फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Literature ›   Reader views Your thoughts are made of your surroundings

चिट्ठियां: अपने विचार से ही बनता है अपना परिवेश

Sun, 24 Dec 2017 04:14 PM IST
अभियान डेस्क/ अमर उजाला
अभियान डेस्क/ अमर उजाला Updated Sun, 24 Dec 2017 04:14 PM IST
विज्ञापन
Reader views Your thoughts are made of your surroundings

चिट्ठी 1: अंधविश्वास या कुरीति को समझना होगा

विज्ञापन


गंगा में किए जाने वाले अस्थि विसर्जन और साधू-संतों की जल समाधि को, अंध-विश्वास व कुरीति का रूप बताने वाला गंगा संरक्षण राज्यमंत्री डॉ. सत्यपाल का यह बयान सैद्धांतिक रूप से गलत है या नहीं, इस पर सोच-विचार करने की जरूरत है। भले ही यह बयान गंगा स्वच्छता के संदर्भ में दिया गया हो, लेकिन इससे करोड़ों हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है और किसी की आस्था को ठेस पहुंचे, इससे पहले उस पर अगर सोच-विचार कर लिया जाए तो ज्यादा ठीक रहता है।

मान्यता है कि मां गंगा को राजा दशरथ अपने 60 हजार पुरखों की आत्मा की शांति व उनकी अस्थि प्रवाह के लिए कठोर तपस्या कर स्वर्ग से इस धरती पर लेकर आए थे। इसी तरह अपने पुरखों की आत्मा की शांति व उनकी अस्थि प्रवाह के लिए रोज हजारों हिंदू गंगा माता के पास पहुंचते हैं। गंगा अब पहले जैसी साफ स्वच्छ नदी नहीं रही। इसका एक कारण तो औद्योगिक क्षेत्रों से आने वाला प्रदूषित जल है और दूसरा इस तरह के क्रियाकर्मों से होने वाला जल प्रदूषण है। जिस कारण गंगा दिनों दिन प्रदूषित होती जा रही है।
विज्ञापन


गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए तमाम सरकारों द्वारा प्रयास किए गए हैं, लेकिन उनके नतीजे सबको पता है। 2014 में भाजपा सरकार ने भी गंगा नदी को साफ-स्वच्छ रखने के लिए अपने ड्रीम प्रोजेक्ट 'नमामि गंगे' की शुरुआत की थी, लेकिन उसके अभी तक उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं देखे गए हैं। गौरतलब है कि मोदी सरकार ने नदियों खासकर गंगा को स्वच्छ व साफ रखने के लिए जिस 'नमामि गंगे' मिशन के तहत 2137 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, उनमें से अब तक सफाई के नाम पर मात्र 170 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए हैं। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट हाल ही में अपनी नाराजगी भी जाहिर कर चुका है। इसका एक कारण सरकार की पहल में लोगों का साथ नहीं होना है।
विज्ञापन
विज्ञापन


यही कारण है कि सरकार की इस तरह की योजनाएं सफलता प्राप्त नहीं कर पातीं। अब राज्यमंत्री डॉ. सत्यपाल का बयान ठीक हो सकता है, लेकिन उन्हें यह भी देखना होगा कि इससे करोड़ों हिंदुओं की आस्था व विश्वास को ठेस न पहुंचे। सरकार को चाहिए कि वह गंगा की स्वच्छता से जुड़े समूहों, हिंदू धर्म से जुड़े लोगों से इस मसले पर बात करे, ताकि सदियों से अविरल धारा के रूप में बहती रहने वाली पावनी गंगा को इस प्रदूषण से मुक्ति मिल सके। गंगा का जल आज भी उतना ही शुद्ध, निर्मल और पवित्र होता, अगर हम समय रहते अपनी जिम्मेदारियों के प्रति थोड़ा सचेत रहते और फैक्ट्रियों से आने वाले कचरे व केमिकल्स, नालों के गंदे पानी व सीवर लाइनों से आने वाले प्रदूषित जल को गंगा में प्रवाहित होने से रोक पाते।

सरकार के साथ हमें समझना होगा कि 'नमामि गंगे' योजना को पूरी तरह क्रियान्वित किए बिना तथा वास्तविक तौर पर गंगा को दूषित करने वाले कारणों को दूर किए बिना गंगा को स्वच्छ व निर्मल नहीं किया जा सकता। इसमें देश के आम नागारिकों की जिम्मेदारी सरकार से ज्यादा बड़ी हो जाती है। हम अपनी जिम्मेदारी तो सही तरह से निभाएं।

आगरा से अनुपमा अग्रवाल

चिट्ठी 2: नोटा का बढ़ता प्रयोग कोई अच्छा संदेश नहीं

Reader views Your thoughts are made of your surroundings

गुजरात और हिमाचल के चुनाव परिणाम आ गए हैं। दोनों ही राज्यों में भाजपा ने जीत दर्ज की है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस बार के चुनाव में गुजरात के साढ़े पांच लाख मतदाताओं ने नोटा विकल्प का इस्तेमाल किया। नोटा के प्रयोग का मतलब किसी को हराना या जिताना नहीं होता, बल्कि मतदाता द्वारा अपना रोष जाहिर करने का एक तरीका होता है।

अगर यही मतदाता किसी पार्टी को वोट दे देते, तो वह 12-15 सीटें और ज्यादा जीत सकती थीं। गुजरात का चुनाव कहने को तो भले ही विकास के मुद्दे पर लड़ा गया हो, लेकिन प्रचार के अंतिम दौर में भाषा का स्तर जितना नीचे गिर गया था, वह हम सभी जानते हैं।

नोटा का बटन दबाने वालों की इतनी ज्यादा संख्या पहली बार देखी गई। विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने वाली तमाम पार्टियों को सोचना होगा कि उनका विकास इन वोटरों तक क्यों नहीं पहुंच पाया या असल में राजनैतिक दलों का मुद्दा विकास की आड़ में कुछ और ही था।

आने वाले समय में कई और राज्यों के चुनाव होने वाले हैं, तो देखना दिलचस्प रहेगा कि राजनैतिक दलों ने गुजरात से कुछ सीखा या नहीं? अगर नहीं तो लोकतंत्र में लाखों की संख्या में फिर से नोटा दबाना अच्छा संकेत नहीं कहा जा सकता।

सीतापुर से तान्या चौहान

चिट्ठी 3: देश को सुविधा संपन्न बनाएं

Reader views Your thoughts are made of your surroundings

आजकल हमारे देश की सरकारें स्वयं को लकीर का फकीर मानने लगी हैं और हम भी अंधभक्ति में उनसे नहीं पूछते कि क्या सही है और क्या गलत? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप ग्लोबल एंटरप्रेन्योरशिप समिट में शिरकत करने भारत आईं, तो उनको तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चद्रंशेखर राव ने 40 लाख की एक गोलाभामा साड़ी भेंट की।

हम क्यों हमेशा विदेशों की सहायता के लिए लालायित रहते हैं। क्या इस तरह से हम अपना पैसा बर्बाद नहीं कर होेते हैं। अगर यही पैसे हम अपने देश की अन्य जरूरी चीजों को पाने में खर्च करें तो ज्यादा अच्छा होगा। लेकिन हम ऐसा नहीं करते। चीन का ही उदाहरण लें तो वो ज्यादातर तकनीक खुद ही विकसित करता है। हम उद्यमिता को तो विकसित करना चाहते हैं, परंतु शिक्षा व्यवस्था की तरफ ध्यान ही नहीं देते।

सरकारी कार्यालयों और कॉलेजों पर ही लाखों रुपयों का बकाया है और उसकी भरपाई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सरकार को ही करनी पड़ती है। इसलिए बढ़ी हुई दरों का असर सीधा गरीबों पर ही पड़ता है। आखिर कब हम सरकारों से पूछना शुरू करेंगे कि इस तरह के कार्य बिना विमर्श के क्यों किए जाते हैं? मैं विदेशों से मित्रवत संबंध बनाने का विरोध नहीं करता, परंतु हमें खुद अपने आप से पूछना चाहिए कि हाथ फैलाने की जगह हम स्वयं को ताकतवर क्यों नहीं बनाते?

रोहतक से रोहित यादव

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed