नेपाल में स्थिरता को एक मौका
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ऐसा लगता है कि चिरस्थायी सांविधानिक संकट के बीच नेपाल में शांति और स्थिरता कहीं खो गई है। नेपाल की दूसरी संविधान सभा ने सितंबर, 2015 में जिस गणतांत्रिक संविधान को अंगीकार किया, उसने मधेसियों, जनजातियों, महिलाओं और दलितों जैसे हाशिये के समूहों को जगह नहीं दी थी, जिससे वहां आंतरिक समस्याएं तो खड़ी हुईं ही, इसका भारत के साथ उसके रिश्ते पर भी असर पड़ा। विगत अगस्त में प्रचंड के नेतृत्व में नेपाल में जब नई गठबंधन सरकार बनी, हाशिये के समूहों की मांग मानने के लिए नए संविधान में संशोधन के वायदे पर काम शुरू हुआ। मुख्य विपक्षी दल कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (एमाले) सहित विभिन्न समूहों से कई दौर की बातचीत के बाद प्रचंड की सरकार ने पिछले सप्ताह संसद में ताजा संविधान संशोधन प्रस्ताव पेश करने का साहस दिखाया। पर मधेसियों के समूहों सहित एमाले कैबिनेट के इन प्रस्तावों का विरोध कर रही है। नेपाल के विभिन्न हिस्सों में इन संशोधनों के खिलाफ आंदोलन हो रहे हैं।
ये संशोधन हाशिये के समूहों से जुड़े कुल चार मुद्दों-नागरिकता, भाषा, संसद के उच्च सदन में प्रतिनिधित्व और प्रांतीय सीमाओं के सीमांकन से संबंधित हैं। भाषा के मुद्दे को जहां भाषा आयोग के लिए छोड़ दिया गया है, वहीं नेपाली पुरुषों से शादी करने वाली विदेशी महिलाओं के लिए नागरिकता की प्रक्रिया को उदार बनाया गया है। जहां तक संसद के उच्च सदन में प्रांतों के प्रतिनिधित्व का सवाल है, तो कुल 56 सीटों में से 35 सीटें आबादी के आधार पर विभिन्न प्रांतों के बीच बांटी गई हैं। बाकी 21 सीटें सभी सातों प्रांतों से एक महिला, एक दलित और एक अल्पसंख्यक या विकलांग सदस्यों यानी हर प्रांत से तीन सदस्यों द्वारा भरी जाएंगी। प्रांतीय सीमांकन में पाल्पा, अर्गाखांची, गुल्मी, रुकुम, रोल्पा और प्यूथन जिले को पांचवें प्रांत से निकालकर मधेसी व थारू समूहों के लिए पहले के मुकाबले ज्यादा समरूप बनाने के लिए चौथे प्रांत में शामिल किया गया है। पूर्वी मधेस प्रांत संख्या पांच और दो से सटे अन्य पांच विवादित जिलों का फैसला पुनर्सीमांकन आयोग के ऊपर छोड़ दिया गया है।
प्रस्तावित संविधान संसोधन का विरोध न सिर्फ मुख्य विपक्षी पार्टी एमाले एवं उसके अन्य छोटे कम्युनिस्ट समर्थक समूहों द्वारा, बल्कि मधेस समूहों और कमल थापा की राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी), पशुपति शमशेर जेबी राणा और बाबूराम भट्टराई की पार्टी नई शक्ति पार्टी द्वारा भी किया जा रहा है। सत्तारूढ़ गठबंधन के दलों नेपाली कांग्रेस और माओवादी के बीच भी इन संशोधनों को लेकर आपत्ति है। गठबंधन सरकार के समर्थक मधेस समूह भी इन संशोधनों का समर्थन नहीं करते। उनके मुताबिक, उनकी भावनाओं को इसमें समायोजित नहीं किया गया और ये संशोधन उनकी इच्छाओं की आंशिक पूर्ति ही करते हैं।
संशोधनों का सबसे ज्यादा विरोध एमाले और उसके सहयोगी कर रहे हैं। दरअसल पांचवें प्रांत से अलग किए गए जिले उनके कुछ प्रमुख नेताओं के चुनावी क्षेत्र को प्रभावित करते हैं। इसलिए वे कह रहे हैं कि पांचवें प्रांत के प्रस्तावित बंटवारे से सामाजिक-जातीय ध्रुवीकरण होगा, जिससे राष्ट्रीय एकता कमजोर होगी और अलगाववादी ताकतों का जन्म होगा। पहाड़ी ऊंची जातियों का नेतृत्व करने वाली एमाले हाशिये के समूहों, खासकर मधेसों के हित में कदम उठते देखना नहीं चाहती। वह यह भी नहीं चाहती कि जिन सांविधानिक मुद्दों को उन्होंने अनसुलझा छोड़ दिया, उसे निपटाने में प्रचंड सरकार सफल हो। मानने का कारण है कि सत्तारूढ़ गठबंधन से कुछ अन्य मुद्दों पर रियायत पाने का एमाले का कोई गुप्त एजेंडा है। चूंकि एमाले के पास संविधान संशोधन के विरोध के पीछे तर्कसंगत दलीलें नहीं हैं, ऐसे में वह यह आरोप लगा रही है कि नेपाल पर ये संशोधन भारत ने थोपे हैं, ताकि नेपाल को सामाजिक रूप से विभाजित और कमजोर किया जा सके। वह इन संशोधनों को राष्ट्रविरोधी भी बता रही है। दरअसल भारत ने इन संशोधनों का समर्थन किया है और भारतीय राजदूत ने मधेसी समूह को कहा है कि बेशक ये संशोधन उनकी आकांक्षाओं से कमतर हैं, फिर भी वे इनका समर्थन करें। एमाले ने इसी आधार पर भारत को निशाना बनाया है। एमाले की युवा शाखा ने काठमांडू में भारतीय दूतावास के सामने प्रदर्शन किया और भारत पर नेपाल के आंतरिक और सांविधानिक मामलों में हस्तक्षेप करने का आरोप लगाया। जबकि भारत का तर्क यह है कि इन संशोधनों के प्रति उसने इसलिए समर्थन जताया है, ताकि नेपाल में स्थायी शांति और स्थिरता सुनिश्चित हो सके।
अलबत्ता व्यापक विरोध को देखते हुए संसद में इन संशोधनों के पारित होने की संभावना धूमिल ही लगती है। हालांकि संशोधनों के पक्ष में आवश्यक दो तिहाई बहुमत जुटाना मुश्किल होने के बावजूद असंभव नहीं है। 595 सीटों वाली संसद में संशोधनों की मंजूरी के लिए 397 वोट की जरूरत होगी। विरोधी एमाले और उसके सहयोगियों की संख्या 197 से ज्यादा नहीं है। फिर भी 398 वोट बचते हैं। सबको लामबंद करने के लिए आरपीपी और मधेस फ्रंट को राजी करना होगा। मधेस दलों को समझना चाहिए कि यह संशोधन उन्हीं के लिए लाया गया है। भले उनकी सभी मांगें पूरी न हुई हों, पर यह उसी दिशा में एक कदम है।
जटिल राजनीतिक और सांविधानिक चुनौतियों का सामना करने के लिए सत्तारूढ़ गठबंधन में भी धैर्य और लचीलापन होना चाहिए। प्रचंड और उनकी गठबंधन सरकार का इन संशोधनों पर काफी कुछ दांव पर लगा है। उनकी विफलता से गठबंधन के अस्तित्व और संविधान के कार्यान्वयन, दोनों पर खतरा हो सकता है। शांति और स्थायित्व के लिहाज से भी सरकार की विफलता ठीक नहीं होगी। इसलिए जो लोग नेपाल की प्रगति चाहते हैं, उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी स्थिति न आए।