2015 : हजारों ख्वाहिशें ऐसी...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बावरा मन देखने चला एक सपना,
बावरे से मन की देखो बावरी हैं बातें...
उम्मीद चीज ही कुछ ऐसी है, कि उसमें अमूमन कल्पना का पुट आ ही जाता है, और नव वर्ष के शुरुआती समय में तो इन उम्मीदों का उफान कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है। यही वह समय होता है, जब आप अतीत पर नजर दौड़ाते हैं, आस भरी नजरों से भविष्य को निहारते हैं, और फिर यह जरूर गुनगुनाते हैं, हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले। बीती गर्मियों में जब पूरे भारत ने वोट किया, तो यह बदलाव के वायदे में उनका निवेश था, और उसके बाद देश ने ′बगैर सरकार′ वाली स्थिति से ′बगैर विपक्ष′ वाली स्थिति में छलांग लगाई।
सत्ता में आए हुए मोदी सरकार को छह माह से ऊपर हो गए हैं, और लोग सरकार से उम्मीदों को लेकर अपने धैर्य को अब तक साधे हुए हैं, हालांकि उनके रवैये में कुछ अधीरता भी दिखने लगी है। संदेह नहीं कि 2015 की नई सुबह के साथ ही लोगों की नजरें उन फायदों को तलाशने लगेंगी, जिनकी आस में उन्होंने नई सरकार को चुनने में अपने भरोसे का निवेश किया था।
अपने वायदों पर खरा उतरने के लिए मोदी सरकार को रणनीति बदलनी होगी। उसे न सिर्फ पुराने तौर-तरीकों से निजात पाने का अपना वायदा पूरा करना होगा, बल्कि भविष्य की नींव भी रखनी होगी। आगे की पंक्तियों में मोदी सरकार के मिशन 2015 के मील के पत्थर साबित होने वाले लक्ष्यों की सूची दी गई है-
अधिकतम शासन: यह एक नारा नहीं, बल्कि जरूरत है, जो न्यूनतम सरकार की मांग करती है। दरअसल, बात जवाबदेही की है। प्रधानमंत्री खुद सरकारी जवाबदेही तय करने के लिए निचले स्तर तक शासन की बात कर चुके हैं। फिर देर किस बात की है? उन विभागों की सूची बनाई जानी चाहिए, जिन्हें केंद्रीय स्तर पर 2019 तक समाप्त कर दिया जाएगा। असल में, शासन की बहुस्तरीय व्यवस्था बाबुओं और नेताओं को जवाबदेही से बचने का मौका देती है। देश का एक-एक इंच राज्यों द्वारा शासित है, तो फिर क्यों न राज्य सरकारों को मौका दिया जाए कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, सड़क और पानी जैसे विषयों पर खुद के प्रदर्शन के जरिये विकास की अपनी यात्रा आगे बढ़ाएं।
बोल बचन रिपोर्ट:भारत में सरकारें नई योजनाएं बनाने और उनके लिए धन आवंटित करने में ही संतुष्ट रही हैं। जबकि सवाल यह होना चाहिए कि क्या फलां योजना अपना उद्देश्य पूरा कर सकी, या नहीं। कितने किलोमीटर सड़कें बन पाईं, कितनी ऊर्जा उत्पादित हुई, कितने स्कूल खोले गए, कितनी नहरें खोदी गईं, और इन सबमें कितना खर्च हुआ- इनका ब्योरा देने की जिम्मेदारी विभागों की होनी चाहिए। नेताओं का कितना बोल-बचन जमीनी हकीकत में तब्दील हो सका, इसका एक रिपोर्ट कार्ड सरकार को पेश करना चाहिए। नए वर्ष की एक अच्छी शुरुआत यह हो सकती है कि जुलाई बजट में शगुन के तौर पर जो 100 करोड़ रुपयों का आवंटन हुआ था, वह किस तरह से खर्च किया गया, यह सरकार बताए।
नई तकनीक से जुड़ना: जब काम ज्यादा हो, या उसमें जटिलता हो, तो व्यक्ति की कार्य क्षमता प्रभावित होती है, और ऐसे माहौल में भ्रष्टाचार पनपता है। सौ करोड़ से ज्यादा लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरने की जिम्मेदारी निभाने और भ्रष्टाचार से निपटने में तकनीक मददगार साबित हो सकती है। जब वाट्स एप के जरिये मतदाताओं से संपर्क साधा जा सकता है, तो फिर इन्हीं एप्स के जरिये लोगों को सेवाएं क्यों नहीं दी जा सकतीं? क्यों न आगामी बजट में बुनियादी सेवाओं को ऑनलाइन उपलब्ध कराने के लिए समय-सीमा तय कर दी जाए?
पुलिस और न्यायिक सुधार: बलात्कारी, घोटालेबाज और हत्यारे कानून के लंबे हाथों से बच निकल रहे हैं, तो इसकी वजह है कि ′कानून का शासन′ सत्ताधारी दल की मर्जी पर आधारित हो गया है। हमारा संविधान ′कानून के शासन′ की गारंटी देता है, मगर आम आदमी के लिए एक छोटी-सी एफआईआर दर्ज कराना भी चुनौती बन गया है। 2006 में दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बावजूद पुलिस सुधार के मोर्चे पर कुछ नहीं हुआ है। न्यायिक व्यवस्था का आलम यह है कि तीन करोड़ से ज्यादा केस अदालतों में लंबित हैं। पुलिस और न्यायिक सुधारों के लिए समयसीमा तय करना एक अच्छा कदम हो सकता है।
स्वच्छ भारत को बढ़ावा: अस्वच्छता, स्वास्थ्य के लिए चुनौती बनती गंदगी और नागरिक बोध का अभाव भारत के संदर्भ में नई बात नहीं है। स्वच्छ भारत अभियान के जरिये लोगों को गंदगी न फैलाने के लिए प्रेरित करना अच्छी पहल है, पर बड़ी-बड़ी हस्तियों का तड़का लगा देने भर से यह समस्या हल नहीं होने वाली। सवाल यह है कि क्या सभी शहरों, नगरों और गांवों में कचरा प्रबंधन का व्यवस्थित तंत्र मौजूद है। टैक्स के जरिये नगर निकायों के लिए रकम की व्यवस्था करना अच्छा कदम हो सकता है, ताकि वे कचरे को निपटाने का सुनियोजित तंत्र बना सकें।
सुशासन के लिए जरूरी विकास: भारत को विकास में निवेश की जरूरत है। राष्ट्रीय सुरक्षा और आय सुरक्षा के मामले में चीन दुनिया में इसलिए आगे है, क्योंकि देंग श्याओ पिंग ने विकास के विचार को आगे बढ़ाया। इसकी घर वापसी की जरूरत है। समझना होगा कि बड़ी जनसंख्या का फायदा तभी उठाया जा सकता है, जब भविष्य को ध्यान में रखते हुए मानवीय और भौतिक संसाधनों में जरूरी निवेश किया जाए। जब विधेयकों को पारित करने के लिए संसद के संयुक्त अधिवेशन की बात हो सकती है, तो फिर विकास के लिए पांच सबसे जरूरी मुद्दों की पहचान करने और तय समयसीमा में संबंधित क्षेत्रों में प्रगति सुनिश्चित करने के लिए सदन की संयुक्त बैठक क्यों आयोजित नहीं की जा सकती? वैसे भी ′अब की बार बेहतर विकास दर′ का नारा इतना बुरा भी नहीं।
राजनीतिक सुधार: ऊपर जिन बदलावों की बात की गई है, वे तभी मुमकिन हैं, जब विभिन्न पार्टियों की पारस्परिक चर्चा के ढंग में बदलाव लाया जाए। समझना होगा कि राजनीतिक बहसों का उद्देश्य जीत या हार नहीं होता, बल्कि नए विचारों को प्रोत्साहन देना होता है। मगर इसके लिए पहल मोदी सरकार की तरफ से होनी चाहिए। भाजपा अगर अपने सांसदों के बीच गुणवत्ता लाने की कोशिश करती दिखे, तो यह भी अच्छा कदम हो सकता है। पिछले हफ्ते भारत रत्न से सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी परिपक्व राजनीति के लिए जाने जाते हैं। उनके भाषणों को पार्टी के सांसदों में बंटवाया जा सकता है। वैसे भी परिपक्व राजनीति बदलाव को प्रेरित कर सकती है।
अफसोस की बात है कि सामाजिक क्षेत्र पर तकरीबन सात लाख करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद हमारा देश मानव विकास के काफी निचली पायदान पर है। पहले ही काफी समय निकल चुका है। जब तक देश का राजनीतिक वर्ग मिलकर काम नहीं करता, गालिब की पंक्तियां, बहुत निकले मेरे अरमां, लेकिन फिर भी कम निकले, माहौल में निराशा को प्रतिध्वनित करती रहेंगी।
अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक