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उम्मीदों की सदायें बुला रही हैं
शंकर अय्यर
Updated Wed, 03 Sep 2014 08:13 PM IST
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राजनीतिक, सामाजिक और यहां तक कि पारिवारिक स्तर पर होने वाली चर्चाओं तक में आजकल 'अच्छे दिन' का जुमला हावी है। मगर इसकी अभिव्यक्ति का अंदाज सबका अलग-अलग हो सकता है। यह एक जिज्ञासा, सामाजिक चर्चा की शुरुआत, घोषणा या सुगबुगाहट, अभिवादन या व्यंग्य किसी भी रूप में हो सकता है। यह व्यक्तिगत, संस्थागत और राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित कोई कड़वी टिप्पणी भी हो सकती है।
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इस हफ्ते मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के पहले 100 दिन पूरे किए। ऐसे में इसका आकलन तो होना ही था, मगर यह सवाल भी उठता है कि आखिर इस सौ दिन के एजेंडे की उत्पत्ति कहां से हुई। दरअसल यह एक अमेरिकी परंपरा है। मार्च, 1933 में जब फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट अमेरिका के राष्ट्रपति बने, तब अर्थव्यवस्था में मंदी चरम पर थी। उन्होंने बदलाव का जो वायदा किया था, उसे पूरा भी किया। अपने कार्यकाल के पहले सौ दिनों के भीतर ही उन्होंने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए न्यू डील कार्यक्रमों की शुरुआत की। और तभी से पहले सौ दिनों की कसौटी के आधार पर अमेरिका के हर राष्ट्रपति को परखने की परंपरा की शुरुआत हुई।
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अध्यक्षीय शासन प्रणाली न होने के बावजूद भारत भी इस सौ दिनों की चुनौती से बच नहीं पाया। ऐसे में, मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि अच्छे दिन आ गए क्या? इसका जवाब लोगों की उम्मीदों के स्तर पर निर्भर करता है। यह आस्था और अनास्था के बीच की बात है। भक्तों का मानना है कि अच्छे दिन पहले ही आ चुके हैं। संशयवादी इसके कुछ और सुबूत चाहते हैं, जबकि जो नास्तिक हैं, उन्हें कोई खास बदलाव नहीं दिख रहा। मगर इस मुद्दे को गहराई से समझने की जरूरत है। बहुध्रुवीय अव्यवस्था से भारत एकध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ चुका है। यहां एक ही व्यक्ति का शासन है, और यही मोदी सरकार है। प्रमुख उपलब्धियां बदलती हुई व्याख्याओं, शेयर बाजार में उछाल, व्यापारिक माहौल में झलकता भरोसा, रुपये के मूल्य में आती स्थिरता और अप्रैल-जून तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में होती बढ़ोतरी के तौर पर देखी जा सकती हैं। इनके सम्मिलित प्रभाव ने देश में छाए निराशा के माहौल को बदलाव और उम्मीदों का दिलासा दिया है।
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मगर उम्मीदों को उठाने की यह जिम्मेदारी सामूहिक तौर पर मोदी की पूरी टीम की है। कहा जा सकता है कि सौ दिनों के दौरान मंत्रियों का प्रदर्शन उम्मीदें जगाता है, तो निराश भी करता है। अरुण जेटली का एजेंडा मोदी के मॉडल के अनुरूप है। नितिन गडकरी की छवि एक काम करने वाले नेता की है। मुंबई और पुणे के बीच सबसे सस्ते एक्सप्रेस हाई-वे के निर्माण की उपलब्धि उनके खाते में है। उनमें पूरी व्यवस्था को सक्रिय रखने की अद्भुत क्षमता है। गंगा की सफाई की चुनौती को स्वीकार करने के बाद उमा भारती सिंचाई और ऊर्जा क्षेत्र में फायदे के लिए नदियों को जोड़ने की व्यापक परियोजना की ओर देख रही हैं। पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, ऊर्जा और कोयला मंत्री पीयूष गोयल और पर्यावरण तथा सूचना व प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के साथ निर्मला सीतारमन ने भी उम्मीदें जगाए रखी हैं। हालांकि सब्सिडी घटाने और ऊर्जा सुरक्षा जैसे लक्ष्यों को पूरा करने के लिए गोयल और प्रधान को समय सीमा भी निर्धारित करनी होगी।
दूसरी ओर कुछ मंत्री 'चलता है' वाली मानसिकता के भी हैं। देश के किसान सूखे से जूझ रहे हैं, मगर कृषि मंत्री के कानों पर जूं तक नहीं रेंगती दिखी। गृह मंत्री राजनाथ सिंह गलत वजहों से चर्चा में हैं। अफवाहों पर ध्यान न दिया जाए, तब भी सहयोगियों के सांप्रदायिक बयानों पर उनकी चुप्पी और नक्सलवाद जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा के अहम मसले पर उनकी उदासीनता अफसोसनाक है। कभी सरदार पटेल जैसे नेता ने जो पद संभाला था, उस पर राजनाथ का प्रदर्शन उनकी नाकाबिलियत को दर्शाता है। मंत्रियों की उदासीनता की यह सूची यहीं खत्म नहीं होती। गोवा, तेलंगाना और खासकर उत्तर प्रदेश में अभिव्यक्ति के जहर के जरिये सांप्रदायिकता फैलाने की कोशिशें हो रही हैं। आलोचनाओं से बचने के लिए जरूरी है कि मोदी जिस तरह सरकार के भीतर व्यवस्था बनाने में सफल रहे हैं, वैसी ही व्यवस्था वह राजनीतिक गतिविधियों के क्षेत्र में बनाने की कोशिश करें।
हालांकि सरकार के सकारात्मक कदमों से भी कोई इन्कार नहीं होना चाहिए। और इसकी सबसे बड़ी वजह है, नरेंद्र मोदी का अविरत संचार करने वाला व्यक्तित्व। भूटान व नेपाल से वार्ता करके, श्रीलंका व बांग्लादेश के साथ रिश्तों में संतुलन लाकर और ब्राजील व हाल ही में जापान में व्यावहारिक नजरिया दिखाते हुए उन्होंने सम्मानपूर्ण संबंधों की दिशा में एक पग आगे बढ़ाया है। मोदी सरकार ने पाकिस्तान को यह कड़ा संदेश दिया है कि कश्मीर का मुद्दा त्रिपक्षीय नहीं है। इसके अलावा सांसदों को गांवों को गोद लेने की सलाह हो या स्कूलों में स्वच्छता की बात, मोदी सरकार की सराहना ही हुई है। जन-धन योजना की तारीफ उनके आलोचक भी कर रहे हैं। संस्थागत बदलावों के तौर पर एक व्यय प्रबंधन आयोग के गठन और योजना आयोग की समाप्ति की घोषणा की गई है। मगर सवाल फिर भी वही है कि क्या अच्छे दिन आ गए हैं। दरअसल अच्छे दिनों का सरोकार इससे नहीं है कि सरकार क्या करती है, बल्कि इससे है कि क्या जो उम्मीदें थीं, वे पूरी हो पा रही हैं? लोगों के जेहन में वे वायदे हैं, जो चुनाव से पहले किए गए थे। इस मोर्चे पर मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती खाद्य महंगाई पर काबू पाने की है। दूसरी चुनौती नौकरियों के सृजन की है। समझना होगा कि नेताओं की छवि उनकी शख्सियत से ज्यादा उनके कामों से निर्धारित होती है। यह बात मोदी के लिए उतनी ही सच है, जितनी कि रूजवेल्ट या रोनाल्ड रीगन के लिए थी।
(अर्थशास्त्र की राजनीति के विशेषज्ञ और एक्सीडेंटल इंडिया के लेखक)