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मंजिलें और भी हैं: अपने पैसे से खरीदी मरीजों के लिए लेप्रोस्कोपिक मशीन

Sun, 21 Jul 2019 09:02 PM IST
गौरव द्विवेदी डॉ. उदय भानु राणा
डॉ. उदय भानु राणा Published by: गौरव द्विवेदी Updated Sun, 21 Jul 2019 09:02 PM IST
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Manzilen aur bhi hain: Purchased Laparoscopic machine for patients by himself
डॉ. उदय भानु राणा (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

मैं हिमाचल प्रदेश में मंडी जिले का रहने वाला हूं। अभी मैं मंडी के ही जोनल हॉस्पिटल में बतौर गायनोकोलॉजिस्ट (स्त्री रोग विशेषज्ञ) कार्यरत हूं। मेरे माता-पिता मुझे डॉक्टर बनाने का सपना पाले हुए थे, जिसे मैंने साकार किया। शुरू से ही मेरा उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाकर लोगों की सेवा करना रहा है। निजी क्षेत्र में जहां बिजनेस को प्राथमिकता दी जाती है, वहीं मैं सार्वजनिक क्षेत्र में बिना किसी दबाव के अपने पेशे के माध्यम से आमजन को सुविधाएं उपलब्ध करवा रहा हूं। मुझे सर्जरी करने में दिलचस्पी है, मेरी कोशिश रहती है कि कम से कम खर्च में मरीज को बेहतर इलाज दे सकूं। साथ ही महिला मरीजों को सर्जरी के बाद बहुत कमजोरी न हो। लेकिन ऐसी सर्जरी करने के लिए आपको बहुत ही धैर्य और अनुभव की जरूरत होती है। सर्जरी करने के दो तरीके होते हैं- एक ओपन सर्जरी, जिसमें पेट में चीरा लगाकर, परत दर परत इसे खोलते हैं और फिर इलाज की प्रक्रिया करते हैं। जबकि लेप्रोस्कोपिक सर्जरी में, पेट में सिर्फ 1 सेमी और 0.5 सेमी के 2-3 छेद करते हैं। इन छिद्रों के माध्यम से इलाज किया जा सकता है। इसमें पेट में चीरा लगाने की जरूरत नहीं होती है। लेप्रोस्कोपिक सर्जरी में मरीज का बहुत ज्यादा खून भी नहीं निकलता है। साथ ही इस सर्जरी में समय भी कम लगता है। जब चीरा लगाकर सर्जरी करते हैं, तो मरीज को 7-10 दिनों के लिए अस्पताल में रहना पड़ता है, लेकिन लेप्रोस्कोपिक सर्जरी के 24 घंटे के बाद मरीज को छुट्टी दी जा सकती है। इस प्रक्रिया में दर्द भी बहुत कम होता है, और घाव भी जल्दी भर जाते है। मरीज एक या दो सप्ताह में ही अपने काम पर वापस जा सकता है। मैंने अक्सर यहां चीरा लगाने वाली सर्जरी ही देखी, पूछने पर पता चला कि केवल इस अस्पताल में ही नहीं, बल्कि राज्य के जाने-माने अस्पताल जैसे आईजीएमसी, शिमला और डॉ. राजेंद्र प्रसाद गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में भी लेप्रोस्कोपिक मशीन उपलब्ध नहीं है। तो पहले मैंने सोचा कि, सरकारी खर्चे पर यह मशीन मंगाई जाए। लेकिन पता चला कि इस पूरी प्रक्रिया में एक वर्ष से भी ज्यादा समय लग सकता है। मैंने लेप्रोस्कोपिक सर्जरी में अपनी फेलोशिप पूरी की थी। अगर ज्यादा दिनों तक इस तकनीक पर काम न करता, तो मेरे अनुभव व प्रशिक्षण पर असर पड़ता। इसलिए मैंने अपने माता -पिता से बात की और लेप्रोस्कोपिक मशीन अपने खर्चे पर मंगवाने का फैसला किया। इसकी कीमत लगभग 10 लाख रुपये है। मशीन के आने के बाद मरीजों को बेहतर सुविधा मिली है। निजी अस्पताल में इस तकनीक से सर्जरी का खर्च करीब दो लाख रुपये तक रहता है, लेकिन यहां पर मैं और मेरे साथी डॉ. संदीप राठौर, जरूरतमंदों के लिए यह सुविधा मुफ्त में पहुंचाते हैं। मुझे इस काम से सुकून मिलता है, शायद इसीलिए मैं इसे कर पा रहा हूं। देश में स्वास्थ्य क्षेत्र की हालत बहुत खराब है, अस्पताल ढांचागत संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। इसलिए अक्सर डॉक्टर चाहते हुए भी अपनी ड्यूटी सही तरह से नहीं कर पाते हैं। मैं दूसरों पर निर्भर हुए बगैर लोगों की सेवा के लिए हर वह कदम उठा रहा हूं, जो मेरे वश में है और जिससे आमजन को बेहतर चिकित्सा सुविधा मिल सके।

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