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आधुनिक दलित साहित्य की एक शताब्दी
श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Fri, 03 Jan 2014 01:44 AM IST
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नव वर्ष की शुरूआत आधुनिक हिंदी दलित साहित्य के लिहाज से भी एक अहम पड़ाव है। 2014 में इसके सौ वर्ष पूरे हो रहे हैं। 1914 में पहली बार हीरालाल की रचनाओं ने लोगों का ध्यान खींचा था। वह उस काल के प्रतिनिधि लेखक थे।
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हीरालाल सामाजिक इतिहास के अच्छे जानकार थे। उन्होंने जब देखा कि कथित उच्चवर्णीय आर्य दलित और अति पिछड़ी जाति के बच्चों को स्कूल में अस्पृश्यता के भाव से अलग बिठाया जाता है, तो उन्होंने आर्य समाज से रिश्ता तोड़ लिया और अपना नाम स्वामी अछूतानंद रख लिया। इसके बाद उन्होंने दलितों की स्थिति और उनके सामाजिक-आर्थिक संघर्ष को कविताओं, गजलों और नाटकों में उतारना शुरू किया।
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उनके लेखन से पता चलता है कि उन्होंने उस दौर में किस तरह भविष्य की चिंता को इतिहास बोध के सबक की तरह लिया था। उनके नाटक, कविताएं, गीत, गजल यहां तक कि कव्वाली भी ऐतिहासिक संदर्भ लिए हुए हैं। उपन्यास को छोड़कर उन्होंने साहित्य की तकरीबन हर विधा में रचना की।
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वह एक समर्थ संपादक भी थे और उन्होंने अछूत और आदि हिंदू नामक पत्रों का संपादन किया। वास्तव में स्वामी अछूतानंद दलित मुक्ति चेतना में डॉ बी आर अंबेडकर से पूर्व की पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। उस समय अछूतानंद उत्तर प्रदेश के प्रतिनिधि नेता थे, तो पंजाब में बाबू मंगूराम। अछूतानंद की तरह ही बाबू मंगूराम भी समाजिक उपेक्षा से उपजे कवि थे।
उस दौर में जब आधुनिक हिंदी साहित्य समाज में अपनी जगह बना रहा था, इन दलित रचनाकारों ने दलितों की सामाजिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिकता को सामने लाने का काम किया। सिर्फ आधुनिक हिंदी दलित साहित्य ही नहीं, बल्कि व्यापक अर्थ में आधुनिक दलित साहित्य के लिहाज से भी यह अहम काल माना जा सकता है। समकालीनता और संभावना की दृष्टि से उसी दौर में महाराष्ट्र के साहित्यकार गोपाल बुबा बलंकर का नाम लिया जा सकता है, जिन्होंने दलित साहित्य को समृद्ध किया। बलंकर अंबेडकर की पत्नी रमाबाई के मायके पक्ष से थे और ब्रिटिश सेना में भी रहे थे। बलंकर ने विटाल विध्वंसक (अस्पृश्यता नाशिनी) पुस्तिका की रचना की थी। यह पद्य रूप में थी।
वास्तव में स्वामी अछूतानंद ने 1914 से 1917 के दौरान अपनी रचनाओं के जरिये समाज को उद्वेलित किया और दलितों के मुद्दों को मुखरता से उठाया। वह आदि हिंदू आंदोलन की सभाओं में कविताओं का पाठ भी करते थे। उन्होंने इस दौरान यात्राएं कीं और अस्पृश्य और अति पिछड़ी जातियों के नैसर्गिक हकों के लिए उन्हें संगठित तथा सजग किया। 1917 में उन्होंने दिल्ली पहुंचकर अखिल भारतीय अछूत महासभा की स्थापना की। पांच साल में इस सभा का देशव्यापी विस्तार हुआ। विभिन्न प्रदेशों में इस सभा के कुल दो सौ सम्मेलन संपन्न कराना अछूतानंद का कोई छोटा योगदान नहीं था। 1922 में जब जॉर्ज पंचम के पुत्र प्रिंस वेल्स भारत आए, तो उन्होंने मुस्लिम नेताओं के साथ-साथ अस्पृश्यों के नेताओं से भी मुलाकातें की। प्रिंस वेल्स के समक्ष स्वामी अछूतानंद ने 17 मांगें रखीं, जो सामाजिक आजादी का आधार हैं। स्वामी जी की अभिव्यक्ति का माध्यम साहित्य था। उनके व्याख्यान काव्यमय होते थे।
सामाजिक समता और सम्मान के संघर्ष और देश की आजादी की लड़ाई के कालक्रम को ध्यान में रखकर स्वामी जी के साहित्य की बात करें, उनके संपादकीय देखें और उनके द्वारा रचित नाटकों की विषय वस्तु का अध्ययन करें, तो निर्विवाद रूप से यह एहसास होगा कि वह इस युग के पहले दलित नाटककार भी हैं। मायानंद बलिदान, रामराज्य न्याय नाटक लिखकर और मंचन कराकर उन्होंने सामाजिक इतिहास के उन पाठों को खोलने की कोशिश की, जिनमें वंचित भारत की स्वतंत्रता के सूत्र छिपे थे।
कुल मिलाकर यह वर्ष सौ साल पूर्व के दलित साहित्य के इतिहास की ओर हमारा ध्यान आकर्षित करता है। उस काल के हिंदी साहित्य पर अछूतानंद का क्या प्रभाव था? इस दृष्टि से रंगभूमि के नायक में इन दलित नायक की छवि तलाश करने का काम प्रेमचंद की नीली आंखें में डा. धर्मवीर ने किया है। यह साहित्य और सामाजिक आजादी के आंदोलनों को समझने का जरूरी आधार है।