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'दुनिया से अच्छी कोई कला नहीं, जो हमें सौंपी गई है'

मार्क हल्प्रिन Updated Wed, 17 Jan 2018 01:33 PM IST
Mark Halperin
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जब मैं बच्चा था, तो मुझे अपने बारे में बातें करने से रोकना असंभव था। लेकिन अब मेरे लिए ऐसा करना मुश्किल है। किशोरावस्था में मेरी स्मृति विलक्षण थी और सामाजिकता का भय था। मेरा जन्म समय से दो महीने पहले ही हो गया था और मेरी रीढ़ की हड्डी और फेफड़ों में विकृति थी।
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इस वजह से कई हफ्तों तक मैं इनक्यूबेटर में रहा और फिर क्षतिग्रस्त सामान की तरह घर आया। इसके चलते मैं अमेरिकी सेना में भर्ती नहीं हो सकता था। अपने प्रारंभिक जीवन में मैं लंबे अर्से तक श्वसन रोग से पीड़ित रहा, और स्कूल नहीं जा पाया। एक बार तो मुझे साल भर तक बुखार होता रहा। विभिन्न कारणों से मैं पारंपरिक तरीके से सामाजिक नहीं बन पाया। न ही मैं कभी संभ्रांत लोगों के स्कूल में गया। हमेशा मैं समझौते करने के लिए मजबूर रहा।

लेखकों का पेशा ऐसा ही होता है। वैसे भी किसी को झुंड का सदस्य बनने के लिए कुछ सीखना नहीं पड़ता है। जब मैंने साहित्य के क्षेत्र में प्रवेश किया, तो उस वक्त व्यक्तिवाद प्रमुख रूढ़ि था। यह तब सामूहिकता के विचार से प्रतिस्पर्धा के लिए बाध्य था। अब सामूहिकता का विचार रूढ़िवाद है।

कला जगत में आमतौर पर उदारवादियों का वर्चस्व रहा है, क्योंकि अगर आप मुख्य रूप से पेंटिंग या मूर्तिकला से जुड़े हैं, तो आपको पढ़ने का मौका नहीं मिलता कि दुनिया कैसे काम कर रही है। और यदि आपके पास अर्थशास्त्र, रणनीति, इतिहास और राजनीति की समझ नहीं होगी, तो स्वाभाविक रूप से आप उदारवादी होंगे। मैं कला को प्यार करता हूं। दुनिया से अच्छी कोई कला नहीं, जो हमें सौंपी गई है।

 -अमेरिकी उपन्यासकार एवं पत्रकार
 

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