भूखे भजन न होई गुपाला

Yashwant Vyas Updated Mon, 14 May 2012 12:00 PM IST
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धर्मग्रंथों में कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को शरीर रूपी यंत्र को चलाते रहने के लिए पुरुषार्थ करके भोजन की व्यवस्था करनी चाहिए-आहारार्थ कर्म कुयति अनिन्द्यं। यदि भूख सताती रहेगी, तो मानव कोई कर्म कर ही नहीं सकता।
संत प्रवर स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी जी अपने प्रवचन में एक कथा सुनाया करते थे- मुक्ति प्राप्त करने का इच्छुक एक व्यक्ति संत कबीर के पास पहुंचा। उसने कहा, मुझे कल्याण का साधन बताएं। कबीर ने कहा, सबसे पहले कर्म करो। यह खुरपी लो और बगीचे में जाकर घास व कूड़ा-करकट हटा दो। वह व्यक्ति खुशी-खुशी बगीचे की सफाई में लग गया। जब वह वापस आश्रम लौटा, तो सब भोजन कर चुके थे। इसलिए वह भूखे पेट ही सो गया। अगले दिन फिर वह कबीर के पास पहुंचा और पूछा, अब बताएं साधन का मार्ग। कबीर ने कहा, यह इतना आसान नहीं है।

यह माला लो और बगीचे को साफ करते-करते ईश्वर का नाम जपते रहना। वह फिर भूखे पेट बगीचा साफ करता रहा। लेकिन जल्दी ही पेट की ज्वाला ने उसे बेसुध बना दिया, और वह आश्रम लौट आया। आश्रम आकर उसने कबीर के चरण पकड़ लिए और कहा, मैं आपका आदेश मानने में सफल नहीं हो सका, और माला वापस करते हुए सारी कहानी कह सुनाई। कबीर ने तभी उपदेश दिया, भूखे भजन न होई गुपाला, ले लो अपनी कंठी माला। वास्तव में शरीर को सबसे पहले क्षुधा पूर्ति के लिए भोजन की आवश्यकता होती है।

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