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मंजिलें और भी हैं : बेकार चीजों को दे रही हूं नया आकार
Fri, 23 Aug 2019 06:09 AM IST
शिखा शाह
शिखा शाह
शिखा शाह
Published by: शिखा शाह
Updated Fri, 23 Aug 2019 06:09 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर
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उस समय मैं पढ़ाई पूरी कर रिलायंस फाउंडेशन के लिए काम कर रही थी। उस दौरान मुझे गांवों में जाकर काम करने का मौका मिला। मैंने वहां की समस्याएं बेहद करीब से देखी। साथ ही, उन समस्याओं के समाधानों पर काम किया। मैं उत्तर प्रदेश के वाराणसी की रहने वाली हूं।
मेरी स्कूली पढ़ाई यहीं से हुई है। इसके बाद मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पर्यावरण विज्ञान में परास्नातक किया। नौकरी के दौरान तमाम स्थानों पर कई परियोजनाओं पर काम करने के दौरान मैंने पर्यावरण के प्रति लोगों की संवेदनहीनता देखी। उसी दौरान मैंने सोशल स्टार्ट अप और उद्यमशीलता से जुड़े मुद्दे पर आईआईटी, मद्रास में एक प्रेजेंटेशन दिया।
हालांकि उस वक्त यह स्टार्ट अप कोई आकार नहीं ले पाया। मगर वहां अपने जैसे दूसरे लोगों से मिलकर मुझे इस बात का आइडिया हो गया कि किस तरह से सोशल सेक्टर में अपना कारोबार शुरू किया जा सकता है, जिससे न सिर्फ स्वयं की सहायता हो, बल्कि सामाजिक कार्य भी हो सके। मैं अपनी नौकरी छोड़कर वापस वाराणसी आ गई।
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यहां पर काफी रिसर्च करने के बाद मैंने फैसला किया कि बेकार हो चुकी चीजों के इस्तेमाल की दिशा में कुछ करना चाहिए। दरअसल, वाराणसी में देश-दुनिया से पूरे साल लाखों पर्यटक व तीर्थयात्री आते हैं, लेकिन देश भर में चल रहे स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद यहां पर जगह-जगह कूड़े के ढेर मौजूद थे।
मैंने सोचा कि क्यों न अपने काम से एक ओर शहर को साफ-सुथरा रखा जाए, तो दूसरी ओर उसी कूड़े का इस्तेमाल कर उसे सही आकार दिया जाए। मैंने बचपन से अपनी मां को बेकार हो चुके सामान से कई खूबसूरत चीजें बनाते हुए देखा था। वह कम से कम कबाड़ निकालने पर जोर देती थीं और कई बार घर के पुराने हो रहे सामान को सजा-धजाकर नया कर देती थीं।
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मेरी स्कूली पढ़ाई यहीं से हुई है। इसके बाद मैंने दिल्ली विश्वविद्यालय से पर्यावरण विज्ञान में परास्नातक किया। नौकरी के दौरान तमाम स्थानों पर कई परियोजनाओं पर काम करने के दौरान मैंने पर्यावरण के प्रति लोगों की संवेदनहीनता देखी। उसी दौरान मैंने सोशल स्टार्ट अप और उद्यमशीलता से जुड़े मुद्दे पर आईआईटी, मद्रास में एक प्रेजेंटेशन दिया।
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हालांकि उस वक्त यह स्टार्ट अप कोई आकार नहीं ले पाया। मगर वहां अपने जैसे दूसरे लोगों से मिलकर मुझे इस बात का आइडिया हो गया कि किस तरह से सोशल सेक्टर में अपना कारोबार शुरू किया जा सकता है, जिससे न सिर्फ स्वयं की सहायता हो, बल्कि सामाजिक कार्य भी हो सके। मैं अपनी नौकरी छोड़कर वापस वाराणसी आ गई।
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यहां पर काफी रिसर्च करने के बाद मैंने फैसला किया कि बेकार हो चुकी चीजों के इस्तेमाल की दिशा में कुछ करना चाहिए। दरअसल, वाराणसी में देश-दुनिया से पूरे साल लाखों पर्यटक व तीर्थयात्री आते हैं, लेकिन देश भर में चल रहे स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद यहां पर जगह-जगह कूड़े के ढेर मौजूद थे।
मैंने सोचा कि क्यों न अपने काम से एक ओर शहर को साफ-सुथरा रखा जाए, तो दूसरी ओर उसी कूड़े का इस्तेमाल कर उसे सही आकार दिया जाए। मैंने बचपन से अपनी मां को बेकार हो चुके सामान से कई खूबसूरत चीजें बनाते हुए देखा था। वह कम से कम कबाड़ निकालने पर जोर देती थीं और कई बार घर के पुराने हो रहे सामान को सजा-धजाकर नया कर देती थीं।
यहीं से स्क्रैपशाला की शुरुआत हुई। पहले स्क्रैपशाला पर घर में किसी की सहमति नहीं थी। लेकिन मां और मेरी सहेली मेरे साथ आईं। एक बार शुरुआत होने पर जब उत्पादों की सराहना होने लगी, तो सभी का सहयोग मिलना शुरू हुआ। पुराने सामान और कचरे को नए रूप में लाना आसान काम नहीं होता। उसे साफ करना, डिजाइन करना भी चुनौती है।
कचरे को लेकर वैसे भी लोगों में एक पूर्वधारणा होती है। मैंने अपने घर के आसपास और जान- पहचान के लोगों से बात कर उन कचरे को इकट्ठा किया, जिन्हें लोग अक्सर यों ही फेंक देते हैं। इसमें प्लास्टिक, धातुएं, कांच और दूसरे सामान थे। जब मैंने उनसे उत्पाद बनाए और वे अच्छे लगे, तो धीरे-धीरे मुझे वाराणसी के नगर निगम से भी वेस्ट स्क्रैप मिलने लगा।
अब तो लोग कूरियर से भी मुझे चीजें भेज देते हैं। मेरे दोस्त कोई भी बेकार सामान फेंकने से पहले पूछ लेते हैं, कि इसका उपयोग हो सकता है या नहीं। हालांकि डिजाइन का जिम्मा मैं ही संभालती हूं, पर टीम के कारीगर भी अपने तरीके से इसमें योगदान देते हैं। अब हमारी बड़ी टीम है। इसमें आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के भी लोग हैं। उन्हें यहां एक नियमित आय मिल रही है और सबको अपने ढंग से रचनात्मक कार्य करने की पूरी छूट है।
स्क्रैपशाला में अब पुराने टायर से खूबसूरत फर्नीचर, चॉकलेट-बिस्किट के रैपर से बने खूबसूरत बैग्स, शीशे की बोतलों के लैंपशेड्स, प्लास्टिक की बोतलों से बने गमले, पुरानी केतली का सजावटी रूप और पुराने गत्ते से वॉल डेकोरेशन जैसी कई चीजें बनाई जा रही हैं। ये उत्पाद ऑफलाइन और ऑनलाइन उपलब्ध हैं। वाराणसी में आने वाले विदेशी लोग इन्हें देखकर आकर्षित भी होते हैं, क्योंकि वे लोग वेस्ट मैटेरियल के प्रति हमसे ज्यादा जागरूक हैं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
कचरे को लेकर वैसे भी लोगों में एक पूर्वधारणा होती है। मैंने अपने घर के आसपास और जान- पहचान के लोगों से बात कर उन कचरे को इकट्ठा किया, जिन्हें लोग अक्सर यों ही फेंक देते हैं। इसमें प्लास्टिक, धातुएं, कांच और दूसरे सामान थे। जब मैंने उनसे उत्पाद बनाए और वे अच्छे लगे, तो धीरे-धीरे मुझे वाराणसी के नगर निगम से भी वेस्ट स्क्रैप मिलने लगा।
अब तो लोग कूरियर से भी मुझे चीजें भेज देते हैं। मेरे दोस्त कोई भी बेकार सामान फेंकने से पहले पूछ लेते हैं, कि इसका उपयोग हो सकता है या नहीं। हालांकि डिजाइन का जिम्मा मैं ही संभालती हूं, पर टीम के कारीगर भी अपने तरीके से इसमें योगदान देते हैं। अब हमारी बड़ी टीम है। इसमें आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के भी लोग हैं। उन्हें यहां एक नियमित आय मिल रही है और सबको अपने ढंग से रचनात्मक कार्य करने की पूरी छूट है।
स्क्रैपशाला में अब पुराने टायर से खूबसूरत फर्नीचर, चॉकलेट-बिस्किट के रैपर से बने खूबसूरत बैग्स, शीशे की बोतलों के लैंपशेड्स, प्लास्टिक की बोतलों से बने गमले, पुरानी केतली का सजावटी रूप और पुराने गत्ते से वॉल डेकोरेशन जैसी कई चीजें बनाई जा रही हैं। ये उत्पाद ऑफलाइन और ऑनलाइन उपलब्ध हैं। वाराणसी में आने वाले विदेशी लोग इन्हें देखकर आकर्षित भी होते हैं, क्योंकि वे लोग वेस्ट मैटेरियल के प्रति हमसे ज्यादा जागरूक हैं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।