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मंजिलें और भी हैं : खुश हूं कि बच्चे संक्रमित बीमारियों की चपेट से दूर हैं

Fri, 19 Jul 2019 03:02 AM IST
Avdhesh Kumar श्री फुरपा
श्री फुरपा Published by: Avdhesh Kumar Updated Fri, 19 Jul 2019 03:02 AM IST
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I am happy that children are far from the grip of infected diseases
श्री फुरपा - फोटो : अमर उजाला
तवांग जिला अरुणाचल प्रदेश में है, जो चीन से बिल्कुल सटा हुआ है। यह दुर्गम रास्तों व बर्फीले पहाड़ों के बीच मौजूद है। मागो गांव इसी जिले में स्थित है। मैं इसी गांव का रहने वाला हूं। मागो गांव मुख्यधारा के विकास से दूर है। यहां स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी मूलभूत जरूरतों का भी समुचित इंतजाम नहीं है। पास के कस्बे से अपनी रोजमर्रा की जरूरतों का सामान लाने के लिए, गांव के लोगों को करीब 36 किलोमीटर पैदल सफर तय करना पड़ता है। 
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मागो गांव में 75 परिवार रहते हैं, जिनके करीब 35 बच्चों का टीकाकरण मैं कर चुका हूं। यहां परिवहन की कोई व्यवस्था नहीं है, जिसकी वजह से मुझे पहाड़ों पर ट्रैक करते हुए इस गांव में आना पड़ता है। मेरे मन में अक्सर अपने गांव की स्वास्थ्य सुविधा के लिए कुछ करने का विचार चलता रहता था। वर्ष 2011 में मैंने चिकित्सा प्रशिक्षण लिया। इसके बाद जब उच्चाधिकारियों से अनुरोध किया कि मैं मागो गांव जाकर स्वास्थ्य सेवाओं को वहां के लोगों तक पहुंचाना चाहता हूं, तो उन्होंने मुझे अनुमति दे दी। 
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वर्ष 2013 में मैं यहां आकर बच्चों का टीकाकरण कर रहा हूं। मैं हर महीने मेडिकल का सामान लेने के लिए तवांग आता हूं। मोबाइल कनेक्टिविटी की कमी के कारण, चिकित्सा अधिकारी मुझे मागो जाने के लिए पहले से ही दवाएं और टीका उपलब्ध करवाते हैं। पहली बार जब मैं मागो गांव में टीकाकरण के लिए गया, तो बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा। रास्ता काफी लंबा था, कई घंटों का सफर पैदल तय करना पड़ा, जिसके कारण थकान हुई।
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मेरे गांव को चार साल पहले बिजली मिली, लेकिन हमारे पास अब भी टेलीफोन या मोबाइल कनेक्टिविटी के लिए कोई टावर नहीं है। गांव में कुछ ही घर हैं, जिनके बच्चे यहां पर स्थित सरकारी प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने जाते हैं। यहां की भौगोलिक स्थितियां तो मुश्किल पैदा करती ही हैं, साथ ही जबर्दस्त सर्दियों की वजह से टीकाकरण अभियान पर निकलना अक्सर कठिन हो जाता है। मेरे 
गांव में चरवाहों की अच्छी संख्या मौजूद है, जो हरियाली की तलाश में दूर तक जानवरों को लेकर चले जाते हैं। इसलिए इन चरवाहों के बच्चों को टीका लगाने के लिए मुझे और अधिक दूरी तय करनी पड़ती है। 

जिस टीकाकरण अभियान के तहत मुझे गांव तक जाने के लिए दवाएं व जरूरी स्वास्थ्य उपकरण मिल रहे हैं, वह खसरा, रूबेला और जन्मजात रूबेला सिंड्रोम (सीआरएस) के कारण बीमारी के संक्रमण और मौतों को कम करने के वैश्विक प्रयास का एक हिस्सा है। भारत के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने नौ महीने से 15 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए मीजल्स-रूबेला टीकाकरण अभियान शुरू किया है। 

इस अभियान ने पांच साल से कम उम्र की बाल मृत्यु दर को कम करने और जन्मजात रूबेला सिंड्रोम को रोकने में मदद की है। दुर्गम रास्ते और खराब मौसम के बावजूद मैंने अपने अभियान में सफलता पाई है। मुझे इस काम के लिए 25 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन दिया जाता है। मुझे अपने गांव मागो के लिए बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के अलावा कुछ नहीं चाहिए। जब तक यहां बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध नहीं हो जाती है, तब तक मैं अपने गांव और अपने लोगों की सेवा करता रहूंगा। 

मैंने स्वास्थ्य सेवा को एक ऐसे गांव के बच्चों के करीब लाने के लिए चुनौती के रूप में लिया, जिसके पास सड़कों जैसी प्राथमिक सुविधाएं भी नहीं हैं। पर, मुझे बहुत खुशी है कि ये बच्चे खसरा और रूबेला जैसी संक्रमित बीमारियों के खतरे से बाहर हैं।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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