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मंजिलें और भी हैं : व्हीलचेयर पर बैठ दूसरों को चलना सिखा रही हूं

Tue, 20 Aug 2019 01:55 AM IST
प्रीति श्रीनिवासन प्रीति श्रीनिवासन
प्रीति श्रीनिवासन Published by: प्रीति श्रीनिवासन Updated Tue, 20 Aug 2019 01:55 AM IST
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Teaching others to walk in wheelchairs
प्रीति श्रीनिवासन - फोटो : a
जब मैं चार वर्ष की थी, तभी क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था। तीन सौ लड़कों के बीच मैं अकेली लड़की थी, जो क्रिकेट क्लब में कोचिंग लेती थी। मैं अंडर-19 तमिलनाडु महिला क्रिकेट टीम की कप्तान और तैराकी की राष्ट्रीय चैंपियन भी थी। मैं चेन्नई की रहने वाली हूं। 
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तब सिर्फ आठ साल की थी, जब मैंने राज्य स्तरीय टीम के लिए खेला और यह एक रिकॉर्ड है, जो अभी तक टूटा नहीं है और मैं इसके टूटने का इंतजार कर रही हूं। उस समय मैं तकरीबन 18 वर्ष की थी। 
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मैं कॉलेज की तरफ से पुडूचेरी की यात्रा पर गई थी। चेन्नई लौटते समय मैं और मेरे सहपाठी समुद्र के एक बीच पर थोड़ा वक्त बिताने के लिए रुक गए। जल्द ही, हम तटों तक पहुंच गए। मैं अन्य लड़कियों के साथ समुद्र किनारे लहरों का मजा लेने लगी। तभी अचानक एक लहर मुझसे टकराई, मुझे समझ में, नहीं आया कि आखिर मुझे हुआ क्या। 
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पूरी कोशिश करने के बावजूद मेरे शरीर ने हलचल करना बंद कर दिया। मैं पानी से बाहर निकलने की कोशिश कर रही थी, पर वह बेकार रही। चूंकि मैंने बचपन में ही तैराकी सीखी थी, इसलिए अपनी सांस तब तक रोके रखी, जब तक कि मेरे दोस्तों ने मुझे बाहर नहीं निकाला। 

वहां से सीधे मुझे अस्पताल ले जाया गया। पहले तो मुझे लकवाग्रस्त होने की जानकारी नहीं मिली, पर चेन्नई के एक अस्पताल में मेरी बीमारी को पहचाना गया। वह बहुत डरावना अनुभव था। मेरे सारे दोस्त बिछड़ गए। 

एक कॉलेज में मुझे इसलिए दाखिला नहीं मिल पाया, क्योंकि वह तीसरी मंजिल पर था, लेकिन जब मैंने वास्तव में अपने शरीर को महसूस किया, तो मेरे सारे डर धीरे-धीरे खत्म हो गए। मैं बिस्तर पर आ गई थी, पर दोबारा उठी दूसरों को आगे बढ़ाने के लिए। मैंने दूसरे दिव्यांगों व खिलाड़ियों को सहायता देने के लिए सोलफ्री नाम से एक स्वयंसेवी संगठन बनाया। 

कुछ समय पहले तमिलनाडु के व्हीलचेयर रेसिंग चैंपियन मनोज कुमार को आने वाले राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की चैंपियनशिप के लिए विशेष पैरालंपिक व्हीलचेयर की आवश्यकता थी। उन्होंने हर किसी से सहायता मांगी, लेकिन चारों ओर से निराशा हाथ लगने के बाद उनका दिल बैठ चुका था। 

अंतिम कोशिश के रूप में उन्होंने सोलफ्री से संपर्क किया। हम उन्हें राष्ट्रीय चैंपियनशिप से सिर्फ दो सप्ताह पहले व्हीलचेयर दिलाने में सफल रहे। उस टूर्नामेंट में उन्होंने गोल्ड मेडल जीता। यह मेरे लिए बेहद प्रेरणादायी था। 

'सोलफ्री' का मुख्य उद्देश्य स्पाइनल कॉर्ड की चोट के बारे में लोगों को जागरुक करना, जरूरतमंदों को डोनेशन के जरिये मदद दिलाना तथा उन्हें शिक्षा और रोजगार दिलाना है। सोलफ्री के माध्यम से खिलाड़ियों की बेहतर गतिशीलता के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए लाइट-वेट एल्यूमिनियम वाले सौ से अधिक व्हीलचेयर दिए गए हैं। 

इतना ही नहीं, हर महीने गंभीर रूप से अक्षम करीब बीस लोगों को आर्थिक सहायता भी प्रदान की जाती है। मैं दान मांगने के लिए इधर-उधर जाना नहीं चाहती। मेरा विचार है कि स्कूलों, कॉलेजों और कॉरपोरेट घरानों में जाकर प्रेरणादायक बातें करें और उनसे मिली रकम का इस्तेमाल सोलफ्री की गतिविधियों के लिए करें।

मैं अपना जीवन ईमानदारी से जीने की कोशिश कर रही हूं। हम सभी किसी न किसी पर निर्भर हैं या हमारे उपर कोई न कोई निर्भर है। मैंने कभी किसी से सहायता के बदले पैसे नहीं लिए। मुझे लगता है कि जब आप एक मजबूत इरादे से कुछ करना चाहते हैं, तो चीजें अपने आप आसान हो जाती है। मुझे विश्वास है कि उद्देश्य की पूर्ति के लिए मुझे मजबूती के साथ खड़े रहना होगा।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
 
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