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'नाना और पिता के प्रभाव ने मुझे साहित्यकार बनाया'

Sat, 24 Feb 2018 03:09 PM IST
दिलीप चित्रे
दिलीप चित्रे Updated Sat, 24 Feb 2018 03:09 PM IST
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Marathi Popular poet dilip chitre
फाइल फोटो
मैं वड़ोदरा में पैदा हुआ। मेरे पिता वहां अभिरुचि नाम की एक मराठी पत्रिका निकालते थे। इस तरह साहित्य के प्रति मेरी रुचि बचपन में ही विकसित हो गई थी। पश्चिम के साहित्य से हम इतने अधिक प्रभावित हुए कि हमने सोच लिया कि साहित्य की शुरुआत वहीं हुई और हम उसी की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
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यह सच नहीं है। दरअसल पश्चिम हमारी साहित्यिक संपदा से अनजान था। उन्होंने तो मराठी को हिंदी की एक बोली बता दिया! अपनी अज्ञानता का परिचय वे एक ऐसी भाषा के बारे में दे रहे थे, जो पिछले सात सौ साल से अस्तित्व में है। इसे मैंने एक चुनौती की तरह लिया।
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मैंने तुकाराम को अपना आदर्श माना। तीन दशक से अधिक समय तक तुकाराम की रचनाओं का अनुवाद करते हुए मैं उन समस्याओं से रू-ब-रू हो पाया, जिनका सामना सत्ता और भीड़ से दूर रहने वाले लोग करते हैं। दरअसल मेरे नाना तुकाराम की कविताओं के विशेषज्ञ थे। उन्हीं का प्रभाव मुझ पर पड़ा। मेरे लिए साहित्य सिर्फ बैठकर लिखना नहीं है।
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मैंने तरह-तरह की नौकरियां कीं। उन अनुभवों को मैंने अपने साहित्य में ढाला। इतने विराट जीवन अनुभवों के कारण ही मैं साहित्य तक सीमित नहीं रहा और पत्रकारिता से लेकर पेंटिंग और फिल्म बनाने तक कई काम किए।


रोजगार की जरूरत मुझे इथियोपिया तक भी ले गई। लेकिन मैं इससे इन्कार नहीं कर सकता कि अगर बचपन में मुझे अपने साहित्य प्रेमी पिता और नाना का साहचर्य नहीं मिलता, तो शायद मैं साहित्य और कला के क्षेत्र में नहीं आता।

-मराठी के चर्चित कवि, आलोचक और फिल्मकार
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