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घीसू और माधव जैसे पात्र समाज को समझने का मौका देते हैं

बंशी बोहरा Updated Sun, 15 Jul 2018 12:43 PM IST
मुंशी प्रेमचंद
मुंशी प्रेमचंद
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घीसू और माधव जैसे पात्र समाज को समझने का मौका देते हैं। महान कहानीकार प्रेमचंद ने जो समाज को देखा था और आज हम जो समाज देख रहे हैं, उसमें कितना फर्क है? मुझे लगता है प्रेमचंद की कहानी 'कफन' को नए सिरे से महसूस करने की जरूरत है। उसका एक अंश-
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बाजार में पहुंचकर घीसू बोला- "लकड़ी तो जलाने-भर को मिल गई है, क्यों माधव?" माधव बोला- "हां, लकड़ी तो बहुत है, अब कफन चाहिए।" "तो चलो, कोई हल्का-सा कफन ले लें।" "हां और क्या। लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफन कौन देखता है?"

"कैसा बुरा रिवाज है कि जिसे जीते-जी तन ढांकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर कफन चाहिए।"
"कफन लाश के साथ जल ही जाता है!" "और क्या रहता है? यही पांच रुपये पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।" दोनों एक-दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाजार में इधर-उधर घूमते रहे। कभी इसकी दुकान पर गए, कभी उसकी दुकान पर। तरह-तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जंचा  नहीं। यहां तक कि शाम हो हई। तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुंचे और बिना किसी पूर्व-निश्चित योजना के अंदर चले गए। यहां जरा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे। फिर घीसू ने गद्दी के सामने जाकर कहा- "साहू जी, एक बोतल हमें भी देना।" इसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछलियां आईं और दोनों बरामदे में बैठकर शांतिपूर्वक पीने लगे। कई कुज्जियां ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनों सरूर में आ गए। घीसू बोला- "कफन लगाने से क्या मिलता है? आखिर जल ही तो जाता है, कुछ बहू के साथ तो न जाता।"

माधव आसमान की तरफ देखकर बोला, "बड़े आदमियों के पास धन है, चाहे फूंकें। हमारे पास फूंकने को क्या है?" "लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफन कहां है?" घीसू हंसा- "अबे, कह देंगे कि रुपये कमर से खिसक गए। बहुत ढूंढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास तो न आएगा, लेकिन फिर वही रुपये देंगे।" माधव भी हंसा, इस अनपेक्षित सौभाग्य पर। बोला- "बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो खूब खिला-पिलाकर!"      

-हिमाचल प्रदेश के पाठशाला से बंशी बोहरा 

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