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मंजिलें और भी हैं: गुनेहड़ में कला सृजन बंद कमरे में नहीं होता

Sun, 14 Jul 2019 10:18 PM IST
फ्रैंक Published by: गौरव द्विवेदी Updated Sun, 14 Jul 2019 10:18 PM IST
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Manzilen aur bhi hain: Love of nature and folk art, I decided to settle in Himachal Pradesh
फ्रैंक (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया

गुनेहड़ (हिमाचल) पैराग्लाइडिंग के लिए मशहूर बीड़-बिलिंग के पड़ोस में बसा हुआ है। बावजूद इसके यह वर्षों तक गुमनामी में रहा, लेकिन कला के उभार व कलाकारों के प्रभाव ने इसे फिर से मानचित्र पर स्थान दिला दिया है। मैं जर्मन मूल का हूं। प्रकृति और लोककलाओं से प्रेम के चलते मैंने 2008 में हिमाचल के गुनेहड़ में बसने का फैसला किया। मैं यहां एक आर्ट रेजीडेंसी खोलना चाहता था, जिसका मकसद यहां की कला को सामने लाना था। लेकिन इसके लिए जब कोई सरकारी या निजी सहयोग नहीं मिला, तो मैंने अपने खर्च पर इसे अंजाम देने के लिए एक छोटा-सा बुटिक रेस्तरां कम आर्ट गैलरी खोला। रेस्तरां में आने वाले सैलानियों को पिज्जा, पास्ता बनाकर खिलाते-खिलाते मैंने गांव में एक आर्ट रेजीडेंसी शुरू की। यहां देश भर से हर साल करीब 12-13 कलाकार आते हैं, रहते हैं, और सिर्फ कलाकर्म में जुटे रहते हैं। शर्त बस इतनी होती है कि उन्हें रेजीडेंसी के लिए तयशुदा थीम पर अपना आर्ट कन्सेप्ट तैयार करना होता है और चुने जाने पर यहीं गांव में, गांव वालों के बीच रहकर उसे आकार देना होता है। यहां कला सृजन किसी स्टूडियो या बंद कमरे में गुपचुप तरीके से नहीं होता, बल्कि गुनेहड़ के किसी आंगन में, पगडंडी पर, सड़क किनारे, किसी पुरानी दुकान को अस्थायी स्टूडियो का रूप देकर, किसी घर की छत पर, तो कभी खुले में, धौलाधार की निगहबानी में होती है। अपने कैफे में आर्ट गैलरी चलाते हुए मुझे ख्याल आया था कि क्यों न शहरों की आपाधापी से दूर यहां समकालीन कला प्रदर्शित की जाए और जब मैंने समकालीन भारतीय कलाकारों को तलाशने के लिए गूगल पर उंगलियां चलाईं, तो यह देखकर हैरान रह गया कि वहां किसी आधुनिक आर्टिस्ट का नाम सामने नहीं आता था। तभी मैंने ठान लिया था कि आधुनिक, उदीयमान, नवोदित कलाकारों के साथ मिलकर समकालीन भारतीय कला को आगे बढ़ाना है। और अब मुझे तसल्ली है कि पूरी तरह न सही, पर कुछ हद तक स्थितियां बदल रही हैं। हमारे मेले के स्वरूप ने ग्रामीण जीवन में रंग तो भरे हैं, मगर उनके मूल रंगों को चुराया नहीं हैं। हमारे आर्टिस्ट उनके घरों में, उनके साथ रहते हैं और मेरे रेस्तरां में खाते-पीते हैं। आर्ट और सस्टेनेबल पर्यटन की इस जुगलबंदी को सहेजना ही हमारा प्रमुख मकसद है। जब यहां आर्ट फेस्टिवल शुरू हुआ, तो पहले सीजन में कुल 12 आर्टिस्ट गुनेहड़ पहुंचे थे। हम स्टूडियो और प्रदर्शनी लायक जगह की तलाश में गांव भर में घूमे और खाली पड़े कमरों, बंद दुकानों, बेकार कोनों को गांव वालों से मांग लिया। किसी ने भी इनके बदले हमसे पैसा नहीं मांगा। फिर जब कलाकार जुटे, तो गांव वाले भी उनके साथ आ जुड़े। कोई पॉटरी के लिए मिट्टी गूंथता, तो कोई वॉल आर्ट के लिए दीवार साफ करवाता। इस तरह, हम इस फेस्टिवल को शहरी आर्ट गैलरियों से निकालकर देहात की मिट्टी से जोड़ने में कामयाब हुए। एक महीने बाद जब कला और कलाकारों का यह जमावड़ा गुनेहड़ से उठा, तो इस गुमनाम गांव को देखकर 6000 सैलानी लौट चुके थे, जिनमें कलाकार, पत्रकार, लेखक, पेंटर, कथाकार आदि शामिल थे। रूस की वेब डिजाइनर सेनियो बोसाक ने गुनेहड़ को वर्चुअल विलेज के रूप में दुनिया के सामने पेश किया, ताकि कोई भी, कहीं से भी इसे देख-समझ सके। इस काम को मैं एक जुनून के साथ कर रहा हूं, आगे भी करता रहूंगा।

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-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित

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