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दो पत्तियों के बीच कमल

Sun, 17 Feb 2019 08:00 PM IST
bhaskar sai भास्कर साई
Updated Sun, 17 Feb 2019 08:00 PM IST
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A 'Lotus' and 'Two Leaves'
भाजपा व अन्नाद्रमुक

लोकसभा चुनाव से पहले तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के साथ सीटों के तालमेल पर हुई सहमति केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के लिए स्वाभाविक ही एक बड़ा घटनाक्रम है। तमिलनाडु की 39 और पड़ोस के केंद्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी की एक लोकसभा सीट यानी कुल 40 लोकसभा सीटों में से अन्नाद्रमुक और भाजपा के बीच क्रमशः 25 और 15 सीटों पर सहमति बनी है। लेकिन इसमें एक झोल है। अन्नाद्रमुक और भाजपा को अपने अन्य सहयोगियों-डीएमडीके, पीएमके और पुथिया तमिझगम को इसमें समायोजित करना होगा।


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हालांकि थोड़ा पीछे लौटकर देखें, तो पता चलता है कि भाजपा और अन्नाद्रमुक के बीच गठजोड़ कोई नई बात नहीं है। दरअसल वह अन्नाद्रमुक ही थी, जिसने 1998 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ साझेदारी कर तमिलनाडु के मतदाताओं को उससे परिचित कराया था। भाजपा तब तक राज्य में एक अनजान पार्टी थी। उस गठजोड़ की जीत हुई और अन्नाद्रमुक अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में केंद्र की सरकार का हिस्सा बनी। हालांकि अन्नाद्रमुक ने जब सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया और केंद्र की सरकार सत्ता पाने के तेरह महीनों बाद गिर गई, तब भाजपा ने 1999 के चुनाव में द्रमुक के साथ गठजोड़ किया था, जो कि अन्नाद्रमुक की धुर विरोधी पार्टी है। उस गठबंधन की भी जीत हुई और भाजपा ने द्रमुक और अन्य सहयोगियों के साथ पांच वर्ष तक सत्ता में साझेदारी की। वर्ष 2004 के चुनाव में भाजपा ने फिर से अन्नाद्रमुक को अपना सहयोगी बनाया। इस बार गठबंधन का प्रदर्शन खराब रहा और वह तमिलनाडु और पुड्डुचेरी की सभी चालीस सीटें खो बैठा।

 
वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने न तो अन्नाद्रमुक के साथ गठजोड़ किया और न ही द्रमुक के साथ। जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में तो, जिसमें नरेंद्र मोदी को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया गया था, अन्नाद्रमुक और भाजपा के बीच कड़वी जुबानी जंग तक देखी गई। भाजपा ने विजयकांत के डीएमडीके, वाइको के एमडीएमके और रामदौस के पीएमके के साथ सतरंगी गठजोड़ किया था, जबकि अन्नाद्रमुक ने अकेले चुनाव लड़ने का साहसिक फैसला लिया था।

 
अन्नाद्रमुक की सुप्रीमो जयललिता ने, जो तमिलनाडु की मुख्यमंत्री भी थीं, मतदाताओं से यह पूछकर कि वे किसे चाहते हैं, मोदी को या इस महिला को, भाजपा को खुलेआम चुनौती दी थी। मोदी के साथ सौहार्दपूर्ण संबंधों के बावजूद जयललिता ने ऐसा किया था। तमिलनाडु के लोगों ने उसी महिला को पसंद किया, क्योंकि अन्नाद्रमुक ने 37 सीटें जीतकर ऐतिहासिक विजय हासिल की और देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई।


लेकिन जयललिता की अनुपस्थिति में भाजपा और अन्नाद्रमुक का खट्टा-मीठा रिश्ता गहरी दोस्ती में बदल गया। केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार पर अक्सर तमिलनाडु की अन्नाद्रमुक सरकार के समर्थन का आरोप लगया जाता है, जहां पलानीस्वामी मुख्यमंत्री और पन्नीरसेल्वम उप मुख्यमंत्री हैं। अब जब लोकसभा चुनाव में कुछ ही महीने शेष रह गए हैं, अन्नाद्रमुक ने आखिरकार भाजपा के साथ गठजोड़ कर ही लिया। हालांकि भाजपा और अन्नाद्रमुक के बीच चुनावी गठबंधन की संभावना राज्य में उनकी विरोधी पार्टियों (एम के स्टालिन की द्रमुक और टीटीवी दिनाकरन की एएमएमके) ने बहुत पहले ही जता दी थी। लेकिन भाजपा और अन्नाद्रमुक ने पिछले हफ्ते तक इस बारे में चुप्पी बनाए रखी। इसका खुलासा तब हुआ, जब भाजपा के तमिलनाडु चुनाव प्रभारी और केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल चेन्नई पहुंचे और एक प्रमुख उद्योगपति के घर अन्नाद्रमुक के वरिष्ठ नेताओं से तीन घंटे लंबी बातचीत के बाद दिल्ली लौट आए। सूत्रों की मानें, तो उन्होंने पलानीस्वामी और पन्नीरसेलवम के साथ भी गुप्त बैठक की। पत्रकारों से उन्होंने कहा, सभी संभावनाएं विचाराधीन हैं, सही समय आने पर हम आपको खुशखबरी देंगे।


जयललिता से अपनी पूर्व भेंट को याद करते हुए उन्होंने कहा, 'एक समय कुछ लोग सोचते थे कि दिवंगत अम्मा और मेरे बीच कुछ गलतफहमियां हैं, लेकिन ऐसा कुछ नहीं था। जब मैं उनसे मिला, तो उन्होंने छोटे भाई की तरह प्यार से मेरा स्वागत किया। अक्सर मीडिया में तरह-तरह की बातें होती हैं, लेकिन वे नहीं जानते कि प्रधानमंत्री मोदी और अम्मा के बीच बहुत सौहार्दपूर्ण रिश्ता था। मुझे यकीन है, आगे हम सब मिलकर तमिलनाडु के लोगों की सेवा करेंगे।' उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री मोदी अगली बार केंद्रीय मंत्रिमंडल में तमिलनाडु से और सदस्यों को शामिल करने के बारे में उत्सुक हैं। अभी पोन राधाकृष्णन तमिलनाडु से केंद्रीय मंत्रिमंडल में अकेले मंत्री हैं। अन्नाद्रमुक में अगर कोई भाजपा के साथ गठबंधन का विरोधी है, तो वह हैं वरिष्ठ नेता और लोकसभा के उप-सभापति एम थंबीदुरई। लेकिन अन्नाद्रमुक और भाजपा की राज्य इकाई के कुछ नेता थंबीदुरई के बयान को उनकी व्यक्तिगत टिप्पणी बता रहे हैं। दरअसल अन्नाद्रमुक नेतृत्व ने उन्हें गठबंधन के खिलाफ टिप्पणी न करने की चेतावनी दी थी, जिसके बाद उन्होंने चुप्पी साध ली।


जहां तक चुनावी संभावना का सवाल है, तो चुनावी लड़ाई कठिन होने वाली है, क्योंकि द्रमुक कांग्रेस के साथ मिलकर अन्नाद्रमुक-भाजपा गठबंधन पर निशाना साधने के लिए तैयार है। जयललिता और विद्रोही नेता टीटीवी दिनाकरन (जो पार्टी के बड़े वोट शेयर का दावा करते हैं) के अभाव में पलानीस्वामी और पन्नीरसेल्वम के नेतृत्व में पार्टी को चुनाव का सामना करना है। जबकि स्टालिन, वाइको और सीमन जैसे नेताओं की आलोचनाओं का सामना कर रही भाजपा के पास राज्य में कोई करिश्माई नेता नहीं है। दूसरी तरफ पलानीस्वामी, जो पहले भोले और सत्ता की राजनीति में नए दिखाई देते थे, अब मजबूत नेता बनकर उभरे हैं और उन्होंने कई जनहितैषी योजनाओं की घोषणा की है। उन्हें लगता है कि वह वोट हासिल कर लेंगे। अति आशावादी भाजपा का मानना है कि इस बार तमिलनाडु में उसका आंकड़ा बढ़ेगा। इसी कारण चुनाव से पहले यहां पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं की रैली करवाई जा रही है। लेकिन इस गठबंधन के भाग्य का फैसला तो अंततः लोकतंत्र के असली मालिक यानी मतदाता ही करेंगे। 

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