फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Literature ›   harold Pinter, British English playwright, poet and political campaigner

नाटकीय कला में एक सच जैसी कोई चीज नहीं होती है

Fri, 13 Jul 2018 04:41 PM IST
हैरल्ड पिंटर
हैरल्ड पिंटर Updated Fri, 13 Jul 2018 04:41 PM IST
विज्ञापन
harold Pinter, British English playwright, poet and political campaigner
फाइल फोटो
वास्तविक और काल्पनिक के बीच बहुत ज्यादा अंतर नहीं है और न ही सच और झूठ के बीच है। कोई भी चीज जरूरी नहीं कि या तो सच हो या झूठ हो, यह झूठ और सच, दोनों हो सकती है। मेरा मानना है कि मेरा यह दावा कला के माध्यम से वास्तविकता की खोज पर भी लागू होता है।
विज्ञापन


इसलिए एक लेखक के नाते मैं इसके साथ खड़ा हो सकता हूं, लेकिन एक नागरिक के रूप में नहीं। एक नागरिक के रूप में मुझे यह अवश्य पूछना चाहिए कि सच क्या और झूठ क्या? नाटक में सत्य हमेशा के लिए छिपा होता है। आप इसे कभी नहीं पाते हैं, लेकिन इसकी खोज हमेशा बाध्यकारी है।
विज्ञापन


इसकी खोज स्पष्ट रूप से प्रयास को प्रेरित करती है। खोजना आपका काम है। अक्सर आप अंधेरे में सच से चोट नहीं खाते हैं, इसके साथ टकराते हैं या एक छवि की झलक मिलती है, जो सच के अनुरूप लगती है।
विज्ञापन
विज्ञापन


लेकिन असली सच्चाई यह है कि नाटकीय कला में एक सच जैसी कोई चीज कभी नहीं होती है। नाटक में कई सच होते हैं, वे सच एक-दूसरे को चुनौती देते हैं, एक-दूसरे से टकराते हैं, एक-दूसरे को प्रतिबिंबित करते हैं, एक-दूसरे की अनदेखी करते हैं और एक-दूसरे के प्रति अंधे होते हैं। कभी-कभी आपको लगता है कि आपके हाथ में सच है, लेकिन यह उंगलियों से फिसलकर खो जाता है।


मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि मेरे नाटक कैसे आते हैं। लेकिन मैं कुछ कह नहीं सकता। न ही मैं अपने नाटक के बारे में संक्षिप्त विवरण दे सकता हूं, सिवाय इसके कि क्या हुआ। मेरे अधिकांश नाटक एक रेखा, एक शब्द या एक छवि से पैदा होते हैं। दिए हुए शब्द अक्सर तुरंत छवि का अनुकरण करते हैं।
-नोबेलजयी ब्रिटिश नाटककार
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed