उनकी पहचान और हमारे सरोकार

Vinit Narain Updated Sat, 14 Jul 2012 12:00 PM IST
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घंटों कतार में खड़े होने और निजता पर हमले के बाद अंततः मेरा काम निपट गया। जरा रुकिए, आप जैसा समझ रहे हैं, वैसा कुछ नहीं है। दरअसल मैं नंदन नीलेकणि के आधार कार्ड की बात कर रही हूं, जो एक तरह से आपको नंगा ही कर देता है। और वह भी, लोगों के सामने। ऐसे कार्ड भरने के दौरान जो प्रक्रियागत परेशानियां होती हैं, आधार कार्ड भरते हुए भले ही ऐसा कुछ नहीं था, लेकिन इसमें शासकीय हस्तक्षेप इतना ज्यादा है कि आश्चर्य होता है कि इन जानकारियों का सरकार करेगी क्या।
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मैं एक ऐसे भीड़ भरे हॉल में थी, जहां मेरी गोपनीयता की रक्षा के लिए कुछ भी न था। दो युवा फॉर्म भरने में लगे थे, जबकि हम फिंगर प्रिंटिंग और स्क्रीनिंग की प्रक्रियाओं से गुजर रहे थे। इन सबके अलावा एक चीज ने तो मुझे वाकई चकित कर दिया। फॉर्म में स्त्री और पुरुष के अलावा भी एक कॉलम था, जो बहुत गहराई से देखने पर ही पढ़ने में आता था। यह बहुत अच्छी पहल है। पुरुष और स्त्री के अलावा एक और श्रेणी के बारे में सोचना नीलेकणि के प्रगतिशील और सही नजरिये का ही परिचायक है। लगभग इसी समय यह सूचना आई कि इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय दूरस्थ शिक्षा योजना के अपने आवेदन पत्रों में 'पुरुष' और 'स्त्री' के अलावा 'अन्य' का एक कॉलम शुरू करेगा, जिसकी शुरुआत जुलाई से होगी।
आज अगर इस तरह की शुरुआत हो रही है, तो इसके लिए अभीना अहीर जैसी कार्यकर्ताओं का आभारी होना चाहिए, जो पिछले काफी समय से ट्रांसजेंडरों यानी पुरुष और स्त्री के अलावा तीसरी श्रेणी के लोगों की स्वतंत्र पहचान के लिए आंदोलन कर रही हैं। उनका दावा है कि देश की 40 प्रतिशत से अधिक ट्रांसजेंडर शिक्षित हैं। इग्नू यह कदम उन छात्रों के अनुरोध के बाद उठाने जा रहा है, जो अपने लिंग के बारे में बताने को अनिच्छुक थे।
दरअसल इस तरह के छात्र एक स्तर के बाद स्कूल-कॉलेज छोड़ देते हैं, क्योंकि उनकी लैंगिकता को अकसर निशाना बनाया जाता है। ऐसे छात्र सामाजिक लांछन के पात्र बनते हैं। यह अपमान इतना बड़ा होता है कि शिक्षा खत्म करने के बाद नौकरी ढूंढते हुए ऐसे अनेक लोग मजबूरी में खुद को पुरुष बताते हैं। संतोष जोगलेकर जैसे कार्यकर्ता वर्षों से अभियान चला रहे हैं कि विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेने वाले जो छात्र अपनी लैंगिक पहचान नहीं बताना चाहते, उनके प्रति संवेदनशीलता दिखाई जाए।

दरअसल ऐसे लोगों के प्रति संवेदना जताना जितना आसान है, व्यावहारिक तौर पर उनके साथ होना उतना ही कठिन भी है। क्या मैं ऐसे किसी व्यक्ति को नौकरी दे सकती हूं, जो पुरुष या स्त्री न होकर कुछ और हो? अगर मेरे बच्चों का कोई दोस्त मुझसे कहे कि मैं ट्रांसजेंडर हूं, तो मेरी प्रतिक्रिया क्या होगी? खुद को पुरुष और स्त्री से अलग बताने वाले के साथ एक कमरे में रहने का साहस कितने लोग कर पाएंगे? ये सब व्यावहारिक मुद्दे हैं, जो व्यावहारिक समाधान चाहते हैं। जिस तरह आज एक ही लिंग में शादियां हो रही हैं, उसी तरह थर्ड जेंडर के बारे में भी समाज को सहानुभूतिशील होना पड़ेगा।

ऐसे लोगों के बारे में देश में जो सूचनाएं उपलब्ध हैं, वे भी स्पष्ट और पर्याप्त नहीं हैं। कोई किसी ट्रांसजेंडर को किस तरह पहचान सकता है? वे औपचारिक बातचीत में खुद को किस श्रेणी में रखते होंगे, श्रीमान, श्रीमती या कुछ और? जो लोग खुद को इस तीसरी श्रेणी में रखते हैं, उनके लिए यह दुनिया सचमुच बहुत मुश्किल है। मैंने कभी एक फिल्म प्रिसिला, क्वीन ऑफ देजर्ट देखी थी, जो लैंगिक पहचान के लिए लड़ती एक आंदोलनकारी की कहानी थी। उसके कई वर्षों बाद भी स्थिति नहीं बदली है। अनेक प्रश्न अब भी अनुत्तरित हैं, जैसे-जनसंख्या के हमारे सर्वेक्षण में किन्नर कहां हैं? इस तरह के लोग जिन बच्चों को गोद लेते हैं, उनका क्या होता है? बच्चे उन्हें क्या कहते हैं, मम्मी, पापा या कुछ और? मैं जान-बूझकर इस तरह के सवाल उठा रही हूं।

अज्ञानता के कारण गलतियां करने से अच्छा है कि चीजों को उसके सही परिप्रेक्ष्य में समझा जाए। पिछले दिनों मैंने द बेस्ट एक्सोटिव मेरीगोल्ड होटल फिल्म देखी, जो एक रिटायर्ड ब्रिटिश जज, जो कि गे है, और एक भारतीय के रिश्तों की कहानी है, जो एक रात साथ गुजारते हैं। दशकों बाद वह जज उस भारतीय को ढूंढने के लिए वापस जयपुर आता है और आश्चर्यजनक रूप से उसे ढूंढ भी लेता है। उस आदमी की पत्नी जज का स्वागत करते हुए कहती है, 'मैं जानती हूं कि आप कौन हैं।' उसकी आवाज में किसी तरह की घृणा नहीं है। वह अपने पति और उसके ब्रिटिश साथी के रिश्ते को स्वीकार कर लेती है। यह उस फिल्म का सबसे प्रभावी हिस्सा था। इस तरह की स्थिति हमारे समाज में कब आएगी!
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