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निजता का आधार
रीतिका खेरा
Updated Sat, 26 Aug 2017 02:25 PM IST
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रीतिका खेरा
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बहुत लोगों का यह मानना है, कि निजता का अधिकार, जो पिछले कुछ महीनों से चर्चा में रहा है, उच्च वर्ग से संबंधित कोई विशिष्ट बात है, सामान्य लोगों का इससे कुछ खास लेना-देना नहीं है। जब निजता के अधिकार पर, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही थी, तब सरकार ने भी ऐसी ही कोशिश की, कि न्यायाधीशों को राजी किया जाए कि यह, मौलिक अधिकार नहीं, सामान्य हक है।
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मगर 24 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय नौ जजों की संविधान पीठ का जो निर्णय आया है, उससे यह साबित हो जाता है कि सरकारी पक्ष की दलीलें कितनी कमजोर, प्रतिगामी और आपत्तिजनक थीं। नौ-जजों के निर्णय ने सामान्य नागरिकों के हकों को और आगे बढ़ाया है।
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लेकिन पहले यह समझ लेना चाहिए कि हम यहां तक पहुंचे कैसे? जुलाई-अगस्त 2015 में जब आधार से जुड़े मामलों पर सुनवाई चल रही थी, तब अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी इस सवाल पर फंस रहे थे कि किन-किन तरीकों से आधार निजता पर प्रहार करता है। सबसे पहले लोगों के शरीर पर, क्योंकि इसमें हमें अपने बॉयोमैट्रिक- आंखों की पुतली और उंगलियों के निशान- देने पड़ते हैं, जिसका इतिहास अपराध से जुड़ा है। फिर सरकार राशन, पेंशन, मध्याह्न भोजन, आयकर रिटर्न, टेलीफोन कनेक्शन, बैंक खाता इत्यादि सेवाओं से लेकर हर जगह आधार नंबर मांग रही है; और इसके पीछे तर्क क्या है, उसका वह सही जवाब भी नहीं दे सक रही है। तीसरा, याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने यह भी समझाया कि कैसे आधार प्रोजेक्ट नागरिक स्वतंत्रता को जबर्दस्त हानि पहुंचा सकता है।
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इसे समझना जरूरी है– यदि आधार नंबर देश के सभी निजी और सरकारी डाटाबेस से जुड़ जाएगा, तो इससे यह होगा कि आधार नंबर के द्वारा आप किसी की भी पूरी जिंदगी की तस्वीर बना सकेंगे। ऐसी स्थिति में, जब हमें हर वक्त लगेगा कि हम पर कोई नजर रख रहा है, तब हम अपना रवैया बदल देंगे, जो हमारी स्वतंत्रता को सीमित करेगा। उदाहरण के लिए, ट्रैफिक लाइट से गुजरने पर, यदि पुलिस खड़ी हो, तो चाहे आप सब कुछ सही कर रहे हों (सीट बेल्ट, हेल्मेट, स्पीड इत्यादि), फिर भी आप सतर्कता से, मन में एक सेकंड के लिए घबराहट से वहां से गुजरते हैं। या इसे इस तरह समझिए कि सब जगह सीसीटीवी कैमरे लगे हों और आप उसकी उपस्थिति के बारे में सचेत हों, तो क्या आप सामान्य रूप से व्यवहार कर सकेंगे? क्या ऐसी सतर्कता-घबराहट के साथ जीना भी कोई जीना होगा? आधार नंबर का सब जगह होना किसी ट्रैफिक पुलिस या सीसीटीवी कैमरे की नजर में होने के समान होगा। चाहे ट्रैफिक पुलिस का ध्यान कहीं और ही क्यों न हो, चाहे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज कभी कोई न देखे, फिर भी ये अपनी उपस्थिति से ही हमारे व्यवहार पर व्यापक असर करते हैं। इस तरह की निगरानी में जीवन जीना नागरिक अधिकार की हानि है।
दुख की बात तो यह है कि ऐसी नौबत आई ही क्यों? आधार प्रोजेक्ट पिछली यूपीए सरकार द्वारा शुरू किया गया था। उस समय गलत तथ्यों के आधार पर, यूपीए-2 ने देशवासियों को यह समझाने की कोशिश की कि आधार से कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार घटेगा। तब के गलत-तथ्यों की सच्चाई आज सरकारी आंकड़ों के रूप में सामने आ रही है। उस समय, भाजपा आधार का जोरदार ढंग से विरोध कर रही थी। मगर सरकार बनाने के बाद, भाजपा का रुख बदल गया और उसने आधार को यूपीए-2 से भी कहीं अधिक जोर-शोर से आगे बढ़ाया।
आखिर इक्कीसवीं सदी में, दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सरकार उस देश के सर्वोच्च न्यायालय के पास क्यों यह दलील लेकर गई कि निजता का अधिकार मौलिक है ही नहीं। (सरकारी पक्ष ने यह भी कहा और चाहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले 40 वर्ष में जिन निर्णयों में इसे मौलिक अधिकार माना है, फिर से उनकी समीक्षा करे)। निर्णय आने के बाद सरकार के मंत्री और प्रवक्ता अब यह कहने लगे हैं, कि उनका हमेशा से ही यही दावा था कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है!
अपना पक्ष रखते समय, सरकारी वकीलों ने एक और आपत्तिजनक दलील दी – कि यदि निजता का अधिकार हो भी, तो भी वह जीने के अधिकार के अधीन है और चूंकि, उनके अनुसार, आधार जीने के अधिकार से जुड़ा है, इसलिए आधार तो रहना ही चाहिए।
आधार और कल्याणकारी योजनाओं की सच्चाई इससे बिल्कुल विपरीत है। सरकार का दावा है कि आधार से कल्याणकारी योजनाओं में बचत हुई है। ऐसा लगता है कि बचत की परिभाषा ही बदल गई है – गांवों में बूढ़े लोगों और विधवाओं की पेंशन रुक गई, उन्हें पता नहीं क्यों। बैंक जाने से पता चलता है कि आधार नहीं दिया गया, इसलिए नाम कट गया। ऐसे कटे हुए नामों को सरकार ‘ फर्जी’ मान रही है, और ‘बचत’ के रूप में पेश कर रही है।
सरकार अब इस उम्मीद पर टिकी है कि फैसले में कहा गया है कि निजता पर कुछ 'उचित नियंत्रण’ हो सकता है, जिनमें से एक है, 'सरकारी कल्याणकारी खर्च को व्यर्थ होने से बचाना'। यदि आज कल्याणकारी खर्च व्यर्थ हो रहा है, तो वह आधार से जुड़ी प्रौद्योगिकी कर रही है। पॉइंट ऑफ सेल (पॉस) मशीन, इंटरनेट और मोबाइल, लोगों की परेशानी बढ़ा रहे हैं, साथ ही, वे चोरी रोकने में विफल हैं। पहले यह हुआ करता था कि राशन की दुकान पर डीलर रजिस्टर में 35 किलोग्राम चढ़ाकर लोगों को मात्र 30-32 किलोग्राम अनाज ही देता था। यह उसकी दादागिरी थी। आज रजिस्टर की जगह पॉस मशीन ने ले ली है, लेकिन दादागिरी और चोरी पहले की तरह ही चल रही है। आधार निजता के अधिकार और जीने के अधिकार, दोनों के लिए हानिकारक है।