रक्षा सौदे के रिश्वतखोरों को मिले सजा
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बात सीधी-सी है। एक इतालवी कंपनी ने भारत के कुछ अधिकारियों और राजनेताओं को एक रक्षा सौदे में तगड़ी रिश्वत दी है। रिश्वत देनेवाले इटली में जेल में हैं, लेकिन रिश्वत लेनेवाले अभी तक छिपे हुए हैं। बेशक, छोटे-मोटे रिश्वत लेनेवाले कुछ चेहरों से पर्दा उठ चुका है और भारत की जांच संस्थाएं उनसे पूछताछ कर रही हैं, पर सौदे का विश्लेषण करने पर ऐसा नहीं लगता कि इतनी बड़ी रिश्वत हजम करने की क्षमता इन प्यादों के पास है। सो सवाल उठने स्वाभाविक हैं, लेकिन राज्यसभा की बहस सुनते हुए ऐसा लगा, जैसे सारी कहानी राजनीतिक बदले की है, देशवासियों से चोरी करने की नहीं।
जिस दिन राज्यसभा में बहस हो रही थी, मुझे दिन भर टेलीविजन के सामने बैठना पड़ा, क्योंकि मेरी तबियत अच्छी नहीं थी। शुरू से अंत तक बहस देखने-सुनने का मुझे मौका मिला। कांग्रेस का पक्ष समझना आसान था, लेकिन यह बात मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आई कि बाकी विपक्षी दलों ने कांग्रेस का साथ क्यों दिया। कुछ का कहना था कि रक्षा सौदों की जांच होने से सेना के लिए हथियार खरीदने में विलंब होता है। कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने अपनी ‘सेक्यूलर’ आंखों से इस मामले में 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' की साजिश देखी।
शायद उनको जानकारी नहीं थी कि इटली के एक न्यायाधीश ने उस सुबह हमारे टीवी पत्रकारों से कहा था कि रिश्वत देनेवालों से कुछ पर्चियां बरामद हुई थीं, जिनमें इशारा किया गया था कि पूर्व वायुसेनाध्यक्ष और उनके परिवार के अलावा भी रिश्वत दिया गया था। जब उनसे पूछा गया कि उनकी अदालत में ये नाम क्यों नहीं आए, तो उन्होंने कहा के इस मामले की जांच करना उनके दायरे के बाहर था, क्योंकि यह काम भारत की जांच संस्थाओं को करना चाहिए।
अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर सौदा अगर उलझन में पड़ गया है दोस्तो, तो सिर्फ इसलिए कि इतालवी अदालत में जो पर्चियां पेश की गई हैं, उनमें कुछ ऐसे अक्षर हैं, जो इशारा करते हैं कि रिश्वत का रास्ता कांग्रेस के ऊंचे दरवाजों तक पहुंचता है। जैसे बोफोर्स सौदे में हुआ था, इस बार भी रिश्वत का रास्ता सोनिया गांधी के करीबियों तक दिख रहा है। सोनिया गांधी साधारण राजनेता नहीं हैं। देशवासियों की नजर में वह त्याग की देवी हैं, जिन्होंने प्रधानमंत्री पद ठुकरा दिया। हम मीडिया वालों ने कभी पूछा नहीं कि उन्होंने वास्तव में सत्ता को त्यागा या सत्ता के उत्तरदायित्व को? लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को भले करारी शिकस्त मिली हो, पर आज भी पत्रकार सोनिया जी का सम्मान करते हैं। दिल्ली के कई बड़े ऐंकर और संपादक आज भी उनके इशारों पर नाचते हैं।
सोनिया गांधी को राजनेताओं से भी उतना ही सम्मान मिलता है। जब वाजपेयी प्रधानमंत्री बने थे, तब उन्होंने बोफोर्स की जांच ठंडे बस्ते में डाल दी थी, बावजूद इसके कि सोनिया जी के करीबी दोस्तों के स्विस बैंक खातों में रिश्वत का पैसा पाया गया था। मेरी दुआ है कि प्रधानमंत्री मोदी इस बार ऐसा न होने दें। इस रक्षा सौदे की पूरी और तेजी से जांच होनी चाहिए, क्योंकि रक्षा सौदों में जब चोरी होती है, तब तो सर्वाधिक नुकसान देश के उन जवानों को होता है, जो जान पर खेलकर इस देश की सुरक्षा करते हैं। रक्षा सौदों में रिश्वतखोरों को सजा मिली, तो संभव है कि भविष्य में इनमें चोरी बिल्कुल बंद हो जाए।