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जर्द पत्तों के बन में एक उम्मीद का जगना
तवलीन सिंह
Updated Fri, 14 Sep 2012 03:59 PM IST
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जर्द पत्तों का बन, जो मेरा देस है। दर्द का अंजुमन जो मेरा देस है। फैज अहमद फैज ने अपने देश का दर्द शब्दों में व्यक्त किया था, दशकों पहले। लेकिन आज के भारत के बारे में अगर किसी कवि ने कहा होता कि ऐसा देश है यह जहां पतझड़ का माहौल है, जहां दर्द की इंतिहा है,तो गलत ना होता। यह बात भी गलत ना होती कि हम भारतवासी सामाजिक अन्याय और रोजमर्रा की परेशानियों के आदि हो गए हैं इतने क आंखें बंद करके या तो सह लेते हैं या मुंह मोड़ कर चले जाते हैं उस जगह से जहां दर्द या अन्याय की कोई दृश्य होता हो। इसलिए बहुत बड़ी खुशी की बात है कि आमिर खान का टीवी प्रोग्राम 'सत्यमेव जयते', इतना सफल रहा है कि जाने-माने विदेशी अखबारों ने भी इसकी तारीफ की है।
आमिर सत्यमेव जयते द्वारा शायद वह करके दिखा रहे हैं, जो अन्ना हजारे और उनके समर्थक नहीं कर पाए हैं। बिना अनशन पर बैठे, बिना नारे लगाए आमिर ने अपने प्रोग्राम में ऐसे मुद्दे उठाए हैं और उनके समाधान के ऐसे जरिये बताए हैं कि चुपके से एक सामाजिक इंकलाब की बुनियाद रख दी गई है, जर्द पत्तों के बन में। मुमकिन है कुछ पत्ते हरे-भरे भी हो गए होंगे। बॉलीवुड के अन्य सितारों की तरह आमिर भी कोई मजेदार हंसाने, नचाने वाला प्रोग्राम बना सकते थे, जो उनकी शोहरत के बलबूते पर अपने आप सफल हो जाता। ऐसा उन्होंने नहीं किया।
उन्होंने अलग रास्ता चुना, जो उनको लेकर गया इस देश के उन गली-कूचों में जहां दर्द, अन्या, गंदगी और लाचारी इतनी देखने को मिलती है कि शर्मिंदा कर देती हैं हम जैसे लोगों को भी, जो भारतीय होने पर नाज करते हैं। उन्होंने यह अलग रास्ता क्यों चुना? किसकी सोच से पैदा हुआ सत्यमेव जयते? इन सवालों को लेकर मैं पिछले सप्ताह मुंबई में आमिर और उनकी पत्नी किरण से मिलने गई। मुलाकात तय हुई देर शाम को उनके घर पर, क्योंकि आमिर दिन भर किसी फिल्म की शूटिंग में मशरूफ थे। सारा दिन काम करने के बाद अगर थके हुए थे आमिर, तो इस बात को उन्होंने छिपा कर रखा और जब मैंने उनसे पूछा कि सत्यमेव जयते का विचार आया कैसे और किसको तो उनका चेहरा खिल सा उठा।
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उन्होंने कहा, 'कोई 15 वर्षों से मेरे दिमाग में इस प्रोग्राम के बीज थे, तो जब स्टार प्लस के उदय शंकर मेरे पास एक गेम शो का प्रस्ताव लेकर आए, तो मैंने उनसे कहा कि टीवी पर अगर आऊंगा तो गेम शो करने नहीं बल्कि एक ऐसा प्रोग्राम करने जिससे समाज का, देश का कुछ भला हो।' इस तरह रखी गई सत्यमेव जयते की नींव कोई दो वर्ष पहले। इन दो वर्षों में आमिर की टीम ने दिन-रात एक करके मेहनत की। खूब चर्चा के बाद पहले विषय तय हुए। ऐसे विषय जो इस देश के माथे पर कलंक की तरह दिखते हैं, लेकिन जिनका जिक्र तक हम करना पसंद नहीं करते हैं। कन्या भ्रूण हत्या का मुद्दा, महिलाओं के साथ अपने ही घरों में हिंसा का मुद्दा, दलितों के साथ खुलकर होती शर्मनाक बदसलूकी का मुद्दा, बुजुर्गों के साथ बेदर्दी का मुद्दा। और इससे भी गंभीर नुक्सान जो लापरवाही या गलत नीतियों के कारण हो रहा है देश के पर्यावरण को, देश की पवित्र नदियों को, उनसे जुड़े मुद्दे।
ऐसा नहीं कि इन मुद्दों को हम जैसे पत्रकारों ने उठाया ही नहीं है। विनम्रता से अर्ज करती हूं कि ऐसे मुद्दों को मैंने खुद उठाया है कई बार, लेकिन उस अंदाज से नहीं जैसे आमिर ने इनको पेश किया है सत्यमेव जयते में। अगर आमिर ने एक बार भी किसी पर इलजाम लगाए होते या ऊंगली उठाई होती, तो प्रोग्राम का चरित्र ही बदल जाता और शायद उसके कामयाब होने की गुंजाइश भी। आमिर ने सिर्फ दर्पण उठा कर देश के चेहरे पर फोड़े और घाव दिखाए हैं इतनी संवेदनशीलता के साथ कि, कुछ मुट्ठी भर लोगों के अलावा किसी को ऐतराज तक नहीं हुआ है।
मैंने जब उनसे लोगों की प्रतिक्रिया के बारे में पूछा, तो वह हंस पड़े। कहने लगे, 'जिनसे उम्मीद रखते थे समर्थन की, यानी मीडिया से, तो उनसे मिली दुत्कार और जिनसे समर्थन की उम्मीद ही नहीं थी, यानी राजनेता, उनसे समर्थन मिला। ' वास्तव में देश के मीडिया ने या तो सत्यमेव जयते की फिजूल आलोचना की है या चुप्पी साधी है। कारण? ईर्ष्या।मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई जब देखा कि आमिर वह काम कर रहे हैं, जो हम पत्रकारों का होना चाहिए। इसलिए अंत में यही कहूंगी कि इस पत्रकार की तरफ से आमिर को तहे दिल से सलाम। बॉलीवुड के गगन में पहले से ही थे वह चमकते सितारे, लेकिन अब उस चमक की बात ही और है।
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आमिर सत्यमेव जयते द्वारा शायद वह करके दिखा रहे हैं, जो अन्ना हजारे और उनके समर्थक नहीं कर पाए हैं। बिना अनशन पर बैठे, बिना नारे लगाए आमिर ने अपने प्रोग्राम में ऐसे मुद्दे उठाए हैं और उनके समाधान के ऐसे जरिये बताए हैं कि चुपके से एक सामाजिक इंकलाब की बुनियाद रख दी गई है, जर्द पत्तों के बन में। मुमकिन है कुछ पत्ते हरे-भरे भी हो गए होंगे। बॉलीवुड के अन्य सितारों की तरह आमिर भी कोई मजेदार हंसाने, नचाने वाला प्रोग्राम बना सकते थे, जो उनकी शोहरत के बलबूते पर अपने आप सफल हो जाता। ऐसा उन्होंने नहीं किया।
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उन्होंने अलग रास्ता चुना, जो उनको लेकर गया इस देश के उन गली-कूचों में जहां दर्द, अन्या, गंदगी और लाचारी इतनी देखने को मिलती है कि शर्मिंदा कर देती हैं हम जैसे लोगों को भी, जो भारतीय होने पर नाज करते हैं। उन्होंने यह अलग रास्ता क्यों चुना? किसकी सोच से पैदा हुआ सत्यमेव जयते? इन सवालों को लेकर मैं पिछले सप्ताह मुंबई में आमिर और उनकी पत्नी किरण से मिलने गई। मुलाकात तय हुई देर शाम को उनके घर पर, क्योंकि आमिर दिन भर किसी फिल्म की शूटिंग में मशरूफ थे। सारा दिन काम करने के बाद अगर थके हुए थे आमिर, तो इस बात को उन्होंने छिपा कर रखा और जब मैंने उनसे पूछा कि सत्यमेव जयते का विचार आया कैसे और किसको तो उनका चेहरा खिल सा उठा।
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उन्होंने कहा, 'कोई 15 वर्षों से मेरे दिमाग में इस प्रोग्राम के बीज थे, तो जब स्टार प्लस के उदय शंकर मेरे पास एक गेम शो का प्रस्ताव लेकर आए, तो मैंने उनसे कहा कि टीवी पर अगर आऊंगा तो गेम शो करने नहीं बल्कि एक ऐसा प्रोग्राम करने जिससे समाज का, देश का कुछ भला हो।' इस तरह रखी गई सत्यमेव जयते की नींव कोई दो वर्ष पहले। इन दो वर्षों में आमिर की टीम ने दिन-रात एक करके मेहनत की। खूब चर्चा के बाद पहले विषय तय हुए। ऐसे विषय जो इस देश के माथे पर कलंक की तरह दिखते हैं, लेकिन जिनका जिक्र तक हम करना पसंद नहीं करते हैं। कन्या भ्रूण हत्या का मुद्दा, महिलाओं के साथ अपने ही घरों में हिंसा का मुद्दा, दलितों के साथ खुलकर होती शर्मनाक बदसलूकी का मुद्दा, बुजुर्गों के साथ बेदर्दी का मुद्दा। और इससे भी गंभीर नुक्सान जो लापरवाही या गलत नीतियों के कारण हो रहा है देश के पर्यावरण को, देश की पवित्र नदियों को, उनसे जुड़े मुद्दे।
ऐसा नहीं कि इन मुद्दों को हम जैसे पत्रकारों ने उठाया ही नहीं है। विनम्रता से अर्ज करती हूं कि ऐसे मुद्दों को मैंने खुद उठाया है कई बार, लेकिन उस अंदाज से नहीं जैसे आमिर ने इनको पेश किया है सत्यमेव जयते में। अगर आमिर ने एक बार भी किसी पर इलजाम लगाए होते या ऊंगली उठाई होती, तो प्रोग्राम का चरित्र ही बदल जाता और शायद उसके कामयाब होने की गुंजाइश भी। आमिर ने सिर्फ दर्पण उठा कर देश के चेहरे पर फोड़े और घाव दिखाए हैं इतनी संवेदनशीलता के साथ कि, कुछ मुट्ठी भर लोगों के अलावा किसी को ऐतराज तक नहीं हुआ है।
मैंने जब उनसे लोगों की प्रतिक्रिया के बारे में पूछा, तो वह हंस पड़े। कहने लगे, 'जिनसे उम्मीद रखते थे समर्थन की, यानी मीडिया से, तो उनसे मिली दुत्कार और जिनसे समर्थन की उम्मीद ही नहीं थी, यानी राजनेता, उनसे समर्थन मिला। ' वास्तव में देश के मीडिया ने या तो सत्यमेव जयते की फिजूल आलोचना की है या चुप्पी साधी है। कारण? ईर्ष्या।मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई जब देखा कि आमिर वह काम कर रहे हैं, जो हम पत्रकारों का होना चाहिए। इसलिए अंत में यही कहूंगी कि इस पत्रकार की तरफ से आमिर को तहे दिल से सलाम। बॉलीवुड के गगन में पहले से ही थे वह चमकते सितारे, लेकिन अब उस चमक की बात ही और है।