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नया खाद्य सुरक्षा विधेयक चाहिए

Wed, 11 Jul 2012 12:00 PM IST
Vinit Narain
Vinit Narain Updated Wed, 11 Jul 2012 12:00 PM IST
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India Food Security Bill Annapurna scheme Antyodaya scheme
देश में भूख से मुक्ति दिलाने के लिए कई तरह की खाद्य योजनाएं चल रही हैं, जिनमें जन वितरण प्रणाली, समेकित बाल विकास योजना और मध्याह्न भोजन योजना प्रमुख हैं। इसके अलावा बुजुर्गों के लिए अन्नपूर्णा योजना और अति निर्धनों के लिए अंत्योदय योजना है। इनमें से ज्यादातर योजनाओं के क्रियान्वयन में भारी अनियमितता है। जन वितरण प्रणाली का अनाज काला बाजार में चला जाता है, जरूरतमंद महिलाएं एवं बच्चे समेकित बाल विकास योजना का समुचित लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं और अनेक निर्धन व्यक्तियों के पास बीपीएल कार्ड नहीं है, क्योंकि गांव के प्रभावशाली लोगों ने उसे अपने नाम से बनवा लिया है।
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बेहतर लेकिन खराब रूप से क्रियान्वियत इन योजनाओं की तुलना में यूपीए सरकार का खाद्य सुरक्षा विधेयक कहीं अधिक महत्वाकांक्षी है, जिसका कृषि मंत्री समेत सरकार में कई लोगों ने विरोध किया। इस विवादित विधेयक का मसौदा राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् (एनएसी) ने कृषि एवं खाद्य से जुड़े वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों, किसानों या सिविल सोसाइटी के लोगों से सलाह लिए बिना ही तैयार किया था। इस मसौदे को सोनिया गांधी का जबर्दस्त समर्थन प्राप्त है। फिलहाल अधर में लटका यह विधेयक जन वितरण प्रणाली के तहत खाद्य वितरण का दूसरा उपाय सुझाता है, लिहाजा इसे खाद्य सुरक्षा विधेयक कहने के बजाय संशोधित जन वितरण प्रणाली विधेयक कहा जा सकता है।
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यह विधेयक गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले प्रति व्यक्ति को सात किलो चावल और गेहूं क्रमशः तीन और दो रुपये प्रति किलो की दर से मुहैया कराने का प्रस्ताव देता है। अब सरकार के भीतर से यह मांग उठ रही है कि इसके तहत लाभान्वितों की केवल एक श्रेणी होनी चाहिए और प्रति व्यक्ति पांच किलो अनाज दिया जाना चाहिए। खाद्य सुरक्षा मुख्यतः तीन बातों पर निर्भर करती है, खाद्य उत्पादन, खाद्य वितरण एवं खाद्य उपभोग। राष्ट्रीय सलाहकार समिति का मसौदा मात्र खाद्य वितरण की बात करता है। यह न तो खाद्य उत्पादन जैसे अहम पहलू की बात करता है और न ही खाद्य उपभोग की, जो पोषण सुनिश्चित करता है। पोषण के लिए हमें स्वच्छ पेयजल एवं साफ-सफाई की जरूरत है। खाद्य सुरक्षा विधेयक में इसलिए स्वच्छ पेयजल मुहैया कराने और साफ-सफाई के प्रावधान होने ही चाहिए।
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खाद्य सुरक्षा से निपटने के लिए कुछ कठिन फैसले लेने होंगे। मसलन, यह सुनिश्चित करना होगा कि जमीन और पानी जैसे उत्पादक संसाधनों पर पहला हक किसका होगा। क्या कोका कोला को अपने संयंत्र के लिए पानी मिलेगा या खेती के लिए किसान इसे हासिल कर पाएंगे? क्या सूखी जमीनों में नलकूप लगाने के लिए सरकारी निवेश होगा, ताकि छोटे किसान जाड़े में दूसरी फसल ले सकें? उर्वरकों की सबसिडी जैसे मुद्दे पर भी विवाद होगा। क्या पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्य ही सरकारी सबसिडी के प्रमुख लाभार्थी बने रहेंगे? या सबसिडी का रुख सूखी, अनुर्वर जमीनों की ओर भी होगा, जिससे कि उन इलाकों के किसानों को भी उनका हक मिले।

छोटे और सीमांत किसानों के पास न सिर्फ जमीन का सबसे अनुर्वर हिस्सा है, बल्कि उनके पास सिंचाई की सुविधा भी कम ही उपलब्ध है। खाद्य सुरक्षा विधेयक की सार्थकता तभी होगी, जब वह इन किसानों के पक्ष में बात करे। खाद्य सुरक्षा विधेयक को साझा संसाधनों और उन पर सबके हक की भी बात करनी चाहिए। मसलन, इसे आम इस्तेमाल की जमीन पर रतनजोत (जट्रोफा) की खेती का विरोध करना चाहिए, क्योंकि यह उपजाऊ जमीन को बंजर बना देता है। यह हरी पत्तीदार सब्जियों और औषधीय पौधों के स्रोतों को भी नष्ट कर देगा, जिस पर गरीब लोग निर्भर रहते हैं।

खाद्य सुरक्षा विधेयक को उन कंपनियों के खिलाफ भी मोरचा लेना चाहिए, जो विशेष आर्थिक क्षेत्र के नाम पर औद्योगिक इकाई स्थापित करने के लिए कृषि योग्य जमीन हथिया रहे हैं। हमारे देश की सबसे उपजाऊ जमीनों का, जिनमें दो से तीन फसलें होती हैं, शहरीकरण के लिए अधिग्रहण किया जा रहा है। ऐसे में अनाज कहां उगेगा? एक व्यापक खाद्य सुरक्षा विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए जरूरी है कि बहुत से लोगों को उनके एकाधिकार वाली चीजों में से कुछ का त्याग करने के लिए कहा जाए। लेकिन प्रस्तावित विधेयक स्पष्ट रूप से ऐसा करने में अक्षम है। यह ताकतवर निहित स्वार्थी तत्वों को परेशान करना नहीं चाहता, जिन्होंने सबसे अच्छी जमीन और सबसे ज्यादा पानी पर कब्जा कर रखा है। जब तक इस अनुचित यथास्थितिवाद को बदला नहीं जाता, तब तक खाद्य सुरक्षा संभव नहीं है।


गरीबों के साथ न्याय करने वाले कानून का मसौदा तैयार करने के लिए खाद्य सुरक्षा से संबंधित विभिन्न पहलुओं की व्यापक समझ और ईमानदार इरादे की जरूरत होगी। अन्यथा न सिर्फ लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सकेगा, बल्कि प्रस्तावित कानून भी निरर्थक ही होगा। खाद्य सुरक्षा के व्यापक दृष्टिकोण में खाद्य उत्पादन (उपलब्धता), उसका वितरण और गरीबों द्वारा उसके उपभोग और पोषण का लाभ उठाने की क्षमता जैसे तमाम पहलुओं का समावेश होना चाहिए। अगर हम वास्तव में खाद्य सुरक्षा के प्रति गंभीर हैं, तो हमें नए सिरे से पहल करते हुए नए खाद्य सुरक्षा विधेयक का मसौदा तैयार करना चाहिए।
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