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1922 चौरी-चौरा कांड: इतिहास में अविस्मरणीय काकोरी

Sun, 08 Aug 2021 06:19 AM IST
Pawan kumar Pawan kumar
Updated Sun, 08 Aug 2021 06:19 AM IST
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1922 chaura chauri incident and unforgettable kakori
काकोरी कांड - फोटो : amar ujala

फरवरी, 1922 में चौरी-चौरा कांड के बाद गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने के बाद राष्ट्रीय आंदोलन विराम के दौर से गुजर रहा था। सृजनात्मक कार्य तो हो रहे थे, पर भावनाओं का उद्दाम प्रवाह कहीं दबा हुआ था। ऐसे हालात में कुछ क्रांतिकारी संगठन गुप्त रूप से अंग्रेजों से लगातार मोर्चा ले रहे थे। ऐसा ही एक संगठन था, हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन, जिसका गठन 1924 में कानपुर में उत्तर प्रदेश तथा बंगाल के कुछ क्रांतिकारियों द्वारा किया गया। इस संगठन ने अपना घोषणापत्र द रिवोल्यूशनरी के नाम से देश के सभी प्रमुख स्थानों पर वितरित किया। आजादी का आंदोलन चलाने के लिए क्रांतिकारियों को धन की जरूरत पड़ती थी। इसी उद्देश्य से संगठन द्वारा रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में एक-दो राजनीतिक डकैतियां डाली गई। इन डकैतियों से अपेक्षानुरूप धन तो नहीं मिला, अलबत्ता एक-एक व्यक्ति जरूर मारा गया। यह तय किया गया कि अब इस तरह की डकैतियां नहीं डाली जाएंगी, मात्र सरकारी धन ही लूटा जाएगा।


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काकोरी सरकारी धन को लूटने की पहली बड़ी वारदात थी। आठ अगस्त, 1925 को शाहजहांपुर में बिस्मिल के घर पर क्रांतिकारियों की एक गुप्त बैठक हुई, जिसमें 08 डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन में डकैती डालने की योजना बनी, क्योंकि इसमें सरकारी खजाना लाया जा रहा था। तय किया गया कि लखनऊ से करीब पच्चीस किलोमीटर पहले पड़ने वाले स्थान काकोरी में ट्रेन डकैती डाली जाए। नेतृत्व बिस्मिल का था और इस योजना को फलीभूत करने के लिए 10 क्रांतिकारियों को शामिल किया गया, जिनमें अशफाक उल्ला खां, मुरारी शर्मा, बनवारी लाल, राजेंद्र लाहिड़ी, शचींद्रनाथ बख्शी, केशव चक्रवर्ती (छद्म नाम), चंद्रशेखर आजाद, मन्मथनाथ गुप्त एवं मुकुंदी लाल शामिल थे।

इन क्रांतिकारियों के पास जर्मनी मेड चार माउजर और कुछ पिस्तौलें थीं। पूर्व योजना के अनुसार नौ अगस्त को ये इस ट्रेन में शाहजहांपुर से सवार हुए। जैसे ही पैसेंजर ट्रेन काकोरी रेलवे स्टेशन पर रुककर आगे बढ़ी, क्रांतिकारियों ने चेन खींचकर ट्रेन रोक दी। गार्ड रूम में सरकारी खजाना रखा था। क्रांतिकारी दल ने गार्ड रूम में पहुंचकर सरकारी खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया। पहले तो इसे खोलने की कोशिश की गई, पर इसमें नाकामी मिलने पर अशफाक उल्ला ने अपना माउजर मन्मथनाथ गुप्त को पकड़ा दिया और स्वयं हथौड़े से बक्सा तोड़ने में जुट गए। इधर अशफाक हथौड़े से बक्सा तोड़ रहे थे, दूसरी ओर मन्मथनाथ गुप्त ने उत्सुकतावश माउजर का ट्रिगर दबा दिया। इधर बक्से का ताला टूटा, उधर माउजर से गोली चल गई और एक मुसाफिर मारा गया। खजाना लूटकर ये क्रांतिकारी फरार हो गए।

ब्रिटिश हुकूमत ने इस डकैती को बहुत गंभीरता से लिया और स्कॉटलैंड पुलिस को इसकी जांच करने की जिम्मेदारी दी। जांच दल का नेतृत्व सीआईडी इंस्पेक्टर तसद्दुक हुसैन कर रहे थे। पुलिस दल को छान-बीन के दौरान घटना स्थल से एक चादर मिली, जो क्रांतिकारी जल्दबाजी में वहीं छोड़ आए थे। पुलिस ने चादर के निशानों से पता लगा लिया कि यह चादर शाहजहांपुर के किसी व्यक्ति की है। पूछताछ में पता चला कि चादर बनारसी लाल की है, जो बिस्मिल के साझेदार थे। पुलिस ने बनारसी लाल से मिलकर काकोरी कांड की बहुत-सी जानकारियां प्राप्त कर ली, फिर अलग-अलग स्थानों से इस घटना में शामिल चालीस लोगों को शक के आधार पर गिरफ्तार किया। चंद्रशेखर आजाद, मुरारी शर्मा, केशव चक्रवर्ती, अशफाक उल्ला खां व शचींद्रनाथ बख्शी फरार थे।

गिरफ्तारियों ने क्रांतिकारियों को रातोंरात लोकप्रिय बना दिया। इन पर लखनऊ में मुकदमा चला। क्रांतिकारियों ने ट्रायल के दौरान मेरा रंग दे बसंती चोला और सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है समवेत स्वर में गाकर राष्ट्रीय जोश को नया उभार दे दिया। काकोरी कांड का ऐतिहासिक मुकदमा लगभग 10 महीने तक लखनऊ की अदालत रिंग थियेटर में चला। आजकल इस भवन में लखनऊ का प्रधान डाकघर है। छह अप्रैल, 1927 को इस मुकदमे का फैसला हुआ। रामप्रसाद बिस्मिल, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह और अशफाक उल्ला खां को फांसी, योगेश चंद्र चटर्जी, मुकंदीलाल जी, गोविंद चरण कार, राजकुमार सिंह, रामकृष्ण खत्री को 10-10 साल की, विष्णुशरण दुब्लिश और सुरेश चंद्र भट्टाचार्य को सात साल की और भूपेंद्रनाथ, रामदुलारे त्रिवेदी व प्रेमकिशन खन्ना को पांच-पांच साल की सजा हुई। बाद में अशफाक उल्ला खां को दिल्ली से और शचींद्रनाथ बख्शी को भागलपुर से पुलिस ने गिरफ्तार किया। उन दोनों को भी आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में काकोरी कांड इसलिए अविस्मरणीय रहेगा कि जब देश चौरी चौरा घटना के बाद ‘संघर्ष के बाद विराम' के दौर से गुजर रहा था, देशवासियों की छटपटाहट को बाहर निकालने का रास्ता नहीं दिख रहा था, तब हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़े इन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत के सामने चुनौती रखी थी। काकोरी कांड ने देश में नई चेतना का संचार किया था।

(-भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी।) 

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