एक बिगड़ा हुआ पड़ोसी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारत और पाकिस्तान के बीच संबंध अतीत में भी विवादग्रस्त रहे हैं और आगे भी ऐसे ही रहेंगे। एक विफल राष्ट्र होने की कगार पर खड़ा पाकिस्तान भारत से अलग होने के बाद से ही अपनी पहचान की तलाश में है। दरअसल पाकिस्तान की लड़ाई खुद उसी के साथ है। 1947 में पाकिस्तानी सेना द्वारा जम्मू-कश्मीर पर हमले के तुरंत बाद से ही उसके सैन्य प्रतिष्ठान ने भारत के साथ प्रतिद्वंद्विता शुरू कर दी। यह उनके लिए एक बढ़िया दांव था। उसने भारत के खिलाफ जितने भी युद्ध छेड़े, सबमें उसे मुंह की खानी पड़ी। पाकिस्तान के अस्तित्व के दो-तिहाई वर्षों तक सेना ने ही वहां के असहाय लोगों पर राज किया है। परंपरागत तौर पर भारत से बिल्कुल अलग पाकिस्तान ने स्पेनी शासन के विरुद्ध पेरू में स्वतंत्रता की लड़ाई का नेतृत्व करने वाले प्रिंस अमारू द्वितीय से प्रेरणा लेकर भारत के खिलाफ एक छद्मयुद्ध की शुरुआत की।
जिया उल हक ने ऑपरेशन टोपैक के तहत आईएसआई को अपने खुफिया नेटवर्क का इस्तेमाल करके भारत में दरार डालने और नेपाल व बांग्लादेश की खुली सीमाओं का फायदा उठाते हुए आतंकी अड्डे स्थापित करने की जिम्मेदारी सौंपी। शुरुआती वर्षों में जम्मू-कश्मीर में पकड़े या मारे जाने वाले आतंकी तकरीबन 18 देशों के होते थे, जिनमें से ज्यादातर इस्लामिक देश थे। आज भी जेहाद की फैक्टरी का पाकिस्तान के अंदर पनपना बदस्तूर जारी है। गौरतलब है कि पाक अधिकृत कश्मीर में इस वक्त तकरीबन 42 आतंकवादी प्रशिक्षण केंद्र हैं।
पाकिस्तान के साथ वार्ता रद्द करने का भारत का फैसला एकदम सुविचारित व सही है। एक लड़ाकू और हिंसक पड़ोसी के साथ बात करने का कोई मतलब नहीं है। पाकिस्तान की सभी चुनी हुई सरकारें वहां की सेना के हाथों की कठपुतली रही हैं। यहां तक कि वहां की वायु और नौसेना की भूमिका भी नगण्य ही है। पाकिस्तान की तमाम विदेश नीतियां, खास तौर से भारत, चीन एवं अफगानिस्तान से संबंधित, सेना द्वारा संचालित होती हैं। सच तो यह है कि पाकिस्तानी सेना प्रमुख के मियां नवाज शरीफ को दिए निर्देश के तहत ही भारत-पाक वार्ता से पहले हुर्रियत एवं अन्य अलगाववादी नेताओं को बातचीत के लिए बुलाया गया था, जबकि यही शरीफ पहले इन लोगों से मिलने से इन्कार कर चुके थे।
दरअसल विचारधारा के मोर्चे पर पाकिस्तान की सुरक्षा का जिम्मा वहां की सेना ने ले रखा है। तमाम किताबों और दस्तावेजों में छप चुकी इस विचारधारा में न सिर्फ गलत तथ्यों का सहारा लिया गया है, बल्कि भारत को पाकिस्तान के ऐसे कट्टर दुश्मन के तौर पर दिखाया गया है, जो मौका पाते ही पाकिस्तान को नष्ट कर देने की मंशा रखता है। पाकिस्तानी रक्षा विभाग के दस्तावेजों में भारत एवं भारतीयों की आक्रामक छवि दर्शाई गई है। उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश के उदय के बाद जुल्फिकार अली भुट्टो ने इस्लाम को वहां के लोगों में एकजुटता की भावना फैलाने का जरिया बनाया। पाकिस्तानी सेना के इस्लामीकरण की प्रक्रिया जिया उल हक ने शुरू की थी। इसी का नतीजा है कि आज पाकिस्तान बर्बादी की दहलीज पर खड़ा है। वहां का समाज तो बंटा हुआ है ही, खुद उसके पैदा किए गए आतंकवादी आज उसके ही खिलाफ खड़े हैं। अमेरिका और चीन की सहायता के बल पर ही उसकी सांसें चल रही हैं।
असल में पाकिस्तान और चीन की कथित दोस्ती के पीछे उनका साझा भारत विरोध ही है। चीन ने समय-समय पर पाकिस्तान को उकसाने का काम किया है। भारत की पश्चिमी सीमा की दो दर्जन से ज्यादा चौकियों पर हालिया गोलीबारी को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। चीन और पाकिस्तान की दोस्ती के संदर्भ में चाणक्य की वह उक्ति उल्लेखनीय है, दुश्मन का दुश्मन आपका सबसे अच्छा मित्र हो सकता है। इन हालात में यह कहा जा सकता है कि यदि दैवी कृपा से जम्मू कश्मीर से जुड़े मसले हल हो भी जाएं, तब भी पाकिस्तान भारत का दुश्मन ही बना रहेगा। पाकिस्तान को समझना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव की पहली शर्त के मुताबिक, उसे जम्मू-कश्मीर की धरती से अपनी सेना को हटाना होगा और विभाजन के समय की सीमा रेखा पर वापस लौटना होगा। पाकिस्तानी सेना भारत के खिलाफ दुश्मनी को इसलिए बढ़ावा देती है, क्योंकि उसे पता है कि जिस दिन दोनों मुल्कों के बीच विवाद खत्म हो जाएगा, पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान का दबदबा भी कम हो जाएगा।
आज पाकिस्तान की पहचान एक आर्थिक तौर पर दिवालिया, अलग-थलग, बेहद भ्रष्ट, अशांत और अपमानित राष्ट्र की है। खास तौर पर गरीबों और महिलाओं से संबंधित उसका मानवाधिकार रिकॉर्ड चौंकाने वाला है। पाकिस्तान पर भारत का जुनून सवार है। पाकिस्तान के दिमाग में कहीं न कहीं एक जेहादी भाव छिपा हुआ है। वहां बचपन से ही बच्चों के दिमाग में भारत के खिलाफ जहर भर दिया जाता है। वहां की सेना भारत को विखंडित करने के सपने देखती है। और इसलिए वह सार्वजनिक रूप से कहती है, ‘उन्होंने पूर्वी पाकिस्तान में हमारे साथ जो किया, उसकी कीमत उन्हें चुकानी होगी।’ असल में यही पाकिस्तान की प्रमुख रणनीति है।
ऐसे में यही नतीजा निकाला जा सकता है कि भारत के पाकिस्तान के साथ रिश्ते बेहतर होते नहीं दिखते। उससे निपटने का बस यही तरीका है कि जैसे ही वह कोई शरारत करे (जो इस समय वह कर रहा है), उसे मुंहतोड़ जवाब दिया जाए। दरअसल पाकिस्तान यही भाषा समझता है। पाकिस्तान के साथ न्यूनतम राजनयिक संबंध ही रखा जा सकता है, उससे ज्यादा कुछ नहीं। भारत को अपने आर्थिक विकास पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था ही उसकी असल ताकत होती है।
(लेखक सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल हैं)