सॉफ्टवेयर डेवलपर की नौकरी छोड़ खेती से जुड़ी
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तब मैं महज छह साल की थी और मेरा भाई मात्र साल भर का, उसी समय मेरे पिता विजय गौंड की एक दुर्घटना में पैर की हड्डी टूट गई। यह वर्ष 1998 की बात है। उन्हें सात महीने तक अस्पताल में रहना पड़ा। उस दौरान मेरी मां ने ही पिता, हम दोनों भाई-बहनों और खेती की भी जिम्मेदारी संभाली। मां उस समय मुझे भी अपने साथ खेत पर ले जाती थी। बारह वर्ष की होते-होते मैं खेती का बहुत सा काम सीख गई और अपनी मां की मदद करने लगी। मैं स्कूल जाने से पहले खेत जाती और फिर स्कूल से लौटकर भी खेत का काम करती थी। परीक्षाओं के दौरान मैं खेत पर ही पढ़ाई करती थी और खेती का काम भी निपटाती थी। धीरे-धीरे मैंने खेती की पूरी जिम्मेदारी संभाल ली, ताकि मां को कुछ आराम मिल सके।
वर्ष 2005 में हमारे दिन फिर से लौट आए, जब मेरे पिता फिर से चलने लगे और खेती में हाथ बंटाने लगे। अब मैं अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने और इंजीनियर बनने के अपने सपने को साकार करने के लिए स्वतंत्र थी। सब कुछ पहले की ही तरह हो गया। सचमुच वे हमारे जीवन के सबसे खुशनुमा दिन थे। लेकिन हमारी यह खुशी ज्यादा दिनों तक टिकी नहीं। वर्ष 2010 में हमारी अंगूर की बेल बिल्कुल तैयार थी, लेकिन अचानक बहुत तेज बेमौसम बारिश हुई। अंगूर के गुच्छों के अधिकांश फल गिर गए। बचे-खुचे फलों को बचाने के लिए मेरे पिता उर्वरक खरीदने गए। लेकिन रास्ते में वह सीढ़ियों से फिसल गए और हमेशा के लिए अपना पैर खो बैठे।
मुझे याद है, उस रात बारिश में मेरे पिता को देखने के लिए मां भागती हुई अस्पताल गई। लेकिन मेरे पिता ने खेत बचाने के लिए मां को उर्वरक के साथ वापस भेज दिया। अगले कुछ महीने तक मेरे पिता ने अस्पताल के बिस्तर पर पड़े-पड़े ही मुझे बताया कि खेत में क्या-क्या करना है, और मैं उनके कहे अनुसार काम करती गई। मैं कंप्यूटर इंजीनियर बनना चाहती थी, लेकिन खेतीकी ठीक से देखभाल करने के लिए मैंने कंप्यूटर में बीएससी करने का फैसला किया।
लोनवाड़ी एक छोटा-सा गांव है, जहां से 18 किलोमीटर दूर मुझे पिंपलगांव कॉलेज के लिए जाना पड़ता था। दो बस बदलने के बाद मुझे दो किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। मैं सुबह जल्दी उठकर खेत जाती थी, फिर कॉलेज और वहां से लौटकर फिर खेत पर जाती थी। अस्पताल में रहते ही पिता ने मुझे ट्रैक्टर चलाने की बारीकियां सिखाईं कि कहां क्लच रहता है, कब गियर बदलना है। कंप्यूटर में मास्टर डिग्री करने के बाद कैंपस सिलेक्शन के जरिये मुझे एक कंपनी में नौकरी भी मिल गई, जहां मैंने डेढ़ साल तक काम किया। फिर मैंने नौकरी छोड़ दी और खेती को ही पूरी तरह अपना लिया। खेती की आय से मैं घर भी चला रही हूं और अपने भाई को भी पढ़ा रही हूं।
हमारे यहां बिजली की बहुत समस्या होती है, इसलिए रात भर जगकर मुझे बिजली आने पर मोटर पंप चलाकर सिंचाई करनी पड़ती है। जब आप पौधों की अच्छी तरह से देखभाल करते हैं, तो वे जल्दी बड़े होते हैं और उसकी बेलें मजबूत होती हैं। मैं अवांछित शाखाओं को काट देती हूं और उन्हें अच्छा पोषण देती हूं। खाली समय में मैं शिक्षा से जुड़े रहने और कुछ अतिरिक्त आमदनी के लिए एक स्कूल में पढ़ाने लगी। वर्ष 2018 में जब मुझे कृषिथोन बेस्ट वुमन फार्मर का अवार्ड मिला, तो मेरे पिता न केवल खुश हुए, बल्कि उन्होंने मुझसे कहा कि तुम तो मुझसे भी अच्छी किसान बन गई। वे मेरी उपलब्धियों से खुश हैं और गर्व महसूस करते हैं। - विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।