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आज लोग मुझे महाराष्ट्र की मदर टेरसा कहते हैंः सिंधुताई सपकाल

Sat, 24 Sep 2016 03:06 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 24 Sep 2016 03:06 PM IST
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interview of sindhutai sapkal
sindhutai sapkal
 जिंदगी एक ऐसे बच्चे के तौर पर शुरू हुई थी, जिसकी किसी को जरूरत नहीं थी। सब मुझे 'चिंधी' कहकर बुलाते थे। आज कुछ लोग महराष्ट्र की मदर टेरेसा, तो कुछ'अनाथों की मां' कहते हैं। पर मैं सिर्फ एक मां हूं और उसी का फर्ज निभा रही हूं।
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जिंदगी ऐसे बच्चे के तौर पर शुरू हुई थी, जिसकी किसी को जरूरत नहीं थी। सब मुझे 'चिंधी' कहकर बुलाते थे। 'चिंधी' कपड़े के फटे-पुराने टुकड़े को कहते हैं। महाराष्ट्र के वर्धा जिले के 'पिंपरी मेघे' गांव में हमारा एक रूढ़िवादी परिवार था। चौथी के बाद पढ़ाई छूट गई। दस साल की उम्र में तीस साल के श्रीहरि सपकाल से शादी हो गई। पति मिला, तो गालियां देने और मारने वाला।
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जब मुखिया की शिकायत कलेक्टर से कर दी

एक बार गांववालों को उनकी मजदूरी के पैसे न देने पर गांव के मुखिया की शिकायत जिला अधिकारी से कर दी। बदला लेने के लिए मुखिया श्रीहरि को मुझे घर से निकालने के लिए भड़काने लगा। पति ने मारा-पीटा और घर से निकाल दिया। तब मुझे नौ महीने का गर्भ था। गौशाला में बच्ची को जन्म दिया। बच्चे के जन्म के समय गर्भनाल स्वयं पत्थर से तोड़ना पड़े, तो इससे बड़ा दुःख महिला की जिंदगी में भला क्या होगा? मैंने यह दुःख भोगा है।
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पहली बार भाषण दिया, तो मिले 11 रुपये

बेटी के साथ रेलवे-प्लेटफॉर्म पर भीख मांगकर गुजारा करने लगी। मैं भिखारियों को मांगकर खाना खिलाती, वे मेरी सुरक्षा करते। भीख मांगते-मांगते मैं बड़ी हो गई। इस दौरान कई बच्चे मिले, जिनका कोई नहीं था। उनमें अपना दुख नजर आया, तो उन्हें अपनाने लगी। उनके पालन लिए भी भीख मांगनी पड़ी। वर्ष 1974 में बच्चों के पालन-पोषण के लिए रेलवे स्टेशन पर भाषण दिया, तो लोग चंदा देने लगे। पहली बार 11 रुपये चंदा मिला। उस वक्‍त यह बड़ी रकम थी, जिसे पाकर हौसला बढ़ा। अब तो देश विदेश में भाषण देने के लिए बुलाया जाता है। भाषण देती हूं, तो बच्चों के लिए राशन मिलता है।
 
250 दामाद, 36 बहुएं और एक हजार नाती-पोते

अब तक 11,00 से अधिक बच्चों का पालन-पोषण कर चुकी हूं। कई बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर और वकील हैं। दो सौ से अधिक बच्चे वर्धा, अमरावती और पुणे के सन्मति बाल निकेतन में अब भी पल रहे हैं। उन्हें पढ़ाते हैं, शादी कराते हैं और जिंदगी शुरू करने में मदद करते हैं। यह अभियान महाराष्ट्र की पांच बड़ी समाजसेवी संस्थाओं में तब्दील हो चुका है। मेरे परिवार में 250 जमाई, 36 बहुएं और एक हजार से अधिक पोते-पोतियां हैं। रेलवे स्टेशन पर मिला पहला बच्चा सबसे बड़ा बेटा है। वही बाल निकेतन, महिला आश्रम, छात्रावास व वृद्धाश्रम का प्रबंधन देखता है। एक गौशाला भी है, जिसमें तीन सौ अनाथ गायों का पालन करते हैं। गाय से मुझे लगाव है, क्योंकि गौशाला में जब मैं बेहोश पड़ी थी, तो गाय ने ही मेरा ख्याल रखा था।

 
बच्चों के लिए फिर भीख मांगने से ऐतराज नहीं...


पिछले साल 'आइकोनिक मदर' का नेशनल अवार्ड राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से मिलाा। पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने भी सम्मानित किया। राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय समेत 750 अवॉर्ड मिले। मगर जरूरत पड़े, तो बच्चों के लिए फिर भीख मांगने से ऐतराज नहीं होगा। 'मी वनवासी' धारावाहिक व 'मी सिंधुताई सपकाल' फिल्म भी बन चुकी है। कुल लोग मुझे 'महराष्ट्र की मदर टेरेसा', तो कुछ 'अनाथों की मां' कहते हैं। पर मैं सिर्फ एक मां हूं और उसी का फर्ज निभा रही हूं।
 
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