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अंतर्ध्वनि : बाजार में आए किस्सागो ने कथाकार बनने में मेरी मदद की
Mon, 05 Aug 2019 12:11 AM IST
मो यान
मो यान
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Published by: मो यान
Updated Mon, 05 Aug 2019 12:11 AM IST
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मैं जन्म से ही बदसूरत था। गांववाले मेरा चेहरा देखकर हंसते थे। स्कूल में लड़के मुझे पीट देते थे। मैं रोता हुआ घर आता, जहां मां होती थी, यह कहने के लिए, 'तुम बदसूरत नहीं हो, बेटे। तुम्हारी एक नाक है और दो आंखें हैं, तुम्हारे हाथ-पैर सही-सलामत हैं, फिर कैसे तुम बदसूरत हो गए? अगर तुम अपना दिल साफ रखोगे और हमेशा अच्छे काम करोगे, तो तुम्हारे चेहरे को एक दिन बहुत सुंदर कहा जाने लगेगा।'
मेरी मां अनपढ़ थी और उन लोगों की बहुत इज्जत करती थी, जिन्हें पढ़ना आता हो। हमारी हालत इतनी पतली थी कि हमें यह नहीं पता होता था कि अगले पहर का खाना हमें किस ठौर से मिलेगा, उसके बाद भी मां ने किताब, कॉपी या पेंसिल खरीदने की मेरी जिद से कभी इनकार नहीं किया। उन दिनों बाजार में एक किस्सागो आया हुआ था।
मैं चोरी-छिपे उसे सुनने चला गया। उसके चक्कर में मैंने अपने काम भुला दिए, जिससे मां मुझसे नाराज हुई। लेकिन उस रात जब एक ढिबरी की कमजोर रोशनी में वह हमारे लिए कपड़े सिल रही थी, मैं दिन में सुनी कहानियां उसे सुनाने से खुद को रोक न पाया। शुरू में उसने मेरी बातों को ध्यान से नहीं सुना। लेकिन जैसे-जैसे मैंने कहानी आगे बढ़ाई, वह उसकी ओर खिंचती चली गई। उसके बाद, जिस दिन हाट लगता था, मां मुझे कोई काम नहीं देती थी।
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एक तरह से यह एक अघोषित अनुमति थी कि मैं बाजार जाऊं और नई कहानियां सुनकर आऊं। मां की इस दयालुता की कद्र करने और अपनी स्मृति का प्रदर्शन करने के लिए, मैं लौटकर मां को वे सारी कहानियां सुनाया करता था। पर आप बहुत लंबे समय तक दूसरों की कहानियां सुना-सुनाकर संतुष्ट नहीं हो सकते, इसलिए मैंने अपनी कहानियां बुननी शुरू कर दीं।
चीन के नोबेलजयी उपन्यासकार
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मेरी मां अनपढ़ थी और उन लोगों की बहुत इज्जत करती थी, जिन्हें पढ़ना आता हो। हमारी हालत इतनी पतली थी कि हमें यह नहीं पता होता था कि अगले पहर का खाना हमें किस ठौर से मिलेगा, उसके बाद भी मां ने किताब, कॉपी या पेंसिल खरीदने की मेरी जिद से कभी इनकार नहीं किया। उन दिनों बाजार में एक किस्सागो आया हुआ था।
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मैं चोरी-छिपे उसे सुनने चला गया। उसके चक्कर में मैंने अपने काम भुला दिए, जिससे मां मुझसे नाराज हुई। लेकिन उस रात जब एक ढिबरी की कमजोर रोशनी में वह हमारे लिए कपड़े सिल रही थी, मैं दिन में सुनी कहानियां उसे सुनाने से खुद को रोक न पाया। शुरू में उसने मेरी बातों को ध्यान से नहीं सुना। लेकिन जैसे-जैसे मैंने कहानी आगे बढ़ाई, वह उसकी ओर खिंचती चली गई। उसके बाद, जिस दिन हाट लगता था, मां मुझे कोई काम नहीं देती थी।
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एक तरह से यह एक अघोषित अनुमति थी कि मैं बाजार जाऊं और नई कहानियां सुनकर आऊं। मां की इस दयालुता की कद्र करने और अपनी स्मृति का प्रदर्शन करने के लिए, मैं लौटकर मां को वे सारी कहानियां सुनाया करता था। पर आप बहुत लंबे समय तक दूसरों की कहानियां सुना-सुनाकर संतुष्ट नहीं हो सकते, इसलिए मैंने अपनी कहानियां बुननी शुरू कर दीं।
चीन के नोबेलजयी उपन्यासकार