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अंतर्ध्वनि : खोई हुई दुनिया का स्वप्न, कला का दुर्लभ सत्य है
Fri, 02 Aug 2019 12:17 AM IST
Avdhesh Kumar
निर्मल वर्मा
निर्मल वर्मा
Published by: Avdhesh Kumar
Updated Fri, 02 Aug 2019 12:17 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर
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जिस तरह पौधे को जमीन से उखाड़ते हैं और उसकी जड़ों पर मिट्टी का गीला, लिथड़ा, अंधेरा बाहर निकल आता है, वैसा ही होता है कला का कथ्य। कोई भी चीज अचानक चटककर, उखड़कर, हड़बड़ाकर बाहर आती है...वह अभिन्न को भिन्न करती है, संलग्न को विगलित करती है, सुरक्षित को जोखिम में डालती है। वह एक फड़फड़ाती प्राणवत्ता है, खंडित, उखड़ी हुई मिट्टी में अपनी छाया टटोलती हुई।
भाषा के भीतर एक करंट, कुंडली-सी जगाती हुई, जिसका झटका खाते ही सब बिखरे हुए अनुभव-खंड एवं तस्वीर, एक इमेज, एक पैटर्न में सिमटने लगते हैं। कला का 'कथ्य' वह आईना है, जिसमें दुनिया का यथार्थ नहीं, आत्म (सेल्फ) की दुनिया प्रतिबिंबित होती है-उसके भीतर झांकते हुए पता नहीं चलता, कौन मैं हूं, कौन तुम, कौन वह? कला का 'कथ्य' अनूठा आखेट स्थल है, जहां शिकारी अपने लहू के चिह्नों का पीछा करता हुआ खुद अपना ही शिकार करने निकलता है।
समुद्र का ज्वार उठता है और लहरें पछाड़ खाकर गिरती हैं...गिरती हैं, उठती हैं, वापस लौट आती हैं। समुद्र वहीं रहता है, किंतु हर लहर पर उन्मत्त ऊंचाई को छूकर नीचे गिरता है, निन्यानबे डिग्री से ऊपर। वह होरी के शव पर धनिया की पछाड़ है। सारे उपन्यास के कथ्यस्थल को भूचाल की तरह हिलाती हुई। हमें आश्चर्य होता है, हम 'बचे' रह गए हैं। कला का 'कथ्य' हमारे बचे रहने का (सर्वाइवल का) साक्ष्य है।
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संदिग्ध साक्ष्य, क्योंकि हम सचमुच बच गए हैं, क्या इसका प्रमाणित सबूत कभी मिल सकता है? कितना अभागा है वह लेखक, जो दुनिया की आंख से बचकर दुनिया को रचता है और उसे हमेशा के लिए खो देता है। अभागा लेकिन हमारे लिए मूल्यवान-वही तो स्वप्न देखता है। खोई हुई दुनिया का स्वप्न, जो कला का दुर्लभ सत्य है।
-दिवंगत हिंदी उपन्यासकार।
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भाषा के भीतर एक करंट, कुंडली-सी जगाती हुई, जिसका झटका खाते ही सब बिखरे हुए अनुभव-खंड एवं तस्वीर, एक इमेज, एक पैटर्न में सिमटने लगते हैं। कला का 'कथ्य' वह आईना है, जिसमें दुनिया का यथार्थ नहीं, आत्म (सेल्फ) की दुनिया प्रतिबिंबित होती है-उसके भीतर झांकते हुए पता नहीं चलता, कौन मैं हूं, कौन तुम, कौन वह? कला का 'कथ्य' अनूठा आखेट स्थल है, जहां शिकारी अपने लहू के चिह्नों का पीछा करता हुआ खुद अपना ही शिकार करने निकलता है।
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समुद्र का ज्वार उठता है और लहरें पछाड़ खाकर गिरती हैं...गिरती हैं, उठती हैं, वापस लौट आती हैं। समुद्र वहीं रहता है, किंतु हर लहर पर उन्मत्त ऊंचाई को छूकर नीचे गिरता है, निन्यानबे डिग्री से ऊपर। वह होरी के शव पर धनिया की पछाड़ है। सारे उपन्यास के कथ्यस्थल को भूचाल की तरह हिलाती हुई। हमें आश्चर्य होता है, हम 'बचे' रह गए हैं। कला का 'कथ्य' हमारे बचे रहने का (सर्वाइवल का) साक्ष्य है।
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संदिग्ध साक्ष्य, क्योंकि हम सचमुच बच गए हैं, क्या इसका प्रमाणित सबूत कभी मिल सकता है? कितना अभागा है वह लेखक, जो दुनिया की आंख से बचकर दुनिया को रचता है और उसे हमेशा के लिए खो देता है। अभागा लेकिन हमारे लिए मूल्यवान-वही तो स्वप्न देखता है। खोई हुई दुनिया का स्वप्न, जो कला का दुर्लभ सत्य है।
-दिवंगत हिंदी उपन्यासकार।