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सुगर फ्री आम पर गाली गाथा

Tue, 22 Jul 2014 06:51 PM IST
अशोक सण्ड
अशोक सण्ड Updated Tue, 22 Jul 2014 06:51 PM IST
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abuse story on Sugar Free Mango

कदाचित उनकी कसौटी पर मीठे नहीं थे आम। खाते-खाते आम वाले के ‘खाते’ में गालियां भी जमा कर रहे थे वह। भगवन, आप पढ़े-लिखे होने के बावजूद मीठा नहीं बोल रहे हैं। वह अनपढ़ आम के अंदर तो बैठा नहीं था। अपशब्दों पर विराम लगाने की कुचेष्टा की मैंने। क्यों न दूं गालियां उसे, द्रुत अलाप में चिल्ला रहा था, चौसा...चौसा... रस भरा चौसा.... दसहरी का मौसा... मेरी बात काटते हुए उन्होंने कही।

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इस काव्यमय लयात्मकता की मार्केटिंग के लिए जिसकी दाद देनी चाहिए, उसे गरिया रहे हैं आप। लगता है, कभी लंगड़ा आम बेचने वालों से आप का पाला नहीं पड़ा। 'बाबूजी लंगड़े हैं...बाबूजी लंगड़े हैं...' चिल्लाकर न सिर्फ हम-आपको बुलाते हैं, बल्कि पूरी रेहड़ी बेच डालते हैं। अप्रिय शब्दों का जामा नाहक अनुपस्थित गरीब को पहना रहे हैं आप। इससे अपनी जुबान ही खराब होती है। गुठली फेंकने के बाद बोले, पंडिज्जी, मन का आपा खोने और शीतल वाणी से रिलेटेड सभी नसीहतें अपनी मेमोरी से डिलीट कर दें। प्रियं ब्रूयात के दिन लद चुके।
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इसके पहले कि मैं गाली-गाथा पर विराम लगाता, उन्होंने गियर बदल स्पीड पकड़ ली और स्वीकारा कि उनकी भाषा भले देशज हो गई हो, लेकिन सलीके से गाली शायरों ने भी दी है। ईद के दिन भी वो गले न मिला/ साल-ए-आइंदा तक रहेगा गिला, महाकवि निराला ने गुलाब को महोदय या श्रीमान संबोधित नहीं किया। राही मासूम रजा का आधा गांव बिना गालियों के बिना नमक की सब्जी और सुगर फ्री जलेबी जैसा लगेगा।
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वैसे न वह राम थे, और न आम बेचने वाला शबरी, जो सिर्फ मीठे आम मिलते उनको। अलबत्ता सुगर फ्री आमों पर जाग उठा था उनके अंदर का परशुराम। रूबरू होकर आम वाले को गरियाते, तो भद्दी गालियां उनके पाले में रिवाइंड होकर आ सकती थीं। पीठ पीछे सिंगल मैच खेल वॉकओवर की मुद्रा में नजर आ रहे थे वह। चलते समय आभिजात्य-भाव में जब उन्होंने हाथ मिलाया, तो चिपचिपा रहा था उनका हाथ।

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