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गुमनाम शहादत का सौवां साल

Tue, 23 May 2017 06:51 PM IST
सुधीर विद्यार्थी
सुधीर विद्यार्थी Updated Tue, 23 May 2017 06:51 PM IST
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100th anniversary of forgoten martyrdom
प्रताप सिंह बारहठ

भारतीय क्रांतिकारी दल के संगठनकर्ता शचींद्रनाथ सान्याल ने अपनी प्रसिद्ध कृति बंदी जीवन में एक अध्याय ‘प्रताप की कहानी’ शीर्षक से लिपिबद्ध किया है, जिसमें राजस्थान के विख्यात क्रांतिकारी केसरी सिंह बारहठ और उनके पुत्र प्रताप की विप्लवी गाथा के ऐतिहासिक महत्व का मूल्यांकन है। प्रताप उत्तर भारत के प्रथम ’बनारस षड्यंत्र’ और लॉर्ड हार्डिंग्ज मामले, दोनों से जुड़े अनोखे क्रांतिकारी थे। दल में उनका महत्व इतना बढ़ गया था कि रासबिहारी बोस जैसे क्रांतिकारी 25 वर्ष के इस नौजवान पर सर्वाधिक भरोसा करने लगे थे। आगे चलकर असानाड़ा रेलवे स्टेशन पर उन्हें धोखे से पकड़ लिया गया।

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ब्रिटिश सरकार जानती थी कि बनारस मामले और राजपूताना में क्रांतिकारी गतिविधियों के साथ ही लॉर्ड हार्डिंग्ज पर दिल्ली के चांदनी चौक पर बम फेंकने जैसे अनेक रहस्य प्रताप के पास हैं, ऐसे में गुप्तचर विभाग ने उन्हें अनेक प्रलोभन दिए। यह भी कहा कि उनकी मां बहुत रोती हैं। लेकिन प्रताप ने कहा कि मैं अपनी अकेली मां को हंसाने के लिए देश की हजारों मांओं को नहीं रुलाना चाहता।
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ब्रिटिश अधिकारी प्रताप को दिल्ली और कोटा षड्यंत्र केस में बंदी उनके क्रांतिकारी पिता केसरी सिंह के पास हजारीबाग जेल में ले गए कि शायद  पिता के पास पहुंच प्रताप मानसिक रूप से कमजोर पड़ जाएं। प्रताप को सामने देख पिता ने उन्हें चेतावनी देते हुए कहा कि यदि उन्होंने किसी तरह की कमजोरी दिखाई, तो जेल से छूटने के बाद वह उनकी गोली से बच नहीं सकेंगे।
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हर तरह से हार जाने के बाद अंग्रेज अधिकारी प्रताप को बरेली जेल वापस ले आए और भयंकर यातनाएं दीं, जिसमें 24 मई, 1918 को जेल के भीतर वह शहीद हो गए। उनके निधन की सूचना भी घर वालों को नहीं दी गई। बरेली शहर में जब कुछ लोगों को उनके प्राणोत्सर्ग का पता चला, तब उन्होंने अंत्येष्टि के लिए उनके मृत शरीर की मांग की। लेकिन ब्रिटिश सरकार ने प्रताप को जेल की दीवारों के भीतर गुपचुप ढंग से दफन कर दिया। साम्राज्यवाद के विरुद्ध जेल के भीतर प्रताप का वह अनूठा संघर्ष एक समय साहित्य अकादेमी से  केसरी सिंह  बारहठ पर प्रकाशित पुस्तक में भी दर्ज किया गया था। पर समय के साथ प्रताप की शहादत पर विस्मृति की धूल चढ़़ती चली गई। प्रताप के गृहनगर राजस्थान के (शाहपुरा) भीलवाड़ा में प्रताप और उनके माता-पिता के नाम पर भव्य स्मारक हैं। उनकी हवेली को भी क्रांतिकारी संग्रहालय के रूप में तब्दील कर दिया गया है।


चार वर्ष बरेली के केंद्रीय कारागार में रहे विख्यात क्रांतिकारियों मन्मथनाथ गुप्त, एमएन राय, चंद्रसिंह गढ़वाली, यशपाल, शचींद्रनाथ बख्शी, रमेशचंद्र गुप्त, राजकुमार सिन्हा, भारतवीर मुकुंदीलाल, विष्णु शरण दुबलिश तथा प्रताप सिंह के नाम पर द्वार व बैरक के नामकरण के साथ ही उनकी स्मृति में शिलापट्ट और चित्र लगवाने का कार्य संपन्न हुआ, जिसके चलते बरेली का केंद्रीय कारागार देश भर में क्रांतिकारियों का पहला स्मारक बन सका। इस वर्ष 24 मई को अमर शहीद प्रताप सिंह बारहठ के बलिदान का शताब्दी वर्ष शुरू होने पर उनकी बलिदान स्थली बरेली की धरती पर प्रताप का एक भव्य स्मारक का निर्माण कराया गया है, जिसमें राजस्थानी शैली का गुलाबी पत्थर का मंडप तथा उनकी संगमरमर की प्रतिमा है।

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