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प्रकृति के बीच घूमते हुए मुझे कविता की प्रेरणा मिलती है
Fri, 17 May 2019 02:13 PM IST
शरद मिश्र
बेजान मातुर
बेजान मातुर
Published by: शरद मिश्र
Updated Fri, 17 May 2019 02:13 PM IST
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प्रकृति
- फोटो : file photo
मेरा जन्म मारास में हुआ, जो भूमध्य सागर के किनारे स्थित है। मैं खुद को भूमध्य कुर्द कहना पसंद करती हूं। मेरे पिता किसान हैं। कपास के खेतों और बर्फीले पहाड़ों के बीच मैं बड़ी हुई। अपने लंबे अलेप्पो प्रवास के दौरान मैंने युद्ध पूर्व सीरिया के बारे में एक किताब लिखी, जो एक बहुत ही रोचक काव्य संस्मरण है और उसमें यहां-वहां की कहानियां हैं। समय चूंकि बीतता जा रहा है, इसलिए मैं एक कुर्दिश महिला की काव्यात्मक जीवनी वाली किताब को पहले पूरा करना चाहती हूं।
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यह एक ऐसी कुर्दिश महिला की कहानी है, जो बीसवीं शताब्दी में इटली, पेरिस, स्टॉकहोम और न्यूयॉर्क में मंचों पर नृत्य करती थी। लिखने की प्रेरणा मिलने का कोई निश्चित समय और स्थान नहीं है। लिखने की प्रेरणा मुझे कहीं भी और कभी भी मिल सकती है। ज्यादातर जब मैं प्रकृति के बीच घूम रही होती हूं, तो अंदर से एक आवाज आती हैं और चूंकि मैं हमेशा कागज-कलम साथ में रखती हूं, इसलिए उसे तुरंत लिख लेती हूं।
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हालांकि उसे संपादित करने के लिए बैठने में कुछेक वर्ष लग जाते हैं। कभी-कभी मैं कविता के असली सार तक पहुंचने के लिए महीनों तक उसे संपादित करती रहती हूं। मैं अपनी कविता पर मूर्तिकला की तरह काम करती हूं। आम तौर पर मैं एक बार लिखी गई कविता में कोई पंक्ति या शब्द नहीं जोड़ती हूं। इसके बजाय मैं अनावश्यक हिस्सों को तराशने का काम करती हूं।
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मैं एक साथ कई किताबें पढ़ती हूं। निश्चित रूप से मेरी कविताएं मेरे अंतर्मन की अभिव्यक्ति हैं, जिसका संबंध मेसोपोटामिया से है। अपनी कविता के माध्यम से मैं इस भूगोल के लौकिक प्रतिबिंब को बाहर लाने की कोशिश करती हूं। इस तरह से मैं लोगों की त्रासदियों को सामने लाने और मानव अस्तित्व को समझने की कोशिश करती हूं। - तुर्की की मशहूर कवयित्री