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'विद्रोही स्वभाव ने मुझे लेखक बनाया'

Mon, 23 Apr 2018 09:22 PM IST
समरेश मजुमदार
समरेश मजुमदार Updated Mon, 23 Apr 2018 09:22 PM IST
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Samaresh Majumdar- Bengali writer from West Bengal, India, won Sahitya Akademi prize in 1984
Samaresh Majumdar

मेरा जन्म बंगाल के जलपाईगुड़ी में हुआ, जो अपनी वनस्पति, चाय के बागान और पहाड़ी नदियों के लिए जाना जाता है। मैं बचपन से ही विद्रोही स्वभाव का था। युवावस्था में पढ़ी एक किताब पैपीलोन ने मुझे बेहद प्रभावित किया था, जिसके नायक को उम्रकैद की सजा मिली है, लेकिन चारों तरफ समुद्र से घिरी जेल से वह ग्यारहवें प्रयास में भागने में सफल होता है!  जेम्स हेडली चेज का भी मैं मुरीद था। बांग्ला में बंकिमचंद्र, रवींद्रनाथ, विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय और समरेश बसु मेरे प्रिय लेखक हैं।

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उच्च शिक्षा के लिए कोलकाता चले जाने और वहां नक्सलवाद के उभार के हिंसक माहौल ने मुझ पर बहुत असर डाला। मैं नक्सलवाद के दौर के अपने चार उपन्यासों-उत्तराधिकार, कालबेला, कालपुरुष और मूसलकाल-को अपनी श्रेष्ठ रचना मानता हूं, क्योंकि वह समय इन कृतियों में बेहद प्रभावी ढंग से दर्ज हुआ है। मैं लिखते हुए अपने चरित्रों में पूरी तरह डूब जाना पसंद करता हूं, कदाचित इसीलिए मेरे उपन्यासों के कुछ चरित्र इतने महत्वपूर्ण बन गए हैं कि आलोचकों ने उन पर ध्यान दिया है।
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कुछ लोगों का कहना है कि मेरे यादगार किरदारों में से ज्यादातर अपने जीवन में अपूर्ण हैं। दरअसल जिस दौर ने मुझे लेखन में झोंका, वह दौर ही हिंसा औप मारकाट का था। मेरे जासूसी चरित्र अर्जुन को बांग्ला में सत्यजीत राय के फेलुदा के बाद सबसे ज्यादा प्रसिद्धि मिली, इसे मैं अपना सौभाग्य समझता हूं। हालांकि मैं व्योमकेश बख्शी और उसके लेखक शरदिंदु बंद्योपाध्याय को नहीं भूल सकता।
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-साहित्य अकादेमी सम्मान प्राप्त बांग्ला लेखक

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