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मंजिलें और भी हैं: बोली सीखकर आदिवासी बच्चों को शिक्षा से जोड़ा

Wed, 22 May 2019 06:30 AM IST
गौरव द्विवेदी पी के मुरलीधरन
पी के मुरलीधरन Published by: गौरव द्विवेदी Updated Wed, 22 May 2019 06:30 AM IST
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manzilein aur bhi hain: Child education by local language
पी के मुरलीधरन (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया

वर्ष 1999 में 29 वर्ष की उम्र में जब मैंने केरल के इडुक्की जिले की एक आदिवासी बस्ती नेमानल्कुडी के लिए रवाना हुआ, तो मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि मेरी जिंदगी बदल जाएगी। मैं केरल के जिला प्राथमिक शिक्षा परियोजना (डीपीईपी) का स्वयंसेवक था, जिसका उद्देश्य राज्य भर के दूरस्थ जनजातीय इलाकों में मल्टी-ग्रेड लर्निंग सेंटर (एमजीएलसी) स्थापित करना था और उन्हें एकल-शिक्षक स्कूलों के रूप में चलाना था। यह आदिवासियों की 28 बस्तियों (जो पूरे वन क्षेत्र में बिखरी हुई थी) के बच्चों की शिक्षा जरूरतों को पूरा करने वाला था। उस समय, एकमात्र आदिवासी निम्न प्राथमिक स्कूल एडामालक्कुडी में था। नेमानल्कुडी में पांच से पंद्रह वर्ष की उम्र के 35 बच्चे थे, जिन्हें स्कूली शिक्षा का कोई अनुभव नहीं था। वहां कोई आधारभूत संरचना नहीं थी, बस एक छोटा-सा शेड था, जिसमें पहले अन्न रखा जाता था। स्कूल भवन का न होना ही एकमात्र समस्या नहीं थी, बल्कि शिक्षा सामग्री का भी अभाव था। शिक्षा विभाग ने एक ब्लैकबोर्ड के अलावा बच्चों के लिए न तो कॉपियां दीं और न ही स्लेट। बच्चों के पास पहने हुए कपड़ों के अलावा कोई कपड़ा भी नहीं था। स्वच्छता की कमी थी। मुथवन समुदाय के बच्चे शुरू से ही जंगल में घूमने-फिरने के अभ्यस्त होते हैं, इसलिए वे बंद कमरे में बैठना नहीं चाहते थे। वे जो बोली बोलते थे, मैंने पहले कभी वह बोली सुनी नहीं थी। वहां मात्र कुछ वयस्क पुरुष मलयालम समझ सकते थे। शुरू में उन्हें मलयालम सिखाने के बजाय मैं उन्हें स्वच्छता और स्वस्थ जीवन शैली का पाठ पढ़ाने लगा। इसी तरह शुरुआती कुछ महीने बीते। धीरे-धीरे मैं उनकी बोली समझने लगा और बच्चों को मलयालम से परिचित कराने लगा। शुरू में मैंने उन्हें गीत-गाने सिखाए और उनके साथ स्वयं भी गाता था। जब मैं सकारात्मक बदलाव की उम्मीद करने लगा, तो अचानक पाया कि स्कूल आने वाले बच्चों की संख्या घटते-घटते तीन रह गई है। तीन दिनों की जांच के बाद बता चला कि पूरा समुदाय वजाकुथु नामक एक उरू (आदिवासी बस्ती) में चला गया है, जहां इलायची की खेती चल रही थी। यह जानकर कि वजाकुथु उनकी आजीविका के लिए बेहतर क्षेत्र था, मैंने वहीं रुककर अपनी भूमिका निभाने का फैसला किया और 55 बच्चों को पढ़ाने लगा। एक छोटे से घर में कक्षाएं आयोजित होने लगीं। उनकी जरूरतों के हिसाब से मैंने अपनी शिक्षण शैली में जरूरी बदलाव किया। जैसे वे बंद कमरे के बजाय खुले में पढ़ना चाहते थे, तो मैं खुले में ही उन्हें पढ़ाता था। मैंने अपनी जेब से पैसे खर्च कर बच्चों को शिक्षण सामग्री दी। धीरे-धीरे मैंने बच्चों को लिखना भी सिखाया और खुद तीन साल बीतते-बीतते मुथवन बोली सीख गया। इससे मुझे महिलाओं से बातचीत करने में मदद मिली। मैं उन्हें शिक्षा के महत्व के बारे में बताता था। वर्ष 2011 में मैंने वयस्क साक्षरता अभियान चलाया और वयस्कों को पढ़ना-लिखना सिखाने लगा। उनके बीच रहते हुए मैंने दो किताबें भी लिखीं, जिनमे मुथवन का इतिहास दर्ज है। 2017 में, मैंने और अन्य शिक्षकों ने मिलकर एससीईआरटी (केरल) के समर्थन से एडामालक्कुडी में पांच एकल शिक्षक स्कूलों का एक समूह बनाया और चार शिक्षक मिलकर बच्चों को पढ़ाने लगे। बाद में स्थानीय निकाय ने स्कूल को अपग्रेड करने के लिए धन भी आवंटित किया। उन पैसों से हमने बच्चों के लिए कुर्सी, डेस्क, कंप्यूटर, प्रोजेक्टर और अन्य जरूरी सामान खरीदे। स्कूल में आज पुस्तकालय भी है।

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