें अगस्त, 2016 में अन्ना द्रमुक द्वारा तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2016 के घोषणापत्र में किए गए चुनावी वायदे को पूरा करने के लिए तर्कपूर्ण वित्तीय प्रबंध और साधन नहीं बता पाने पर इसे सेंसर कर दिया था। यह जरूरी है कि वैधानिक प्रावधान करके राजनीतिक दलों को उनके चुनावी वायदों को पूरा करने के लिए उत्तरदायी बनाया जाए। 

कार्मिक, जन शिकायत, कानून और न्याय पर संसद की स्थायी समिति ने सिफारिश की थी कि आदर्श आचार संहिता को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाया जाए और इसे जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 का हिस्सा बनाया जाए। ऐसे उपायों से चुनाव आयोग की शक्तियां बढ़ेंगी और राजनीतिक दलों में चुनावी घोषणापत्र में खोखले वादे न करने का डर पैदा होगा।  

वायदे पूरे नहीं करने पर जनता तो गद्दी से उतार ही सकती है, पर इसके साथ ही जुर्माने का भी प्रावधान होना चाहिए। कठोर कानूनी उत्तरदायित्व से हमारी राजनीतिक व्यवस्था में वायदे करके भूल जाने की आदत के खात्मे के साथ ही फिर से जिम्मेदारी का एहसास पैदा होगा।  

हमें दो स्तरों पर काम करना होगा-कानून, जिससे चुनावी घोषणा से जुड़े वायदों को पूरा करना कानूनन बाध्यकारी होगा और एक सिविल निगरानी व्यवस्था, जो राजनीतिक दलों के वायदे करने और फिर उन्हें पूरा न करने पर निगरानी रखेगी। ऐसे कानून के तहत किसी संस्था या व्यवस्था को यह जिम्मेदारी दी जा सकती है कि वह सरकार के कार्यकाल के अंतिम वर्ष में चुनावी घोषणापत्र में किए वायदों को पूरा किए जाने पर फैसला देगी। इसके साथ चुनाव से पहले ही गठबंधन के साझीदारों के बीच एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय होना चाहिए; आजकल गठबंधन राजनेताओं को चुनावी घोषणापत्र से बच निकलने का आसान रास्ता दे देता है। 

भारतीय लोकतंत्र के दो रास्ते हैं-एक उस दिशा में जाता है, जहां हर राजनीतिक दल नीति और तरीके में मामूली बदलाव के साथ एक ही किस्म के वायदे कर रहा है, चुनाव को अमीरों के लिए निवेश बना दिया जाए, जिसमें हर एक की क्रय-शक्ति से उसकी भूमिका तय होती है; दूसरा रास्ता है- आसमान से तारे तोड़ लाने वाले वायदों की सिविल सोसाइटी द्वारा निगरानी की जाए, कानूनी पकड़ हो और राजनीतिक दलों में खुद भी जवाबदेही हो।

अगर लोकतंत्र निर्वाचित प्रतिनिधियों और आम जनता के बीच एक सामाजिक संविदा है, तो चुनावी घोषणापत्र को विधिक संविदा मानना चाहिए, जिसके माध्यम से देश के विकास का एजेंडा आगे बढ़ाया जाना है। भारत का लोकतंत्र ठीक से फले-फूले, इसके वास्ते जरूरी है कि घोषणापत्र के लिए हर हाल में उत्तरदायित्व तय किया जाए। 

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