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मंजिलें और भी हैं : घायलों का उपचार करने के लिए चलाता हूं ऑटो एंबुलेंस

Wed, 31 Jul 2019 01:22 AM IST
हरजिंदर सिंह हरजिंदर सिंह
हरजिंदर सिंह Published by: हरजिंदर सिंह Updated Wed, 31 Jul 2019 01:22 AM IST
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manzilein aur bhi hain : Auto ambulance runs to treat the injured
हरजिंदर सिंह - फोटो : अमर उजाला
यों तो मेरा जन्म पाकिस्तान के शेखूपुरा में हुआ, पर अभी मैं पुरानी दिल्ली में रहता हूं। मैं पांच वर्ष का था, जब देश का बंटवारा हुआ। बंटवारे के बाद मेरे माता-पिता अमृतसर आकर बस गए। अपनी प्रारंभिक पढ़ाई मैंने अमृतसर से पूरी की। इस बीच मेरी मां का देहांत हो गया। मैंने स्नातक की पढ़ाई पंजाब विश्वविद्यालय से की। इसके बाद दिल्ली के एक सरकारी दफ्तर में नौकरी करने लगा। यहां मैं अपने नाना-नानी के साथ रहता था।
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मेरे बड़े भाई ओडिशा में रहते हैं, वह मेरी नौकरी से नाखुश थे। उन्हें लगता था कि मुझे कम पैसे मिल रहे हैं, तो वह मुझे स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति दिलवाकर ओडिशा लेकर गए। वहां मैं कुछ दिन उनके साथ रहा, इसके बाद मेरा स्वास्थ्य खराब रहने लगा तो दोबारा मैं दिल्ली लौट आया। दिल्ली आकर मैंने ऑटो रिक्शा चलाना शुरू किया। 
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मैंने दिल्ली ट्रैफिक पुलिस और आम जनता के बीच एक सेतु का काम किया। तब से मुझे ड्राइविंग करते हुए 55 वर्ष से अधिक समय हो गया है, लेकिन एक बार भी मेरा चालान नहीं काटा गया, न कभी ट्रैफिक पुलिस के द्वारा रोका गया। मैं दिल्ली पुलिस के लिए एक ट्रैफिक वार्डन रहा हूं और ऑटोरिक्शा यूनियन का महासचिव भी। तब एक ऑटोरिक्शा चालक के लिए ट्रैफिक वार्डन होना बड़ी बात थी। बचपन से मैंने अपने घर में सेवा-भाव की कहानियां सुनी हैं। 
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इसी का परिणाम था कि मैं हमेशा दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहता था। ऑटो एंबुलेंस का सफर वर्ष 1978 में दिल्ली में आई बाढ़ के बाद शुरू हुआ। उस समय मैंने अपने समुदाय के साथ मिलकर लोगों की सेवा की थी। लेकिन इसके बाद भी मैंने इसे जारी रखने का निर्णय लिया और मुफ्त ऑटो एम्बुलेंस सेवा शुरू की। अब मैं जब भी सड़क पर किसी घायल व्यक्ति को देखता हूं, तो उसे पास के अस्पताल पहुंचाने में लग जाता हूं, ताकि उन्हें तत्काल चिकित्सा सहायता मिल सके। 
 

यह ऑटो रिक्शा भले छोटा हो, बड़ी एंबुलेंस की तरह रफ्तार नहीं पकड़ता, लेकिन सड़क दुर्घटना के घायलों को प्राथमिक उचार देना और उनको अस्पताल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी बाखूबी निभाता हूं। सुबह जब घर से निकलता हूं, तो पहले ऑटो रिक्शा में मौजूद फर्स्ट-एड किट को पूरी तरह देख लेता हूं। जिसमें बैंडेज, एंटीसेप्टिक लोशन, बर्न के लिए क्रीम आदि दवाइयां शामिल होती है। अगर इनमें से कोई भी सामान कम या खत्म होती है, तो उसे खरीदकर फर्स्ट-एड किट को पूरा कर ही ड्राइव पर निकलता हूं। 

ऑटो एंबुलेंस में चिकित्सा से संबंधित सभी जरूरी साधन उपलब्ध है, जिससे किसी भी घायल का प्राथमिक उपचार किया जा सकता है। इसके अलावा डायबीटिज पीड़ितों को भी देशी नुस्खे से तैयार दवाई मुफ्त में देता हूं। बीते सालों में मैंने सैकड़ों घायलों को अस्पताल पहुंचाया है। कई लोग उपचार होने के बाद जब ठीक हुए हैं, तो फोन पर मुझसे बात भी की है। मैं हर जगह नहीं पहुंच सकता, लेकिन जितना संभव हो सकता है, उतनी मदद करने की कोशिश करता हूं। 

मेरे लिए एक नायक वह है जो नेक कार्य करता है, बहादुरी का काम करता है और मानवता की उत्कृष्ट सेवा करता है। मेरी उम्र को देखते हुए परिवार वाले मुझसे घर पर रहकर आराम करने को कहते हैं। पर मैं यह काम जीवनपर्यंत करना चाहता हूं। 

मैं जितना अधिक काम करता हूं, मुझे उतनी ही अधिक खुशी होती है। मेरा यही कहना है, अब तो सुप्रीम कोर्ट ने आदेश भी दिया है कि सड़क दुर्घटना में घायल हुए व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने वाले को पूछताछ के नाम पर परेशान न किया जाए। ऐसे में सभी लोग सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति को तुरंत चिकित्सकीय सहायता दें, ताकि जिंदगी बचाई जा सके।
 
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