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मंजिलें और भी हैं : आयरलैंड से आकर बावड़ियां साफ करने में जुटा

Mon, 20 May 2019 10:28 PM IST
अमर शर्मा कैरॉन रॉनस्ले
कैरॉन रॉनस्ले Published by: अमर शर्मा Updated Mon, 20 May 2019 10:28 PM IST
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manzilein aur bhi hain Caron Ronsley Came from Ireland and cleaned rajasthan bawari
कैरॉन रॉनस्ले - फोटो : Amar Ujala
मैं आयरिश हूं और फ्रांस में पैदा हुआ हूं। लेकिन मैं भारत से बहुत प्यार करता हूं। मेरे दादा भारत में चीफ रेलवे इंजीनियर थे। मुंबई-वड़ोदरा (बंबई-बड़ौदा) रेलमार्ग के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा भारत में बिताया। वह भारतीय जीवन शैली के बड़े प्रशंसक थे। नौकरी से रिटायर होने के बाद वह इंग्लैंड लौट गए। वह हमें भारत के बारे में बताते रहते थे, जिसका असर मुझ पर पड़ा और मुझमें भारत को नजदीक से जानने की इच्छा प्रबल होती गई। 
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हालांकि भारत आने से पहले मैंने पाकिस्तान में 20 साल बिताए। वहां मैंने कराची के एक बधिर स्कूल तथा प्रसिद्ध कराची ग्रामर स्कूल में पढ़ाया। स्कूलों में पढ़ाने के अलावा मैंने पर्यावरण संरक्षण से जुड़े काम भी किए। सिंध के कुछ स्कूलों में भी मैंने अध्यापन का काम किया। पढ़ाने के काम से ऊब जाने के बाद मैं थार मरुस्थल के उमरकोट शहर में चला गया, जहां हिंदुओं की भी बड़ी आबादी है। पर पाकिस्तान का मेरा अनुभव अच्छा नहीं था। लोग तो मुझसे नाराज रहते ही थे, ब्रिटिश उच्चायोग तक ने मेरा सहयोग नहीं किया। 
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वर्ष 2014 में मैं भारत आ गया। शुरुआती कुछ वक्त मैंने इस देश को देखने में बिताया। उसके बाद मैं पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने के अवसर ढूंढने लगा। आखिरकार मैं राजस्थान में जैसलमेर के एक गांव हाडा में रहने लगा। वहां मैंने स्थानीय लोगों की सहायता से एक बगीचा बनवाया, जिसमें करीब एक हजार पेड़ लगवाए। वहां से मैं जोधपुर चला गया। जोधपुर में बावड़ियों ने मेरा मन मोह लिया। मैंने पढ़ा था कि भारत में कई जगह पीने का पानी इकट्ठा करने के लिए बावड़ियां बनाई गई थीं। बावड़ियों की खूबसूरती देखकर मुझे अपने दादा की याद आई, जो भारतीय संस्कृति की तारीफ किया करते थे। लेकिन बावड़ियों की हालत देखकर मेरा मन दुखी हो गया। मैंने स्थानीय प्रशासन से लेकर एनजीओ तक से बावड़ियों की साफ-सफाई में मेरी मदद करने के लिए कहा। लेकिन किसी ने मेरी बात नहीं सुनी। 
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ऐसे मे, मैंने कुछ लोगों की मदद ली और बावड़ियों की सफाई में जुट गया। ये बावड़ियां अब शराबियों, जुआरियों के अड्डों में बदल गई थीं, जहां शराब की खाली बोतलें, बीड़ी-सिगरेट के टुकड़े और गंदगी भरी रहती थी। हालांकि सत्तर साल की उम्र में मेरे लिए एक जगह पर लंबे समय तक बैठना कठिन है, इसके बावजूद मैं छह घंटे तक अपने स्वयंसेवकों के साथ बावड़ियों की सफाई में लगा रहता था। 

इस बीच मुझे मेहरानगढ़ फोर्ट ट्रस्ट से मदद मिली। उसने हमें बावड़ियों से पानी निकालने के लिए पंप तो दिए ही, वित्तीय मदद दी और साथ में पांच से दस स्वयंसेवक भी दिए। हर तीन से चार महीने में एक बार ट्रस्ट की ओर से दो सौ स्वयंसेवक भेजे जाते थे, तो बावड़ियों में इकट्ठा कूड़ा निकालने का काम करते थे। एक साथ इतने लोगों को देखकर स्थानीय लोग भी काम में हाथ बंटाने आ जाते थे। 


इससे स्थानीय लोगों में यह भावना पैदा हुई कि एक विदेशी बुजुर्ग उनके आसपास की गंदगी साफ करने आया है। जो लोग कभी मुझे पागल साहब कहकर चिढ़ाते थे, वे आज मेरा सम्मान करते हैं। मेरे लिए संतोष की बात यह है कि स्थानीय लोगों, छात्रों और युवाओं में यह सोच बन रही है कि केवल जल संकट से निपटने के लिए ही नहीं, पर्यावरण संरक्षण के लिए भी बावड़ियों को बचाया जाना चाहिए। 
- विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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