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स्वस्थ भारत की दिशा में : परिदृश्य में बड़ा परिवर्तन ला सकती है आयुष्मान भारत योजना

Tue, 01 Oct 2019 06:39 AM IST
अमीरा शाह अमीरा शाह
अमीरा शाह Published by: अमीरा शाह Updated Tue, 01 Oct 2019 06:39 AM IST
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Aayushman Yojana-Towards healthy India
आयुष्मान योजना - फोटो : अमर उजाला

समाज के कमजोर वर्ग को प्रभावकारी स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए आयुष्मान भारत एक महत्वाकांक्षी योजना है। सरकार की मंशा है कि सेवा प्रदाता की भूमिका से आगे बढ़कर अब वह मददकर्ता की भूमिका निभाए। यह एक शुभ समाचार है।


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स्वास्थ्य सेवाओं पर कम खर्च करने के कारण केंद्र को अब तक आलोचना का सामना करना पड़ता रहा है। उल्लेखनीय है कि स्वास्थ्य सुविधाओं पर सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1.4 प्रतिशत खर्च किया जाता रहा है, जो दुनिया में सबसे कम है। कार्यबल की कमी, कमजोर अवसंरचना, कमजोर गुणवत्ता और सेवाओं की अनुपलब्धता के कारण देश की स्वास्थ्य प्रणाली चरमरा गई है। बहरहाल, डॉ. इंदु भूषण के नेतृत्व और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कुशल मार्गदर्शन के तहत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएम-जेएवाई) भारत में स्वास्थ्य परिदृश्य में आमूल परिवर्तन ला सकती है।

परामर्शदाता कंपनी बैन ऐंड कंपनी ने ‘इंडिया लाइफ साइंसेज रिपोर्ट 2019’ नामक अपनी नई रिपोर्ट में कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आयुष्मान भारत योजना से आशा की जाती है कि 'विकसित ग्रामीण' क्षेत्रों और अगले दशक में मध्य वर्ग में शामिल होने वाले संभावित 14 करोड़ घरों की स्वास्थ्य सेवा मांग के लिए वह एक महत्वपूर्ण प्रेरक तत्व के रूप में काम करेगी।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण द्वारा कार्यान्वित यह प्रभावकारी योजना सार्वजनिक क्षेत्र के साथ उचित भागीदारी के जरिये आबादी के सभी वर्गों को सही रूप में स्वास्थ्य सुविधा प्रदान कर सकती है। इसके अलावा, सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज को हकीकत बनाने के संबंध में प्रयासों को मजबूत बनाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन की पहलों के अनुरूप भारत का यह कदम सही समय पर उठाया गया है।

वर्ग आधारित, स्तर आधारित और टुकड़ों में विभाजित कार्यक्रमों के कार्यान्वयन से आगे बढ़कर आयुष्मान भारत एक समग्र, संपूर्ण और आवश्यकता आधारित स्वास्थ्य प्रणाली उपलब्ध कराने की दिशा में बढ़ रहा है। इसके कार्यान्वयन में होने वाले परिवर्तन के कारण यह अपने पहले वर्ष में ही सफल हो गया है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना की तुलना में पीएम-जेएवाई ज्यादा बड़ा जोखिम कवरेज (पांच लाख रुपये प्रतिवर्ष प्रति परिवार) प्रदान कर रहा है। इससे भारत के राज्यों को स्वास्थ्य बीमा योजनाओं को इसके साथ एकीकृत करने का अवसर मिला है। एक रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक ने अपनी मौजूदा सात स्वास्थ्य सेवा योजनाओं का तथा केरल ने तीन विभिन्न योजनाओं का इसके साथ विलय कर दिया है।

इसके अलावा राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण भी राज्यों को उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप योजना को अपनाने में सक्षम बना रहा है। केंद्र के कड़े नियमन तथा राज्यों की स्वतंत्रता और लचीलेपन के बल पर इस कार्यक्रम को तेजी से चलाने में सहायता मिलेगी।

कार्यक्रम से एक महत्वपूर्ण पक्ष उजागर हुआ है कि 62 प्रतिशत उपचार निजी अस्पतालों में किया जाता है। लगभग 20 हजार अस्पतालों को इसके पैनल में रखा गया है, जिनमें से 53 प्रतिशत अस्पताल निजी क्षेत्र के हैं। निजी अस्पतालों की यह संख्या इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कार्यक्रम के परिपक्व होने, अधिक जागरूकता पैदा होने और मरीजों की संख्या बढ़ने के मद्देनजर यह रुझान आगे और बढ़ेगा। दायरा बढ़ने पर निजी क्षेत्र की भागीदारी भी बढ़ेगी।

सार्वजनिक-निजी साझेदारी स्वास्थ्य सुविधा एक ठोस मॉडल है तथा वह सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुविधा विजन को प्राप्त करने में अहम भूमिका निभाएगा। देश की जनता को स्वास्थ्य सुविधा प्रदान करने के मद्देनजर सरकार को निजी क्षेत्र की क्षमता का जायजा लेना चाहिए। यदि निजी क्षेत्र को परिमाण और राजस्व का सतत प्रतिमान उपलब्ध होगा, तो कार्यक्रम और तेजी से आगे बढ़ेगा। सीजीएचएस योजना की अड़चनों तथा विलंबित भुगतानों को देखते हुए पीएम-जेएवाई योजना का शुरुआती फीडबैक है कि यह योजना पूरी पारदर्शिता के साथ चलाई जा रही है।

यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा सेवाएं तथा महत्वपूर्ण मातृत्व और बाल स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के संबंध में किस तरह 1,50,000 स्वास्थ्य एवं आरोग्य केंद्रों की योजना पूरा करती है। ये केंद्र जागरूकता पैदा करने, गैर-संचारी रोगों की स्क्रीनिंग करने और अस्पताल में फॉलो-अप मामलों के संबंध में महत्वपूर्ण है। कार्यक्रम के पहले वर्ष में 19,282 केंद्र चालू किए गए हैं, जो सराहनीय उपलब्धि है तथा अवसंरचना को मजबूत बनाने के लिए बड़ा कदम है।

आयुष्मान भारत ने ठोस सूचना प्रौद्योगिकी और डाटा प्रणालियों में सही निवेश किया है, जो फर्जी और संदिग्ध भर्तियों की निशानदेही करने के लिए एक बड़ा कदम है। योजना के लाभों का दुरुपयोग करने वाले अस्पतालों को काली सूची में डालने का कदम भी सराहनीय है। कार्यक्रम को क्रियान्वित करने वाली एजेंसी राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण की जवाबदेही के स्तर को बढ़ाने के लिए यह सही उदाहरण है।

आयुष्मान भारत के दायरे में निदान को शामिल करना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि अधिकतर भारतवासियों की बेहतर गुणवत्ता वाली और सस्ती निदान सेवाओं तक पहुंच नहीं है। 70 प्रतिशत चिकित्सा निर्णय पैथोलॉजी रिपोर्टों पर आधारित होते हैं। उल्लेखनीय है कि पैथोलॉजी गतिविधियां नियमों के अभाव में दुरुस्त नहीं हो पाती हैं। पीएम-जेएवाई में निदान पक्ष को शामिल करने से चिकित्सकों और मरीजों को बहुत लाभ होगा।

पंद्रहवें वित्त आयोग द्वारा स्वास्थ्य क्षेत्र में गठित एक उच्च स्तरीय समूह ने सिफारिश की है कि 2022 में 75वें स्वतंत्रता दिवस पर ‘स्वास्थ्य का अधिकार’ को बुनियादी अधिकार घोषित किया जाए तथा स्वास्थ्य के विषय को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में शामिल करने के लिए संविधान में संशोधन किया जाए। हमें आशा है कि इस कदम से केंद्र को नियमों को लागू करने के लिए अधिक शक्ति मिलेगी। राज्यों को सही दिशा देने के संबंध में आयुष्मान भारत ने अपनी उपयोगिता साबित कर दी है। इसके तहत बरती जाने वाली उच्च स्तरीय पारदर्शिता और डाटा विश्लेषण के जरिये इस योजना को अगले 2 वर्षों में 50 करोड़ लाभार्थियों तक पहुंचाने की आवश्यकता है।

-लेखिका हेल्थकेयर क्षेत्र की उद्यमी हैं।

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