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खुद से इंसाफ करता एक समाज

Wed, 19 Nov 2014 07:52 PM IST
विजय त्रिपाठी
विजय त्रिपाठी Updated Wed, 19 Nov 2014 07:52 PM IST
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A society do justice with itself

दिल्ली से देवभूमि उत्तराखंड आए युवा सैलानी जोड़े की हत्या और लूटपाट की अप्रत्याशित घटना ने उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र चकराता को सुर्खियों में ला दिया है। लेकिन इन सुर्खियों ने स्थानीय जनजाति समाज को शर्मसार कर दिया है, क्योंकि ऐसी घटना इस क्षेत्र के लिए किसी बड़ी अनहोनी जैसी है। सैलानियों को सिर-माथे बिठाने की परंपरा वाले जौनसार-बावर के इस जनजातीय समाज को पहले तो यकीन ही नहीं हुआ कि उनके बीच के युवक ऐसा वीभत्स कांड कर सकते हैं। लेकिन जब सच सामने आया, तो उन्होंने अनूठे ढंग से सामूहिक प्रतिक्रिया दी।

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इलाके के 14 गांवों (खत) की सामूहिक पंचायत ने आम राय से फैसला किया कि ऐसे नालायकों से अब उनका कोई वास्ता नहीं। परिजनों ने भी इन आरोपियों से हमेशा के लिए नाता तोड़ने और उन्हें किसी भी तरह का कानूनी मदद न करने का सरेआम ऐलान किया। यही नहीं, उन्होंने समाज को कलंकित करने वाले युवकों को फांसी देने की मांग तो की ही, पीड़ितों के परिजनों को कानूनी लड़ाई के लिए आर्थिक मदद की पेशकश भी की। पूरा जौनसारी समाज आरोपी युवकों के खिलाफ आंदोलित है।
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देहरादून से करीब सौ किलोमीटर दूर सात से आठ हजार फीट की ऊंचाई पर टोंस और यमुना नदी के बीच बसे चकराता की इस जौनसार-बावर जनजाति की सैकड़ों साल पुरानी परंपरा में ही न्यायप्रियता रची-बसी है। जौनसार में महासू का राज है। स्थानीय लोग देव महासू को महाशिव का ही एक रूप बताते हैं।
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स्वयं को पांडवों का वंशज मानने वाले जौनसारियों की परंपराएं बेहद अनूठी हैं। करीब 400 गांवों के समूह से मिलकर जौनसार बनता है। जौनसार में करीब 39 खत (ग्राम समूह) हैं। सामाजिक अदालत की भूमिका यह खत ही निभाती है। महासू देव के नाम पर ही यहां गवाही होती है और फैसले सुनाए जाते हैं।

बेशक समय बदल रहा है, पर दिल्ली के पर्यटकों की हत्या के मामले में अपने लोगों पर भी रहम न करके जौनसार यह साबित कर रहा है कि उनके मूल्यों में बदलाव नहीं आया है। आरोपी युवकों का पिता भी अगर अपने बेटे पर तरस नहीं खाता, तो यह जौनसार के सामाजिक न्याय के जीवंत होने का ही प्रमाण है।

आर्थिक तौर पर विपन्न यह समाज थोड़ी-बहुत खेतीबाड़ी और सैलानियों के सैर-सपाटे के जरिये ही गुजारा करता है। पर्यटक उनके लिए देव समान हैं और बाहर से आने वाले भी उन पर आंख मूंदकर भरोसा करते हैं। पहाड़ का यह क्षेत्र करीब-करीब शांत भी है। गूगल पर सर्च कीजिए, तो आपको चकराता की खूबसूरती, जौनसार के नाच-गानों और अनूठी संस्कृति के किस्से मिलेंगे, अपराध के नहीं। 2011-12 के पुलिस रिकॉर्ड में उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों की तुलना में मैदानी इलाकों में दोगुने अपराध के मामले दर्ज हैं। पड़ोसी जिले उत्तरकाशी की रवांई और जौनसार की घाटी में हत्या के महज दो मामले सामने आए, तो हरिद्वार में 53। ऐसे में चकराता की इस ताजा घटना से स्थानीय लोगों का गुस्से और गम में घिर जाना स्वाभाविक ही है।


अगर हमारे देश का शेष समाज भी जौनसारी जनजाति समाज से कुछ सीखे, तो अपराधियों से निपटने के लिए मुकदमों के भारी-भरकम बोझ तले दबी न्याय-व्यवस्था को काफी राहत दी जा सकती है।

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